जय गंगाजल समीक्षाः पारंपरिक कहानी पर रोचक फिल्म
- निर्माता-निर्देशकः प्रकाश झा
- सितारेः प्रियंका चोपड़ा, प्रकाश झा, मानव कौल
- रेटिंग ***1/2
विस्तार
निर्माता-निर्देशकः प्रकाश झा
सितारेः प्रियंका चोपड़ा, प्रकाश झा, मानव कौल
रेटिंग ***1/2
पारंपरिक अंदाज की बॉलीवुड कहानी को कैसे रोचक ढंग से कहा जा सकता है, जय गंगाजल उसका उदाहरण है। ऐसे समय में जबकि सिनेमा के लिए लगातार नए विषय खोजे जा रहे हैं, प्रकाश झा ने अपनी फिल्म गंगाजल (...) को नवीन परिवेश-रूप-कलेवर में पेश किया है।
लंबे समय से अगर आपने ऐसी फिल्म नहीं देखी, जिसके तेवर मसालेदार हैं लेकिन बात कुछ हटकर कही गई है तो जय गंगाजल आपके लिए है। भ्रष्ट पुलिस, बेईमान राजनीति के साथ मिल कर आधुनिक कारपोरेट कैसे जनता से सब कुछ छीन लेना चाहते हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। सिनेमा ने इसे सैकड़ों बार दोहरा है। मगर प्रकाश झा इसमें दबी-कुचली जनता के गुस्से को अपने वक्त के साथ दिखाने की कोशिश करते हैं।
जय गंगाजल बांकीपुर की कहानी है
जय गंगाजल बांकीपुर नामक जगह की कहानी कहती है जहां एक बड़ा संयंत्र लगाया जाना है और उसके लिए लोगों की जमीनें कब्जाई जा रही हैं। स्थानीय विधायक विरिष्ठ नेता के साथ मिलकर साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर रहा है क्योंकि उसके छोटे भाई ने संयंत्र लगाने वाली कंपनी के वास्ते जमीन हासिल करने का ठेका लिया है।
खेल करोड़ों में हो रहा है और लोगों की जान की कीमत कौड़ियों में है। अत्याचारियों को सत्ता की शह मिली हुई है। पुलिसतंत्र नेताओं के हाथों बिका है। ऐसे ही समय में बांकीपुर में नई अफसर आती है, एसपी आभा माथुर (प्रियंका चोपड़ा)। वह ईमानदार और न्याय की पैरोकार है। अतः भ्रष्ट व्यवस्था से टक्कर स्वाभाविक है। आखिर में जीत आभा की कोशिशों की होती है और भ्रष्टाचारी हारते हैं। मगर बीच का घटनाक्रम काफी उथलपुथल भरा है।
डीएसपी बीपी सिंह बने प्रकाश झा फिल्म की उपलब्धि हैं।
प्रकाश ने स्वार्थी, बेईमान और नेताओं के हाथों बिके पुलिस अधिकारी की भूमिका तो अच्छे से निभाई ही, जब इस किरदार की अंतरआत्मा जागती है वह हिस्सा भी खूबसूरती से निभाया। प्रकाश झा अपनी आंखों से भी अभिव्यक्त करते हैं और यही बात उन्हें बढ़िया अदाकार साबित करती है।
कई जगहों पर यह भी लगता है कि फिल्म प्रियंका की नहीं बीपी सिंह की कहानी है! प्रियंका ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है मगर उनके हिस्से में बहुत सारे ऐक्शन सीन की उम्मीद लेकर न जाएं तो बेहतर होगा। मानव कौल दीर्घ और सशक्त रोल में हैं। वह नेगेटिव किरदार से न्याय करते हैं।
गंगाजल की तरह पैनी नहीं
गंगाजल में जहां भ्रष्ट और अपराधियों की आंखें फोड़ कर सजा दी जा रही थी तो यहां निर्देशक भीड़ तंत्र का न्याय दिखाते हैं। कैसे जनता खुद मौके पर ही फैसला कर देती है! शोषकों के हाथों सब कुछ गंवाने और मारे डर के फांसी पर झूल जाने वाले लोग अचानक रुख बदलते हैं और देखते-देखते अपराधतंत्र के सरगनाओं को खुलेआम फांसी पर लटकाया जाने लगता है।
वैसे यह एक डराने वाला विचार भी है क्योंकि भीड़ तंत्र में विवेक की कोई जगह नहीं होती। विवेक ही भीड़ और इंसान के व्यवहार में फर्क लाता है। जय गंगाजल यह बात भी कहने की कोशिश करती है। मगर इसका टोन जरा धीमा है।