'मिस टनकपुर हाजिर हो' समीक्षाः चकित करती है ये फिल्म
मिस टनकपुर हाजिर हो
-निर्माताः विनय तिवारी-गौरव गुप्ता
-लेखक-निर्देशकः विनोद कापड़ी
-सितारेः अन्नू कपूर, रवि किशन, ओम पुरी, संजय मिश्रा, राजीव बग्गा, ऋषिता भट्ट
-रेटिंग ***1/2
कई बातें ऐसी होती हैं जिन पर सुन कर विश्वास कर पाना आसान नहीं होता। वे आंखों देखी हों तभी लगता है कि ऐसा भी होता है! कुछ फिल्मों पर भी यह बात लागू होती है। सिनेमाई निर्देशन की दुनिया में पदार्पण करने वाले विनोद कापड़ी की मिस टनकपुर हाजिर हो ऐसी ही फिल्म है।
कापड़ी के पास पत्रकारिता में 25 बरसों से ज्यादा का गंभीर अनुभव है और वे खबरों में छुपी कहानी को ढूंढ कर फिल्म में लाए हैं। जो आपको एक साथ हंसाती और चकित करती है। हिंदी सिनेमा की नई यथार्थवादी धारा में कॉमेडी का मिश्रण इसे ऐसी अन्य फिल्मों से अलग बनाता है। इस कॉमेडी में हंसाने की सामर्थ्य है और तीखे तंज/व्यंग्य भी।
फिल्म मूल रूप से उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण करती है, जिसमें आज भी एक वर्ग दबंग और दूसरा दबा हुआ है। दबंगों की इतनी चलती है कि वही अदालत लगाते हैं, वही मुकदमा करते हैं और फैसला भी वही देते हैं। पीड़ित की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। जिस नायक पर भैंस से बलात्कार का आरोप लगता है...
इसके बाद शुरू होती है असली कहानी
उसका पक्ष कभी सामने नहीं आता। पुलिस के साथ मिल कर दबंग मनमानी करते हैं। नतीजा यह कि खाप पंचायत पीड़ित को उस भैंस के साथ शादी करने का फरमान सुना देती है! कहानी के केंद्र में गांव टनकपुर का प्रधान सुआलाल गंडास (अन्नू कपूर) है। वह बूढ़ा है और उसकी पत्नी माया (ऋषिता भट्ट) कहीं कम उम्र की है। माया अर्जुन (राजीव बग्गा) से प्रेम करती है।
लेकिन छोटे-से गांव में चोरी-छुपे प्रेम कब तक उजागर नहीं होगा? माया-अर्जुन को साथ पकड़ते ही सुआलाल आग बबूला होता है। अर्जुन को कारिंदो से खूब पिटवाता है। हाथ-पैर तुड़वा बैलगाड़ी में बांध कर हवा में लटका देता है।
माया-अर्जुन का संबंध सार्वजनिक होने पर सुआलाल की प्रतिष्ठा पर दाग लगेगा, अतः वह प्रचार करता है कि अर्जुन ने मेले में मिस टनकपुर का खिताब जीतने वाली उसकी भैंस के साथ बलात्कार किया!
कुछ दृश्य जमकर हंसाते हैं तो दिल दहला देते हैं
इसके बाद निर्देशक ने जिस तरह से कहानी को आगे बढ़ाया, वह समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव, दबंगों की मानसिकता, पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज की दब्बू सोच को सामने लाता है। कुछ कॉमिक दृश्य जहां आपको जमकर हंसाते हैं, वहीं अर्जुन के पिता की आत्महत्या का दृश्य दहला देता है। यह दृश्य लेखक-निर्देशक की सिनेमा पर पकड़ की गवाही देते हैं। सभी कलाकारों का काम बढ़िया है।
खास तौर पर अन्नू कपूर और ओम पुरी। राजीव बग्गा के हिस्से में ज्यादातर सीधा-सादा व्यवहार और खामोशी आई है, मगर वह इसे प्रभावी ढंग से निभाने में कामयाब रहे हैं। एक तरफ जहां उनका प्रेम खामोश है, वहीं दूसरी तरफ दबंगों के सामने उनकी दयनीय चुप्पी सच्ची मालूम पड़ती है।
कापड़ी ने अंत में कहानी को देश में दर्ज होने वाले झूठे आरोपों और मुकदमों से जोड़ा है। अगर अदालतों में लाखों केस फाइलों में दबे हैं तो उसमें झूठ के इन पुलिंदों का बड़ा योगदान है। फिल्म एक युवा निर्देशक का सच्चा प्रयास है, जिसे देखने के बाद ही आप इस पर विश्वास कर सकते हैं।