Dono Review: राजश्री की विरासत संभालने में सफल रहे अवनीश, राजवीर और पलोमा को डेब्यू फिल्म में फुल नंबर
76 साल हो गए राजश्री प्रोडक्शंस को फिल्में बनाते। अगर इन फिल्मों के शुरू में आने वाले राजश्री के लोगो पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि कैसे इस फिल्म निर्माण कंपनी ने समय के साथ साथ खुद को बदला है और बदलते समाज की कहानियों को आत्मसात किया है। इन दिनों जमाना डेस्टिनेशन वेडिंग का है तो शादी, विवाह की रीति रिवाजों की रीढ़ पर राजश्री की नई पीढ़ी ने एक नए जमाने की फिल्म गढ़ी है राजश्री की अगली पीढ़ी के निर्देशक अवनीश एस बड़जात्या ने। फिल्म की कहानी आज के परिवेश की है, लेकिन इसमें पारिवारिक मूल्यों और आज के युवाओं की आधुनिक सोच को बहुत ही गहराई से पेश किया है।
फिल्म की कहानी डेस्टिनेशन वेडिंग (गंतव्य शादी) की थीम आधरित हैं। देव सराफ को अपने भी बचपन की दोस्त अलीना की शादी में जाना पड़ता है जिसे वह बचपन से बहुत प्यार करता है। देव के दोस्त समझाते हैं कि स्टेशन पर बैठकर ऐसी ट्रेन का इंतजार करने से क्या फायदा, जो ट्रेन उस स्टेशन पर आती ही नहीं। दूसरी ट्रेन पकड़ने के लिए उसे दूसरे स्टेशन पर जाना पड़ेगा या फिर उसी स्टेशन पर आने वाली दूसरी ट्रेन को पकड़ना पड़ेगा। तभी उसको एक नई मंजिल मिल सकती है। देव सराफ शादी में शामिल होता है। यहां देव की मुलाकात मेघना जोशी से होती है। छह साल तक रिलेशनशिप में रहने के बाद उसका ब्रेक अप हो गया है। देव और मेघना दोनो एक दूसरे के को समझने की कोशिश करते हैं और एक प्यारी सी प्रेम कहानी के साथ फिल्म आगे बढ़ती है।
फिल्म ‘दोनो’ की कहानी अवनीश बड़जात्या ने मनु शर्मा के साथ मिलकर लिखी है। राजश्री की फिल्मों का जिस तरह का फ्लेवर होता है। वैसा पूरा फ्लेवर इस फिल्म में नजर आता है। हां, फिल्म में चुंबन वाला दृश्य थोड़ा सा खटकता है लेकिन अब जबकि ये सामान्य प्रक्रिया हो चली है प्यार को प्रकट करने की तो इसे भी स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन, अब भी कैसे प्रेम प्रकटन के इस व्यवहार को दो पीढ़ियों के बीच की सोच को विभाजित करने वाली ‘लक्ष्मण रेखा’ के तौर पर अवनीश पेश करते हैं, यही उनकी निर्देशकीय जीत का पहला प्रमाण है। अवनीश बड़जात्या ने यहां ये बताने की भी कोशिश की है कि जब किसी भी काम में लड़के और लड़की दोनों की समान भागीदारी है तो दोष सिर्फ लड़की के सिर पर क्यों?
डेस्टिनेशन वेडिंग थाइलैंड में है। लेकिन, भारतीय समाज में शादी के जो रीति रिवाज होते हैं, उसकी एक एक बारीकी को अवनीश बड़जात्या ने दिखाने की कोशिश की है। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि कोई भी इंसान हर किसी को खुश नहीं रख सकता है। अगर इंसान सारी जिंदगी इस बात से डर डर के जिए सिर्फ अपनी नजरो में उठने की जरूरत है। हमारी जीवन शैली और रहने के तौर तरीके पर दूसरे क्या सोचते हैं, यह सोचने के बजाय, इस बात को सोचना चाहिए कि खुद को क्या पसंद है और क्या अच्छा लगता है? हर इंसान अपने आप में हीरो होता है, बशर्ते उसे खुद की काबिलियत समझ में आ जाए।
फिल्म में राजवीर देओल और पलोमा की जोड़ी एक दम फ्रेश लगी है। इतनी एक्टिंग देखकर ऐसा नहीं लगता कि फिल्म में दोनों एक्टिंग कर रहे हैं। फिल्म के हीरो, हीरोइन की बजाय आम इंसान ही नजर आते हैं। इन दोनो का सहज अभिनय काफी प्रभावित करता है। दरअसल, फिल्म की पटकथा इतनी सटीक है कि फिल्म के सभी कलाकार अपनी अपनी भूमिका में फिट बैठते है। राजवीर देओल और पलोमा के अलावा आदित्य नंदा, कनिका कपूर, रोहन खुराना, गरिमा अग्रवाल और बाकी कलाकारों ने अपने अपने किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है।
फिल्म ‘दोनों’ कहानी, अभिनय और निर्देशन के मामले में एक अच्छी फिल्म है। लेकिन इसकी दो कमजोर कड़ियां भी हैं। फिल्म की पहली कमजोर कड़ी है इसका संगीत। अवनीश ने इसमें राजश्री की परंपरा को थोड़ा बदलने की कोशिश की है लेकिन, अगर इस फिल्म के पहले उन्होंने थोड़ा हिंदुस्तान घूमा होता या राजश्री के छोटे छोटे शहरों में काम करते रहे पूर्व कर्मचारियों से संवाद किया होता तो उन्हें पता चलता कि हिंदुस्तान का दिल आज भी उन गीतों पर धड़कता है जिनमें साज हिंदुस्तानी हो और जिनकी परवाज मेलोडी हो। फिल्म के आठ गानों में ऐसा कोई गीत नहीं जो लंबे समय तक याद किया जा सके। शंकर-एहसान-लॉय की ये बड़ी चूक है। जॉर्ज जोसेफ का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के दृश्यों को प्रभावशाली बनाता है। चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है, फिल्म को बड़े ही भव्य स्तर पर शूट किया है। दूसरी कमजोर कड़ी फिल्म की श्वेता वेंकट मैथ्यू का संपादन है। इसके चलते फिल्म का प्रवाह भी थोड़ा सुस्त है। फिल्म के कास्ट्यूम अच्छे हैं, फिल्म के दृश्य के मुताबिक उसे अच्छे से डिजाइन किए गए हैं।