बॉम्बे वेलवेट समीक्षा: नाम बड़े और दर्शन 'बहुत छोटे'
नाम बड़े और दर्शन ‘बहुत छोटे’। एक पंक्ति में अनुराग कश्यप की बॉम्बे वेलवेट यही है। हालांकि फिल्म बहुत लंबी है। ढाई घंटे! जबकि यह आधा-पौना घंटा भी ठीक से बांध नहीं पाती।
शुरुआत के बीस-बाईस मिनट आप कहानी के सिरे ढूंढते रहते हैं। फिर जब गाड़ी पटरी पर आती है तो ऐसे चलती है कि इंटरवेल का इंतजार होने लगता है!
आजादी के दो साल बाद यानी 1949 में कहानी शुरू होती है, जब पाकिस्तान की तरफ से दो शरणार्थी बच्चे अलग-अलग रास्तों से मुंबई पहुंचते हैं। छोटे-मोटे अपराध करते हुए जिंदा रहने की कोशिश करते हैं। इनमें से एक यानी जॉनी बलराज (रणबीर कपूर) ‘बिग शॉट’ बनना चाहता है।
फिल्म की जड़ें ही हिली हुई हैं
फिल्म में मुंबई के 1960-70 के दशक के दिन दिखाए गए हैं, जब यह महानगर बॉम्बे था और तरक्की की तरफ रफ्तार पकड़ रहा था। विकास की दौड़ में निजी स्वार्थ साधने वाले बहुत थे।
मेयर, अखबार मालिक-संपादक, मिल मालिक, उद्यमी और पूंजीपति। चूंकि ये छुप कर काम करते थे, अतः अपराध को अंजाम देने के लिए इन्हें जॉनी जैसे लोगों की जरूरत पड़ती थी। जब जॉनी एंड कंपनी अपना हिस्सा मांगने पर आई तो क्या हुआ?
निर्देशक ने कहानी में प्यार को सस्पेंस के साथ जोड़ा है। नायिका रोजी (अनुष्का) को सिंगर बना कर। वह उसी क्लब बॉम्बे वेलवेट में गाना गाती है, जिसकी जिम्मेदारी जॉनी के पास है। रोजी का एक अतीत है और वह एक मिशन के तहत बॉम्बे वेलवेट में आई है।
रणबीर के किरदार को लेकर ही कनफ्यूज हैं अनुराग
रणबीर के किरदार को लेकर निर्देशक-लेखक कनफ्यूज हैं। उन्हें नहीं पता कि जॉनी क्या है? फ्रीस्टाइल बॉक्सर, स्ट्रीट फाइटर, सड़कछाप गुंडा, क्रूर हत्यारा, क्लब मैनेजर, प्रेमी? कहानी में अचानक खंबाटा (करन जौहर) की एंट्री होती।
वह अतिआत्मविश्वासी, अपराधी किस्म का व्यक्ति है जो बलराज को जॉनी नाम दे कर उससे फिक्सिंग और हत्या जैसे अपराध करता है। फिर उसे बड़ा आदमी बन जाने का एहसास देने के लिए क्लब खुलवा देता है, बॉम्बे वेलवेट।
कहानी में कई उलझाव हैं तो कहीं-कही बड़ी सपाट बयानी है। याद रहने लायक कोई संवाद यहां नहीं है। हिंसा बहुत है। रोमांस कम है। ऐसा कोई बिंदु फिल्म में नहीं आता जिसे ‘एंटरटेनमेंट’ कहते हैं।
इस सीन से समझ आ जाती है अनुराग की मुश्किल
वास्तव में यह पाश्चात्य सिनेमा से बुरी तरह आक्रांत ऐसे निर्देशक का सिनेमा है, जिसकी भारतीयता नकली लगती है। बॉम्बे वेलवेट की कहानी पेरिस, मिलान या मैनहट्टन की भी हो सकती है। उसमें कहीं भी ठेठ भारतीयता या मुंबईयापन नहीं है।
असल में अनुराग की मुश्किल फिल्म के एक ही दृश्य से समझी जा सकती है। जब रोजी जॉनी से बॉम्बे छोड़ कर चलने के लिए कहती है। तब वह कहता है, ‘बॉम्बे से बाहर इंडिया है। जहां खाने को भी कुछ नहीं मिलेगा।’
असल में अनुराग ने भारत को इतना ही देखा/समझा है। इसीलिए उनकी फिल्मों में अमेरिका और यूरोप की सस्ती फिल्मों की छटाएं दिखती है। बॉम्बे वेलवेट भी अलग नहीं है। निर्देशक के रूप में अनुराग के कहानी कहने का अंदाज यहां उनके प्रशंसकों को भी सोच में डाल देगा।
बेअसर है रणबीर की मेहनत
जहां तक ऐक्टरों का सवाल है तो रणबीर कपूर ने मेहनत की है। मगर वह बेअसर साबित होते हैं। अपने गेट-अप के साथ कई दृश्यों में वह मिथुन चक्रवर्ती की उन फिल्मों की याद दिलाते हैं जो किसी जमाने में दूर-दराज के थियेटरों के लिए बनाई जाती थी।
अनुष्का शर्मा का ऐसा मेक-अप है कि आपका ध्यान सीधे उनके होठों पर जाता है। जिन्हें लेकर गॉसिप के गलियारे काफी गरमाए रहे हैं।
चूंकि वह क्लब गायिका बनी हैं अतः आप उन्हें यहां बार-बार माइक के आगे खड़े होकर गाते देख सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि अनुराग ने फिल्म संगीत के स्वर्णकाल वाले दिनों को दिखाते हुए गानों के लिए कर्कश आवाजें चुनी हैं।
कितने स्टार के लायक है बॉम्बे वेलवेट
करन जौहर किसी कोण से विलेन नजर नहीं आते। उनकी ऐक्टिंग में भी दम नहीं है। उनकी डायलॉग डिलेवरी उनके टीवी टॉक शो जैसी है। फिल्म में पुरानी मुंबई के सैट, कलाकारों को दिया गया लुक जरूर थोड़ा आकर्षक है।
परंतु केवल यही फिल्म देखने का कारण नहीं हो सकता। कुल मिला कर बॉम्बे वेलवेट आपके मेहनत से कमाए धन से कम कीमती है। वक्त भी बर्बाद करती है। ऐसे में अपना समय और वॉलेट किसी और फिल्म के लिए संभाल कर रखें तो बेहतर होगा।
बॉम्बे वेलवेट
निर्माताः ट्वेंटिएथ सेंचुरी फॉक्स/फेंटम फिल्म्स
निर्देशकः अनुराग कश्यप
सितारेः रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा, करन जौहर, केके मेनन
रेटिंग *1/2