All We Imagine as Light Review: मुंबई में जीने का फलसफा समझाती एक सिने कविता, कैसे, एक हूक जब जीवन बन जाती है
फ्रांस, भारत, नीदरलैंड और लग्मबर्ग के चार निर्माताओं की मिली जुली कोशिश फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ पुरस्कारों की राजनीति पर एक करारा तमाचा है। जिस फिल्म को कान फिल्म पुरस्कार में समारोह का दूसरा सबसे प्रतिष्ठित यानी कि ग्रां प्रि पुरस्कार जीतने पर पूरे देश ने सिर आंखों पर बिठा लिया, उसे फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने शायद भारतीय फिल्म ही नहीं समझा। उसे आमिर खान के नाम में ज्यादा वजन नजर आया। ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ में काम करने वाली अभिनेत्री छाया कदम की मानें तो उन्हें फिल्म ‘लापता लेडीज’ के ऑस्कर जाने की जानकारी तीन चार दिन पहले ही मिल गई थी, फिर फिल्म की निर्देशक किरण राव ने उन्हें समझाया कि अभी कागजी कार्रवाई बाकी है। देख रहा है बिनोद, कौन सी पंचायत बैठती है सिनेमा बनाने वालों के बीच।
कान के किनारों से अब गोवा के किनारे
समंदर किनारे किनारे घूमती रही फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ कान से होकर मुंबई होते हुए गोवा आ पहुंची है। फिल्म शुक्रवार से केरल के तमाम सिनेमाघरों में रिलीज हो जाएगी। देश के बाकी तमाम सिनेमाघरों में भी ये दिख सकती है। मौसम देश भर में इन दिनों बदल रहा है और ये मौसम ही पायल कपाड़िया की इस फिल्म की अंतर्धारा है। भोर होने से पहले ब्रह्म मुहूर्त में मुंबई के दादर सब्जी मंडी और फूल मंडी में पूरा हिंदुस्तान है। कोई भोजपुरी में बतिया रहा है। किसी की बोली मराठी है। हिंदी और दूसरी भाषाओं में भी सब बोल रहे हैं और सबको सब समझ आ रहा है। ये भी कि मुंबई काम करने के लिए शहर बढ़िया है, रहने लायक ये शहर अब तक बन नहीं पाया है। ये पायल कपाड़िया का इस शहर पर बहुत तीखा तंज है। जिनको भी अटल सेतु के पीछे की कहानी पता है, वे जानते हैं कि इस शहर का सारा विकास बिल्डरों की मर्जी से चलता है। जब तक उनके प्रोजेक्ट नहीं बिकते तब तक न अटल सेतु बनता है और न ही अंधेरी से मीरा रोड तक कोस्टल रोड..!
राइस कुकर से लिपटकर रोती प्रभा
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ मुंबई में ही शुरू होती है। एक नर्स है प्रभा यानी कनी कुश्रुति। चेहरे से सख्त मिजाज लेकिन भीतर ही भीतर कहीं से टूटी हुई। ये जो सख्त मिजाज लोग होते हैं, न वे भीतर से बहुत मुलायम होते हैं। नारियल की मलाई की तरह। प्रभा ने अपने पति को कम ही देखा। फिर वो जर्मनी चला गया और ये यहां मुंबई। लोकल ट्रेन में पिसती घिसटती रहती है और एक दिन दरवाजे पर जब राइस कुकर आता है तो उसकी ख्वाहिशें भी इंटरनेशनल हो उठती हैं। कुछ कुछ वॉन्ग कार वाई की फिल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ की तरह। राइस कुकर को दबोच कर उसका सिसकना विरह की पीड़ा का हाल के दिनों का सबसे अच्छा उनवान है।
नर्स अनु की बागी प्रेम कहानी
कहानी की दूसरी नायिका अनु के किरदार में दिव्या प्रभा हैं। वह जिस्म, जान और जहान सबसे बागी है। उसी अस्पताल में हैं जहां प्रभा काम करती है, उसकी जूनियर है। सड़क पार करते बिना एक दूसरे के देखे जब उसका हाथ आकर उसका बॉयफ्रेंड शियाज थामता है तो सिनेमा को प्रेम का एहसास दिखाने का एक नया सबक मिलता है। प्रेम के एकाकी पल भरी भीड़ में भी तलाशे यूं ही जाते हैं। दोनों के धर्म अलग अलग हैं। लड़की बुर्का पहनकर इसमें सहूलियत लाने को तैयार है। लेकिन, मौसम उनको फुर्सत के दो पल भी नहीं देता। बस बिना देखे बरस जाता है।
और, सामाजिक शतरंज पर पार्वती
प्रभा और अनु साथ रहती हैं, ये बात फिल्म शुरू में ही हमें नहीं बताती। दोनों के जीवन का संघर्ष सजाने के बाद फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’हमें उस जगह लाती है, जहां दोनों साथ रहती हैं। मुंबई का दमघोंटू सा माहौल एकदम से नीला नीला हो जाता है। फिल्म शुरू से यही कलर पैलेट लेकर चलती है। पायल को भी ये रंग खास ही पसंद रहा होगा, इस कहानी में। उनकी नानी की डायरी की कहानियां भी पुरुष प्रलाप का बहाना यहां बनती रहती हैं, लेकिन यहां प्रभा और अनु की कहानी का संगम पार्वती की कहानी से होता है। छाया कदम यहां फिर चाय बेचने वाली के किरदार में हैं। मुंबई की बंद हो चुकी मिलों की जगह बन रहे घरों में एक घर उसका भी होना चाहिए, लेकिन जैसा असल मुंबई में है, वैसा ही यहां भी है। पायल कपाड़िया सियासी शतरंज की चालें इतनी सरलता से चलती हैं कि पता ही नहीं चलता घोड़ा ढाई घर कब बैठेगा।
गंगोत्री की तरफ बहती गंगा
और, फिर होता है मुक्ति गान! मुक्ति गान बोले तो मुंबई शहर से निकल भागने की फुर्सत मिलना। इस शहर में वाकई सीधे, सरल और सहज लोगों का दम घुटता है। यहां सब किसी न किसी प्लानिंग में हैं। शब्दों के, मदद के, सलाहों के सीधे मायने नहीं समझते लोग। सबको उसके पीछे का ‘अर्थ’ पता करना है, फिर चाहे वो हो या न हो। पार्वती तय करती है कि वह गंगोत्री की तरफ लौटेगी यानि कि अपने गांव। यहां आकर उसका मन मयूर नाच उठता है। अनु का आशिक भी यहां तक चला आया है। दोनों औरंगाबाद की गुफाओं में जब होते हैं तो दर्शक भी वहां खुद को महसूस करते हैं। अनु अपने साथ लोगों की आंखें ले चलती है और जब वह अपने सबसे अंतरंग समय में होती है तो प्रभा की आंखें भी इनमें आ शामिल होती हैं। लेकिन, दोनों की आपस में आंखें मिलती नहीं हैं, बस दोनों का नजरिया मिलता है और दर्शक आनंद के उत्कर्ष पर खुद को पाता है।
अवसि देखिअहिं देखन जोगू
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ भारत की तरफ से ऑस्कर में आधिकारिक प्रविष्टि बनकर क्यों नहीं गई, उसके कारण तमाम हो सकते हैं। कुछ कारण यहां गोवा में भी सुनने को मिलते हैं, मुंबई में तो खैर इसकी एक वजह हर फिल्म निर्माता के पास है। फिल्म की कुछ अपनी दिक्कतें भी हैं, मसलन इसका संगीत धृतिमान दास ने जो तैयार किया है, वह इतना अच्छा है कि शोर के आदी दर्शकों को ये समझ भी आएगा, इसमें संदेह है। रणबीर दास का कैमरा सूत्रधार की तरह फिल्म को अपने कांधे पर लिए चलता है। उनका काम बहुत अच्छा है। क्लीमेंट पिंटेआक्स का संपादन भी प्रभावी है। पीयूष चालके, शमीम खान और यशस्वी सभरवाल ने फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन करीने से की है, खासतौर से औरंगाबाद की गुफाओं के सेट्स बहुत प्रभावी हैं। फिल्म देखने का मौका मिले तो देखिएगा जरूर। कोशिश करें कि ऐसे लोगों के साथ जाएं तो अच्छा सिनेमा समझते हों।
फिल्म 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' के सितारों का वीडियो इंटरव्यू यहां देख सकते हैं।