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Dybbuk Review: प्राइम वीडियो ने फिर परोसी एक खराब फिल्म, इमरान हाशमी की फ्लॉप का सिलसिला जारी

Sat, 30 Oct 2021 05:13 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 30 Oct 2021 05:13 PM IST
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Dybbuk Movie Review in Hindi by Pankaj Shukla Emraan Hashmi Nikita Dutta Bhushan Kumar Jay K
dybbuk review - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
डिब्बुक
कलाकार
इमरान हाशमी , निकिता दत्ता , मानव कौल और डेंजिल स्मिथ
लेखक
जय के , मनु वारियर और चिंतन गांधी
निर्देशक
जय के
निर्माता
भूषण कुमार और कुमार मंगत पाठक
ओटीटी
अमेजन प्राइम वीडियो
रेटिंग
1.5/5

10 साल से इमरान हाशमी एक सुपरहिट सोलो फिल्म की तलाश में हैं और ‘डर्टी पिक्चर’ के बाद से एक जैसा अभिनय ही करते चले आ रहे हैं। सीरियल किसर की अपनी इमेज को तोड़ने की लाख कोशिशें करने के बाद भी इमरान वहीं खड़े हैं जहां वह भट्ट भाइयों की कंपनी की फिल्मों से दूर होकर खड़े थे। उनकी नई फिल्म ‘डिब्बुक’ उस ओटीटी पर रिलीज हुई है, जिसके शीर्षस्थ अधिकारी को हाल ही में अपना पद वित्तीय अनियमितताओं के चलते छोड़ना पड़ा। मुंबई फिल्म जगत में चर्चा है कि फिल्म ‘डिब्बुक’ भी प्राइम वीडियो ने करीब 36 करोड़ रुपये में खरीदी है। ऐसी फिल्में अपने प्राइम ग्राहकों को परोसने की सिफारिश प्राइम वीडियो में कौन करता है, ये भी तफ्तीश का विषय हो सकता है। ओटीटी के आने के बाद से हिंदी फिल्म जगत में उन निर्माताओं की चांदी हो रही है जो अधपकी, कमजोर और बेकार फिल्में इन्हें बेच देने में कामयाब हो रहे हैं। फिल्म ‘डिब्बुक’ भी इसी लिस्ट में शामिल एक और फिल्म है।

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Dybbuk Movie Review in Hindi by Pankaj Shukla Emraan Hashmi Nikita Dutta Bhushan Kumar Jay K
dybbuk review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘डिब्बुक’ की कहानी घिसी पिटी से भी ज्यादा घिसी पिटी है। मुंबई से मॉरीशस पहुंचा एक जोड़ा इस कहानी के केंद्र में है। घर में लाए गए एक सुंदर से दिखने वाले बक्से के साथ कुछ और भी आ पहुंचा है। ‘डिब्बुक’ दरअसल यहूदी लोकसंस्कृति का शब्द है, इसका अर्थ एक ऐसी आत्मा से लगाता जाता है जिसे अपना शरीर असमान्य परिस्थितयों में छोड़ना पड़ा। हिंदी में इस नाम से फिल्म बनाने का सुझाव जिसने भी दिया होगा, जरूर उसने हिंदी प्रदेशों के भूतों के किस्से कहानियां कभी सुने नहीं होंगे। ये फिल्म चार साल पहले मलायलम में बनी एक हिट फिल्म ‘एजरा’ की रीमेक है। मूल फिल्म इसके हीरो पृथ्वीराज सुकुमारन की हिट फिल्मों में शुमार है। केरल के हिसाब से फिल्म की कहानी सही भी है। हिंदीभाषी प्रदेशों में इससे बड़े बड़े ब्रह्मराक्षसों की कहानी दर्शकों ने देख सुन रखी है।

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Dybbuk Movie Review in Hindi by Pankaj Shukla Emraan Hashmi Nikita Dutta Bhushan Kumar Jay K
dybbuk review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

रामसे फिल्म्स की भुतहा फिल्मों का हर मसाला फिल्म ‘डिब्बुक’ में मौजूद है। अंधेरे में सरकती आकृतियां हैं। हवा में उड़ते लोग हैं। पीले पड़ते चेहरे हैं। और, अपनी पूरी आन बान शान के साथ चमकते दमकते दिखने वाले वाले लोग भी। पूरी पटकथा यूं लिखी गई है कि आप फिल्म देखते हुए पांच मिनट पहले ही बता सकते हैं कि अब क्या होने वाला है। फिल्म दर्शकों को डराने के टोटकों का इस्तेमाल करने के लिए जिन झटकों का इस्तेमाल करती है, वे सब पुराने हो चुके हैं और बजाय डराने के सिर्फ बोर करते हैं। फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद सब सपाट हैं और निर्देशन कहीं भी दर्शकों को फिल्म के साथ जोड़ पाने में सफल नहीं हो पाता। रचनात्मक विभागों में पूरी तरह फेल फिल्म ‘डिब्बुक’ में और भी ऐसा कुछ नहीं है कि फिल्म को अंत तक देखने की कोई वजह बनी रहे।

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Dybbuk Movie Review in Hindi by Pankaj Shukla Emraan Hashmi Nikita Dutta Bhushan Kumar Jay K
dybbuk review - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

इमरान हाशमी 42 साल के हो चुके हैं। इसमें से आधे से ज्यादा जीवन उन्होंने कैमरे के पीछे और आगे काम करते हुए ही बिताया है। लेकिन फिल्म ‘डिब्बुक’ देखकर लगता नहीं कि अभिनय का उनका कोई जुनून अब बाकी रह भी गया है। वह कैमरे के सामने बिल्कुल किसी बाबू की तरह आते हैं जो 10 से 5 के बीच अपना काम निपटाकर घर चला जाता है, बिना अपने काम से किसी भावनात्मक लगाव के। इमरान का भी भाव प्रकटन का एक खाका तैयार हो चुका है। वह दी गई परिस्थिति में वही भाव चेहरे पर लाकर अपना काम पूरा कर देते हैं। बतौर अभिनेता विकसित होते रहने की लालसा भी उनकी खत्म होती दिखने लगी है। और, जब फिल्म का हीरो ही इतने अनमने ढंग से काम करता दिखे तो फिर बाकी कलाकारों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है। निकिता दत्ता के अंदर काबिलियत है लेकिन उसे परदे पर पेश करने में ये फिल्म विफल रही।

Dybbuk Movie Review in Hindi by Pankaj Shukla Emraan Hashmi Nikita Dutta Bhushan Kumar Jay K
dybbuk review - फोटो : Youtube

फिल्म ‘डिब्बुक’ तकनीकी रूप से भी काफी कमजोर फिल्म है। यूं लगता है कि सत्या पोनमार ने इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी करने के काफी सारे टैम्पलेट पहले बना लिए और फिर लोकेशन पर पहुंचकर उन्हें देखकर शूटिंग निपटा दी। कहीं कोई क्रिएटिविटी नहीं। कहीं कोई ऐसा कैमरा मूवमेंट नहीं जो नया सा लगे। गौरव दासगुप्ता और अमर मोहिले का गीत संगीत भी औसत से नीचे दर्जे का है। संदीप फ्रांसिस जरूर चाहते तो फिल्म का स्तर थोड़ा बढ़ा सकते थे अगर वह फिल्म की अवधि 112 मिनट से 90 मिनट तक ले आते। प्राइम वीडियो की ये एक और कमजोर फिल्म है। औसत से कमतर हिंदी फिल्में दिखाने में उसका डिज्नी प्लस हॉटस्टार से कंपटीशन शुरू हो गया दिखता है।

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