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Black Warrant Review: चाचा नेहरू की जेल, जैल सिंह और जानदार अदाकारी जहान कपूर की, गालियां छोड़ बाकी सब अच्छा

Sat, 11 Jan 2025 09:19 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 11 Jan 2025 09:19 PM IST
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Black Warrant Web Series Review by Pankaj Shukla Vikramaditya Motwane Zahan Kapoor Rahul Bhat Sidhant Gupta
ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
ब्लैक वारंट (वेब सीरीज)
कलाकार
राहुल भट , जहान कपूर , अनुराग ठाकुर , परमवीर सिंह , सिद्धांत गुप्ता , प्रताप फाड , विनय शर्मा और सुखविंदर चहल आदि
लेखक
सत्यांशु सिंह और अरकेश अजय
निर्देशक
विक्रमादित्य मोटवानी , सत्यांशु सिंह , अरकेश अजय , रोहिन रवींद्रन नायर और अंबिका पंडित
निर्माता
समीर नायर और दीपक सहगल
रिलीज:
10 जनवरी 2024
रेटिंग
3/5
दिल्ली के तिहाड़ जेल में नौकरी करते रहे सुनील कुमार गुप्ता ने पत्रकार सुनेत्रा चौधरी के साथ मिलकर कोई छह साल पहले एक किताब लिखी, ‘ब्लैक वारंट: कन्फेशंस ऑफ ए तिहाड़ जेलर’। कनफेशन माने दोष स्वीकृति यानी अपराध स्वीकरण और ब्लैक वारंट माने फांसी के लिए निकला थेड वारंट। किताब में बहुत कुछ ऐसा है जिसको पढ़ने के बाद अचरज इस बात पर रहा कि क्या वाकई इस किताब का सारा सच नेटफ्लिक्स अपनी इस सीरीज में दिखा पाएगा। क्या वह दिखाएगा कि अफजल गुरू की फांसी के दौरान क्या कुछ हुआ? क्या ये दिखाएगा कि सीबीआई प्रमुख रहे आलोक वर्मा ने क्या ‘गुल’ खिलाए और क्या सहारा प्रमुख की तिहाड़ में लगने वाली महफिलों का सच किताब के अनुसार नेटफ्लिक्स दिखा पाएगा? लेकिन, संसार में अब सब कुछ बदलते समय की सहूलियतों के अनुसार होता है। दोष सिद्ध ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। यहां, कांग्रेस की सरकार के समय के ज्ञानी जैल सिंह हैं, गृहमंत्री होते हुए तिहाड़ जेल के भीतर खास मकसद से आते हुए। ‘इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया’ का नारा भी है और है एक कोशिश ये बताने की कि कांग्रेस शासनकाल में एशिया की इस सबसे बड़ी जेल में क्या कुछ चलता रहा? अब ये सब बंद हो चुका है, इसकी कोई गारंटी ये सीरीज नहीं लेती लेकिन जो ‘चुन चुनकर’ दिखाती है, उसमें दिलचस्पी आखिर तक बनी रहती है।
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Black Warrant Web Series Review by Pankaj Shukla Vikramaditya Motwane Zahan Kapoor Rahul Bhat Sidhant Gupta
ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किताब से परे कहानी और भी है..
वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ इसी नाम से प्रकाशित किताब का नाट्य रूपांतरण कतई नहीं है। इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो किताब में है ही नहीं और किताब का बहुत कुछ ऐसा सनसनीखेज इसमें नहीं है जिसकी वजह से ये सीरीज देखने की दिलचस्पी पैदा होती है। सात एपिसोड की ये सीरीज है। हर एपिसोड औसतन 40 मिनट के आसपास। कलाकार इसमें विक्रमादित्य मोटवानी ने छांट छांटकर रखे हैं। सितारों के बच्चों से उनका खास लगाव रहा है। इस बार बारी अभिनेता शशि कपूर के पोते जहान कपूर की है। उनके पिता कुणाल कपूर हिंदी सिनेमा में ज्यादा चल नहीं पाए। लेकिन, बेटा बताता है कि वह कुछ तय करके कैमरे के सामने आया है। कद काठी जहान का सुपर सितारों जैसा नहीं है लेकिन अदाकारी उनके रग रग में है। वह यहां तिहाड़ के डिप्टी जेलर हैं। कलाकार उनके आसपास विक्रमादित्य ने सारे ऐसे रखे हैं कि किसी की पहले की शोहरत उन पर हावी न हो पाए। अदाकारी जहान कपूर की जानदार है। लेकिन, काफी कुछ लाइमलाइट राहुल भट चुपके से जहान कपूर की नाक के नीचे से चुरा ले जाते हैं।

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ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रक्षा सूत्र, गायत्री मंत्र और आई ड्रॉप
‘ब्लैक वारंट’ लिखने वाले सुनील कुमार गुप्ता ने अपने कार्यकाल के दौरान तिहाड़ में 14 फांसियां देखीं। सीरीज में फोकस रंगा-बिल्ला और मकबूल भट की फांसी पर है। निर्भया कांड के दोषी की मौत तिहाड़ में कैसे हुई, सीरीज नहीं दिखाती है। सुब्रत राय सहारा जब जेल में थे तो उनकी महफिलें जेल में कैसे सजती थीं, ये भी सीरीज नहीं दिखाती है। हो सकता है ये कहानियां सीरीज के दूसरे सीजन में दिखाई जाएं। सीरीज बताती है कि फांसी देने वाले जल्लाद कालू और कबीरा की शोहरत दिलीप कुमार और राजेश खन्ना जैसी है। ये चाचा नेहरू की जेल है और यहां सब मिलता है। चार्ल्स शोभराज से मिलने देश का गृहमंत्री आता है। और हीरो अपने पिता की आंखों में आई ड्रॉप डालते समय इतनी जोर से वायल दबाता है कि दवाई की धार निकल पड़ती है और तमाम दवाई तो आंख के बाहर भी आ गिरती है। लेकिन, एडीटिंग में हटाए जाने लायक इस सीन को क्वालिटी चेक में भी ओके किया गया है। सीरीज का पहला सीन ही रक्षा सूत्र बांधने का है और इसे बांध रहे पंडित जी बजाय ‘येन बद्धो बली राजा दानवेंद्रो महाबल:। तेन त्वाम् अभिबद्धनामि रक्षे माचल माचल।’ पढ़ने की बजाय गायत्री मंत्र पढ़ते नजर आते हैं। 
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ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जेल के भीतर की जुबली जैसी सियासत
पूरी सीरीज में तीन जेल अधीक्षक बदलते हैं माने कि तिहाड़ में जो कुछ गड़बड़ी होगी उसका जिम्मेदार उसे ही माना गया। जेलर वहां कंबल बेचने से लेकर राशन चुराने तक का काम करता रहा और नौकरी पर डटा रहा। डिप्टी जेलर सुनील कुमार गुप्ता यहां एक आम आदमी है जिसे कैदियों की प्रताड़ना से दर्द होता है। उन्हें कंबल न मिलने का उसे दुख होता है और वह जेल प्रशासन में सुधार और कैदियों को कानूनी सहायता मुहैया कराने के जतन करता रहता है। वह दिमाग से मजबूत हीरो है। शारीरिक रूप से उसके साथ जेलर जैसा ओहदा किसी कोने से मैच नहीं करता और यही इस सीरीज को देखने की वजह भी है। विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज को कुछ कुछ उसी तरह से रचा है जैसे उन्होंने सौमिक सेन के साथ मिलकर वेब सीरीज ‘जुबली’ में रचा था। यहां ध्यान ये रखना है कि ‘सेक्रेड गेम्स’ के रचयिताओं की सीरीज की तरह इसका प्रचार हो रहा है तो गालियां यहां भरपूर हैं और एक कहानी हट्टे कट्टे हरियाणवी डिप्टी जेलर और जेलर की बीवी की भी है।

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ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पाताल लोक से पहले तिहाड़ का कल्पना लोक
सीरीज में दिखाए गए तमाम किस्से कहानियां ऐसी हैं जो किताब में नहीं हैं। सत्यांशु सिंह और अरकेश अजय ने इसमें अपनी पूरी रचनात्मक आजादी दिखाई है और अपने ख्याली घोड़े कल्पना लोक के चारों कोनों में दौड़ाए हैं। दोनों ने विक्रमादित्य मोटवानी का निर्देशन में भी हाथ बंटाया है। सात एपिसोड के कुल पांच निर्देशक हैं। और, कहानी यहां सिर्फ एक डिप्टी जेलर की न होकर उसके दो और दोस्तों की भी हो जाती है। तीनों एक ही दिन नौकरी ज्वाइन करते हैं और सुनील कुमार गुप्ता की नौकरी लगती है तिहाड़ में बंद स्टाइलिश चार्ल्स शोभराज की बदौलत। सुनील के किरदार में जहान और चार्ल्स के किरदार में सिद्धांत गुप्ता का ये सीन ही सीरीज का पारा सेट कर देता है। दोनों के एक दूसरे के काम आने की ये अंतर्धारा सीरीज के आखिरी एपिसोड तक चलती रहती है और लड्डू बांटकर अपने उपसंहार को प्राप्त होती है। सुनील चूंकि शरीफ लड़का है तो गालियां देने के लिए यहां अनुराग ठाकुर और परमवीर सिंह चीमा हैं। तीनों किरदारों की अपनी अपनी पारिवारिक कहानियां भी हैं जो जेल के भीतर चलते किस्सों को मानवीय पुट देती रहती हैं।

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ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कुछ छुपाती, कुछ दिखाती सीरीज
वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ अपनी तमाम खामियों के बावजूद इसलिए देखने लायक सीरीज बन पड़ी है क्योंकि इसके लेखकों ने इसे रचने में मेहनत खूब की है। छोटे से छोटे किरदार को कोई न कोई दमदार सीक्वेंस देकर उसे यादगार बना देने का बढ़िया काम सत्यांशु और अरकेश ने किया है। राजेंद्र गुप्ता को शुरू में देखकर लगता है कि क्यों ही वह ये सीरीज कर रहे हैं लेकिन जब उनका किरदार अपने ग्राफ के उनवान पर पहुंचता है तो समझ आता है कि जब बात आम आदमी की ‘रेपुटेशन’ पर आती है, तो उस पर क्या बीतती है। क्या ही कमाल काम किया है उन्होंने अकाउटेंट के इस किरदार में। प्रताप फाड, विनय शर्मा और सुखविंदर चहल ने तिहाड़ जेल में त्यागी, हड्डी और सरदार गिरोहों के मुखियाओं के किरदार निभाए हैं और सीरीज की आंच अंत तक बनाए रखने में खूब मदद की है। लेकिन, सीरीज के असल कलाकार निकले हैं राहुल भट। उनकी परदे पर मौजूदगी बहुत प्रभावशाली है और एक तरह से वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ की काफी कुछ लाइम लाइट वह ही चुरा ले जाते हैं।
 

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ब्लैक वारंट (वेब सीरीज) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुकुंद गुप्ता का प्रोडक्शन डिजाइन एक नंबर
तकनीकी रूप से भी वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ अच्छी है। तिहाड़ जेल भले तिहाड़ जेल जैसा न लगता हो और भोपाल की किसी बंद पड़ी फैक्ट्री का सेटअप जैसा लगता हो लेकिन प्रोडक्शन डिजाइनर मुकुंद गुप्ता ने सीमित बजट में प्रभावशाली ताना बाना इसके लिए तैयार किया है। श्रुति कपूर ने वेशभूषा विभाग अच्छे से संभाला है, खासतौर से जहान कपूर की दो जेबों वाली शर्ट और उनकी पतलून काफी आकर्षक बनी है। विक्रम दहिया का एक्शन प्रभावशाली है। तान्या छाबड़िया की एडीटिंग स्लो है लेकिन सीरीज की शूटिंग ही बहुत आराम आराम और सीन जमा जमाकर की गई है तो उनके पास ज्यादा विकल्प कांट छांट करने को बचे नहीं है। सौम्यानंद साही ने पूरी कोशिश की है कि दिल्ली के गुजरे समय को भोपाल और मुंबई की गोल्डन टोबैको फैक्ट्री के भीतर अपने कैमरे से ठीक से कैद कर सकें। सीरीज में एक विशेष उल्लेख कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का भी बनता है जिन्होंने तमाम महत्वपूर्ण किरदारों के लिए बहुत सटीक कास्टिंग की है। 

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