Badhaai Do Review: समलैंगिकों के इंद्रधनुषी ब्याह की सतरंगी कहानी, आयुष्मान के फॉर्मूले में राजकुमार की नई रवानी
आमतौर पर कहा यही जाता है कि हिंदी सिनेमा में कहानियों की कमी है। टाइम्स समूह की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी जंगली पिक्चर्स ने इस मामले में उदाहरण पेश करने की समय समय पर तारीफ लायक कोशिशें की हैं कि इसके प्रबंधन ने लीक से इतर फिल्मों को न सिर्फ सहारा दिया बल्कि एए फिल्म्स व जी स्टूडियोज जैसे दिग्गज वितरकों के जरिये इन्हें हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचाने की पूरी कोशिश भी की। लेकिन, 2022 में सिनेमा बदल रहा है। हिंदी सिनेमा को भी इस ट्रेन में बैठना ही होगा। नहीं तो ये पीछे छूट जाएगा। फिल्म ‘बधाई दो’ इसी फ्रेंचाइजी की पिछली फिल्म ‘बधाई हो’ की ही तरह सामाजिक और पारिवारिक ताने बाने में वर्जित विषय पर बनी फिल्म है। देखा जाए तो ये फॉर्मूला आयुष्मान खुराना का है कि एक वर्जित विषय को किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि में डालकर एक कहानी रच दी जाए। दिक्कत इस फॉर्मूले में अब ये आ रही है कि इसमें वर्जित विषय तो फिल्म दर फिल्म बदल जा रहे हैं लेकिन इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि तकरीबन एक जैसी हो चली है। आयुष्मान की पिछली फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ इसी के चलते फ्लॉप हुई और अब ‘बधाई दो’ के सामने भी बॉक्स ऑफिस की तगड़ी चुनौती है।
कोरोना की तीसरी लहर के बाद राजकुमार राव पर फिर दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने की वैसी ही जिम्मेदारी है जैसी पहली लहर के बाद उन्होंने अपनी फिल्म ‘रुही’ के जरिये उठाई थी। संयोग ये है कि राजकुमार राव दोनों फिल्मों में अपने हिस्से काम बखूबी करने में कामयाब रहे। इस बार उनकी जोड़ीदार भूमि पेडनेकर हैं। आयुष्मान की तरह ही भूमि को भी ऐसी फिल्में करने का श्रेय दिया जाना चाहिए, जिसमें हीरोइन लंबी, पतली, सुंदर और गोरी नहीं होती। वह हिंदुस्तानी लड़कियों की नई हिम्मत हैं। वे लड़कियां जो दिन भर मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर पर दिखने वाले विज्ञापनों की तरह ‘परफेक्ट’ नहीं बनना चाहतीं। फिल्म ‘बधाई दो’ की कहानी में ट्विस्ट भी ऐसे ही आता है। इसके किरदार भी ‘परफेक्ट’ नहीं हैं। हीरो पुलिसवाला है। हीरोइन टीचर है। दोनों के घर वाले शादी को लेकर शोर मचाते रहते हैं। लेकिन दोनों की लाइन घरवालों के हिसाब से ‘छोटी’ है। आदमी के आदमी से और औरत के औरत से प्रेम करने की इस कहानी में पंगे बहुत हैं। कारनामे भी ढेर सारे हैं। बस, ऐसी कहानियों के अंत तार्किक कम ही हो पाते हैं।
फिल्म ‘बधाई दो’ दो ऐसे लोगों की कहानी है जिनके जीवन इंद्रधनुषी है, एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय की कहानियां सिनेमा में लाने के लिए खूब पैसा आ रहा है, कहां से आ रहा है, ये शोध का विषय है। ओटीटी वाले ऐसी फिल्मों के लिए इतना पैसा एक मुश्त दे रहे हैं कि फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर चलना न चलना अब खास मायने भी नहीं रखता, बशर्ते फिल्म के नायक नायिका जाने पहचाने हों। ओनीर की सेना के एक समलैंगिक अफसर पर प्रस्तावित फिल्म को भारतीय सेना ने भले इजाजत न दी हो, लेकिन देश के अलग अलग राज्यों की पुलिस ने अभी ऐसा कोई फरमान जारी नहीं किया। सोचिए अगर पुलिस ठान ले कि उसको भ्रष्टाचार में लिप्त होने वाली फिल्में रिलीज नहीं होने दी जाएंगी और पुलिस किरदारों पर बनने वाली फिल्मों की स्क्रिप्ट भी पहले मंजूर करानी होगी, तो क्या होगा? तब फिल्म ‘बधाई दो’ शायद ही बन पाती और कहीं शिक्षक संघों ने भी ऐसा ही कुछ ठान लिया तो पता नहीं क्या होगा।
समलैंगिक पुलिस वाले और समलैंगिक पीटी टीचर की इस कहानी में दोनों के घरवालों को खुश रखने की शादी तक जो बवाल मचता है वो तो मजेदार है ही, फिल्म का असली मजा तब आता है जब दोनों का राज खुल जाता है। ये बात तो सही है कि फिल्म अच्छी बनी है। लेकिन, फिल्म थिएटर जाकर देखने लायक बनी है कि नहीं ये कोरोना संक्रमण काल में जान हथेली पर लेकर घऱ से निकलने की हिम्मत पर निर्भर करता है। सिनेमा में दर्शकों को खींचकर लाने के लिए जरूरी चुंबक जैसा इसमें कुछ नहीं है। फिल्म छोटे शहरों की मध्यवर्गीय परिवारों की कहानी है जिसमें दो समलैंगिकों के विवाह का मामला फिट कर दिया गया है। एक सेट फॉर्मूले पर बनी फिल्म में जो कुछ नया है वह इसके कलाकार और निर्देशक ही हैं। और, इनमें भी सबसे आगे रहीं हैं उत्तर पूर्व की कलाकार चम दरांग। उनका बड़े परदे पर डेब्यू स्वागत योग्य है। मॉडल तो वह धमाल रही ही हैं। अभिनय भी कमाल का करती हैं।
अक्षत घिल्डियाल ने फिल्म की कहानी में वे तमाम मसाले डाले हैं जिन्हें वह अपनी पिछली फिल्म ‘बधाई हो’ में आजमा चुके हैं। अपनी डेब्यू फिल्म ‘हंटर’ के सात साल बाद हर्षवर्धन कुलकर्णी को एक और फिल्म दर्शकों तक लाने का मौका मिला है, और इस बार वह अपने इस प्रयोग मे फेल तो नहीं हुए हैं। हां, बतौर निर्देशक उनको अगर सिनेमा बनाना है तो इसके विषय भी ऐसे चुनने होंगे तो भव्य, नयनाभिराम और विशाल हो सकें। फिल्म में दर्शकों को खींचकर सिनेमाघरों तक लाने वाले दृश्यों की कमी है और ये इसके बावजूद कि फिल्म में राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर दोनों ने अभिनय कमाल का किया है।