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'डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी' देखने से पहले पढ़िए समीक्षा

Updated Fri, 03 Apr 2015 02:47 PM IST
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byomkesh bakshi is not up to the mark

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आप भरी गर्मी में पसीने-पसीने होकर किसी से मिलने जाएं और वह आपको चाय-पानी भी न पूछे। बैठा कर अपनी-अपनी कहे और जब उसका गला सूखे तो खुद अपने लिए मंगा कर चाय-पानी पी ले।
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निर्देशक दिबाकर बनर्जी की फिल्म कुछ ऐसा ही एहसास देती है। डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी देखते हुए लगता है कि दिबाकर केवल अपने मन की कह रहे हैं, उन्हें दर्शक की भावनाओं का एहसास नहीं है।


खोसला का घोसला, ओए लकी तथा लव सेक्स और धोखा जैसी याद रहने लायक फिल्में बनाने वाले दिबाकर बॉलीवुड के उन युवा निर्देशकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने धन और साधन की कमी के बीच अच्छा सिनेमा बनाया। मगर जब धन और साधन आए तो उनकी फिल्में देख कर लगा कि वे जड़ों से कट गए हैं।
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फिल्म में न आज है और न कल

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