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'डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी' देखने से पहले पढ़िए समीक्षा

Fri, 03 Apr 2015 02:47 PM IST
Updated Fri, 03 Apr 2015 02:47 PM IST
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byomkesh bakshi is not up to the mark

आप भरी गर्मी में पसीने-पसीने होकर किसी से मिलने जाएं और वह आपको चाय-पानी भी न पूछे। बैठा कर अपनी-अपनी कहे और जब उसका गला सूखे तो खुद अपने लिए मंगा कर चाय-पानी पी ले।

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निर्देशक दिबाकर बनर्जी की फिल्म कुछ ऐसा ही एहसास देती है। डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी देखते हुए लगता है कि दिबाकर केवल अपने मन की कह रहे हैं, उन्हें दर्शक की भावनाओं का एहसास नहीं है।
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खोसला का घोसला, ओए लकी तथा लव सेक्स और धोखा जैसी याद रहने लायक फिल्में बनाने वाले दिबाकर बॉलीवुड के उन युवा निर्देशकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने धन और साधन की कमी के बीच अच्छा सिनेमा बनाया। मगर जब धन और साधन आए तो उनकी फिल्में देख कर लगा कि वे जड़ों से कट गए हैं।

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फिल्म में न आज है और न कल

byomkesh bakshi is not up to the mark

दिबाकर बंगाली हैं और उन्होंने बांग्ला साहित्य में शरदेंदु बंदोपाध्याय द्वारा रचित जासूसी किरदार ब्योमकेश बख्शी की कहानी पर्दे पर उतारी है। फिल्म की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इसमें आपको न तो अपना आज दिखता है और न इतिहास।

आप एक ऐसी पीरियड क्राइम फंतासी की दुनिया में होते हैं, जिसमें अपराध का थ्रिल धीरे-धीरे रिसता जाता है। अचानक आपको फिल्म की जगह कॉमिक का सा एहसास होने लगता है।

जिसमें दृश्यों से घटनाक्रम नहीं खुलता। बल्कि यहां डिटेक्टिव के साथ उसका जूनियर सदा उन संवादों को सुनने के लिए तत्पर रहता है, जिनके माध्यम से अपराध के पीछे की कहानी सामने लाई जाती है।

परिवेश को किया है जीवंत पर हर वर्ग नहीं करेगा पसंद

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यूं तो फिल्म में दिबाकर ने 1940 के दशक के कलकत्ता को जीवंत करने में बड़ी मेहनत की है। वस्तुओं और वस्त्रों के डीटेल पर बहुत काम किया है। परिवेश को काफी हद तक दिखाने में वह कामयाब रहे हैं।

उस दौर में कलकत्ता के साथ चीन, जापान, रंगून, अफीम, हेरोइन, अंग्रेज, आजादी की लड़ाई और द्वितीय विश्वयुद्ध जैसे संदर्भों का इस्तेमाल करते हुए दिबाकर ने ब्योमकेश बख्शी की यह कहानी गढ़ी है।

एक और मुश्किल यह है कि इस फिल्म का कलर टोन डार्क है। नतीजा यह कि जिन शहरों या सिनेमाघरों में स्क्रीन अच्छे नहीं हैं, वहां दर्शक पर्दे पर किरदारों को गहरे अंधेरे ढूंढते रह जाएंगे।

कहानी नहीं पैदा करती उत्सुकता

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फिल्म की कहानी शुरू होती है एक चिंतित युवक से जो ब्योमकेश बख्शी के पास आता है कि उसके पिता दो-तीन हफ्तों से लापता हैं। क्या वह कहीं चले गए हैं, किसी हादसे में उनकी मृत्यु हो गई है या फिर हत्या कर दी गई है?

मध्यांतर तक यह साफ हो जाता है कि हत्या की गई है। हत्या के पीछे कौन है, हत्या का क्या मकसद है यह सवाल दूसरे हिस्से में सुलझाए जाते हैं। एक साधारण सी लगने वाली हत्या के सिरे अपराध जगत के अंडरवर्ल्ड और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र से जुड़ने लगते हैं। परंतु आखिर तक आते-आते फिल्म लंबी खिंचती मालूम पड़ती है।

दिबाकर अंत तक पहुंचने के लिए लंबे और घुमावदार रास्तों का प्रयोग करते हैं और दर्शक का धैर्य जवाब देने लगता है। फिल्म की पब्लिसिटी के लिए इस्तेमाल किया गया बॉलीवुड के इतिहास का कथित सबसे लंबा चुंबन दृश्य यहां गायब है।

सुशांत डिटेक्टिव के रोल में ठीक लगे हैं और बाकी कलाकार उनके आस-पास उपग्रहों की तरह घूमते हैं। फिल्म की कहानी से कनेक्शन बैठाने में कुछ जगहों पर दर्शक को अतिरिक्त प्रयास करना होता है।

बैकग्राउंड म्यूजिक और गीत-संगीत यहां विशेष उल्लेखनीय नहीं है। अंत में यह कि अगर आपने बहुत दिनों से कोई जासूस वाली फिल्म नहीं देखी और बचपन में पढ़े कॉमिक याद आ रहे हैं तो यह फिल्म जरूर देख सकते हैं।

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