Bhagwan Bharose Review: मंदिर आंदोलन से ठीक पहले के भारत की कहानी, समझिए किसने बदल दी पूरी एक पीढ़ी की सोच
शिलादित्य बोरा का नाम आम फिल्म दर्शकों के लिए भले अपरिचित हो लेकिन स्वतंत्र फिल्म निर्माता-निर्देशकों के लिए वह संजीवनी बूटी लाने वाले हनुमान जी से कम नहीं रहे हैं। कद काठी भी शिलादित्य की वैसी ही है। कोई सात-आठ साल पहले देश में जब स्वतंत्र फिल्मकारों की एक बयार सी बही थी तो शिलादित्य ने इन छोटे बजट की लेकिन कथानक से समृद्ध कहानियों को मल्टीप्लेक्स में दिखाए जाने के लिए पीवीआर के साथ रहकर ‘डायरेक्टर्स रेयर’ नाम से एक श्रृंखला शुरू की। बाद में वह ‘मसान’ और ‘न्यूटन’ जैसी फिल्मों के निर्माण में उत्प्रेरक सरीखी भूमिका में रहे। और, अब वह खुद बतौर निर्देशक मेज की दूसरी तरफ हैं, एक ऐसी फिल्म लेकर जो देखने वालों को ये सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में जो कुछ होता, घटता रहता है, उसका बालमन पर क्या असर होता है? क्या जो कुछ टेलीविजन पर परोसा जाता रहा है या परोसा जा रहा है, वह देश की पूरी एक पीढ़ी की सोच नहीं बदल दे रहा है? और, बदलाव भी कैसा?
राम मंदिर आंदोलन के पहले का भारत
ये ठीक है कि सिनेमा को सॉफ्ट पॉवर के रूप में आगे बढ़ाने का ख्याल नीति नियंताओं को जरा देर से आया है। चीन, रूस और अमेरिका का सिनेमा ये काम बरसों से कर रहा है। उसका उद्देश्य अपनी नीतियों को दुनिया भर में प्रसारित करना है। इन देशों की फिल्में अपनी संस्थाओं का एक ऐसा हौव्वा दुनिया के सामने बनाकर रखती हैं कि दुश्मन फिल्म देखकर ही डर जाए। सामने आकर दो दो हाथ करना तो दूर की बात है। लेकिन, ये तिलिस्म कभी कभी टूट भी जाते हैं, जैसा मोसाद का तिलिस्म हाल के आतंकवादी हमलों से टूटा। खैर, उतनी दूर न जाकर चलते हैं फिल्म ‘अब तो सब भगवान भरोसे’ में दिखाए गए देश के एक ऐसे गांव में जहां बिजली अभी बस पहुंची पहुंची है। गांव वाले कटिया डालकर बिजली जलाने को अपना अधिकार समझते हैं और महाभारत का प्रसारण शुरू होने पर पूजा पाठ होना साप्ताहिक कार्यक्रम है। कहानी ये उस 1989 के कालखंड की है जब देश में धर्म की रक्षा करने को पूरी एक सोच बलवती होनी शुरू हो गई है। लोग राह चलते मंदिर बनवाने के लिए चंदा ‘वसूल’ रहे हैं और कदम कदम पर मंदिर बना देने की बात कह रहे हैं।
‘असुरों’ के शिकार पर निकले बच्चे
फिल्म ‘अब तो सब भगवान भरोसे’ कहानी दो बच्चों की है। गांव में कुएं की जगत पर बैठकर दोनों नाग लोक और नर्क लोक पर चर्चा कर रहे हैं। स्कूल की पढ़ाई में मन लगता नहीं है। जिले के बड़े अफसर के आने पर जब सवाल सूर्य ग्रहण का आता है तो बड़ा बच्चा धरती और चंद्रमा की सापेक्षिक गति की बात भूलकर राहु और केतु की कथा समझाने लगता है। गलती बच्चे की नहीं क्योंकि प्रारंभिक शिक्षा उसने गांव के जिन पंडित जी से पाई, उन्होंने कक्षा में पढ़ाया ही यही था। पंडित जी और भी बहुत कुछ पढ़ाते हैं। सत्यनारायण की कथा पूरी होते ही पति के बंबई से गांव पहुंच आने को वह धर्म का ही चमत्कार बताते हैं। बस बोकारो बाबा को बता ये नहीं पाते हैं कि आखिर सत्यनारायण कथा के पांचों अध्यायों में जिस कथा का जिक्र बार बार आता है, वह कथा आखिर क्या है? धर्म आस्था का प्रश्न है और जहां आस्था हो वहां भला प्रश्न की क्या जरूरत! घर के दोनों बच्चे पूरी तरह से ‘धार्मिक’ हो चुके हैं। पड़ोस में बसे मुसलमानों के गांवों के बारे में उनकी जानकारी यही है कि वहां असुर रहते हैं। तो वह निकल पड़ते हैं हाथ में तीर कमान लेकर असुर मारने। दिक्कत बस ये है कि धारावाहिक ‘महाभारत’ में जो मंत्र पढ़कर तीर मारे जाते हैं, वे मंत्र उन्हें पंडितजी सिखा नहीं रहे..!
इस कथा की अंतर्कथा गंभीर है!
राम जन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती दिनों की पृष्ठभूमि में रची गई ये कहानी सुधाकर की है। सुधाकर नीलमणि ने मोहित चौहान के साथ मिलकर इसकी पटकथा भी लिखी है। जो बच्चे उस दौर में बड़े हुए हैं, उन्हें शिलापूजन से लेकर घरों पर भगवा ध्वज फहराने की घटनाएं अब भी याद हैं। मिश्रित आबादी वाले गांवों में प्रेम से रहते आए लोगों में ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के आने तक भी खलल नहीं पड़ा था। लेकिन, ऐसा क्या हुआ कि यही कहानियां अपने अलग रूप में सुनाने वालों के पीछे धीरे धीरे ऐसा मजमा लगना शुरू हुआ कि बात 6 दिसंबर तक जा पहुंची। ये पूरी की पूरी फसल तो फिल्म ‘अब तो सब भगवान भरोसे’ नहीं दिखाती है लेकिन हां जिन जुगत से ये फसल लहलहाई, वह खेती और उसके बीजों का मुआयना शिलादित्य बोरा अपनी इस फिल्म में बखूबी कराते हैं।
सिनेमाघरों तक पहुंचा शुभ संदेश
छोटे बजट की फिल्म है ‘अब तो सब भगवान भरोसे’, तो जाहिर है कि कलाकार भी बहुत नामचीन फिल्म में नहीं हैं। विनय पाठक और मनु ऋषि चड्ढा की मौजूदगी फिल्म देखने की ललक आम दर्शक में भले न जगाए लेकिन इन दोनों के होने का फायदा ये है कि कम से कम सिनेमा के सुधी दर्शक इसकी तरफ खिंचे चले आए। शिलादित्य का ये अपना प्रताप है कि पीवीआर जैसी सिनेश्रृंखला उनकी फिल्म रिलीज करने को तैयार हो गई है। और, इस फिल्म को देख अगर गिनती के लोगों की सोच पर भी कुछ असर पड़ा तो शिलादित्य की मेहनत सफल है। देश विदेश में इनाम इकराम बटोर आई इस फिल्म का चलना, न चलना उतना जरूरी नहीं है जितना कि इसे सिनेमाघर, ओटीटी या फिर टीवी चैनलों पर देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों द्वारा देखा जाना।
सतेंद्र के नाजुक कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी
शिलादित्य ने फिल्म में मेहनत बहुत की है। लिलुडीह के उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के छात्रों को अभिनय सिखाकर उन्होंने उनसे फिल्म में एक्टिंग कराई है। देवघर में जहां फिल्म की शूटिंग हुई है, वहां के तमाम स्थानीय लोग भी फिल्म के कलाकार बन गए हैं। भोला बने सतेंद्र सोनी ही फिल्म के असल नायक हैं। बालपन की बदमाशियां, अंगड़ाइयां और गुस्ताखियां अपने अभिनय में समेटे सतेंद्र ने हाफ पैंट में ही बड़े हो जाने वाले किशोर का किरदार बखूबी निभाया है। इन दिनों गांव, देहात और शहरों में एक खास संगठन के कर्ताधर्ता बन चुके कइयों को इस किरदार में अपना बचपन नजर आएगा। भोला अगर गरम दल का अगुआ है तो उसका छोटा भाई शंभू नरमपंथी है। फिल्म के क्लाइमेक्स का जो इशारा है वह सामाजिक विसंगति का एक और कटु सत्य है। विनय पाठक इन बच्चों के नाना बाबू बने हैं। मछलियों को आटे की गोली खिलाते, गांव वालों को टीवी और एंटीना का मतलब समझाते नाना बाबू के किरदार में विनय ने बहुत ही सहज अभिनय किया है।
मौसमी और मनु का चित्ताकर्षक अभिनय
फिल्म ‘अब तो सब भगवान भरोसे’ में दो कलाकारों का अभिनय खासतौर से गौर करने लायक है। एक तो बोकारो बाबा बने मनु ऋषि चड्ढा जो हैं तो फिल्म में मेहमान कलाकार की भूमिका में लेकिन जब भी वह परदे पर दिखते हैं फिल्म को रोशन कर जाते हैं। ये किरदार कुछ कुछ उन वामपंथियों जैसा है जिसे दक्षिणपंथी अब अछूत समझते हैं। गांव का पंडित तो घर के बाहर लकीर खींचकर उसे उसके बाहर ही रहने तक को कह देता है। वह भी उस शख्स के घर के बाहर जो उसे सत्यनारायण की कथा में शामिल होने तक को राजी कर लाया था। और, दूसरा जो कलाकार इस फिल्म की ऊष्मा से सिनेमा में अभी और रोशन हो सकता है वह हैं मौसमी मखीजा। 20 साल पहले विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में अब्बाजी की बेटी बनी दिखी मौसमी फिल्मी परिवार से हैं, लेकिन ये देखकर अचरज होता है कि इतना स्वाभाविक अभिनय करने के बावजूद वह हिंदी सिनेमा के फोकस में क्यों नहीं है। इतना भावप्रवण चेहरा ही तो आज की डिजिटल कहानियों की जरूरत है। मौसमी ने दो बच्चों की मां के किरदार में दिल खोलकर अभिनय किया है और दर्शकों का दिल जीत लिया है।
सिनेमैटोग्राफी ने बांधा समां
तकनीकी तौर पर फिल्म ‘अब तो सब भगवान भरोसे’ अपनी फोटोग्राफी से काफी प्रभावित करती है। खासतौर से सुरजोदीप घोष ने जिस तरह से देवघर के आसपास के इलाकों को कहानी के साथ एक पात्र की तरह विकसित किया है, वह देखने लायक है। ग्रामीण जीवन की सहजता को उन्होंने अपने कैमरे से गति दी है। अपने पिता को संदेश भेजने के लिए पतंग लेकर गांव के पास के टीले तक पहुंचने के लिए भागते भोला और शंभू वाला दृश्य यहां गौर करने लायक है। फिल्म की पटकथा में थोड़ा और काम करने की जरूरत नजर आती है क्योंकि पूरी फिल्म आखिर के कुछ मिनटों में आकर एकदम से बहुत कुछ कहने की कोशिश करने लगती है। फिल्म की एक कमजोर कड़ी इसका संगीत भी है। लोकसंगीत के मास्टर समझे जाने वाले इंडियन ओशन बैंड से फिल्म में एक दो ऐसे गीतों की उम्मीद थी जो लोगों को फिल्म की आत्मा महसूस करने का और करीब से मौका दे सकें। संकलन, वेशभूषा और और कला निर्देशन में भी बेहतरी की गुंजाइश दिखती है।