695 Review: अयोध्या मंदिर निर्माण के 500 साल के संघर्ष को दिखाती फिल्म, थियेटर जाने से पहले यहां पढ़ें रिव्यू
सनातन धर्म और प्रभु श्रीराम के भक्तों के लिए अयोध्या में प्रभु श्रीराम के प्राण प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन किसी बड़े उत्सव से कम नहीं हैं। 500 वर्षों के लंबे संघर्ष के बार प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ। वैसे तो फिल्म '695' में राम जन्म भूमि मंदिर के 500 साल के संघर्ष दिखाया गया है लेकिन, कहानी मुख्य रूप से 6 दिसंबर 1992 में ढांचा विध्वंस, 9 नवंबर 2019 को न्यायालय का फैसला और 5 अगस्त 2020 को मंदिर के शिलान्यास के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए फिल्म का शीर्षक '695' रखा गया है।
फिल्म की कहानी 1528 की घटनाक्रम से होती है जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर को ध्वस्त करके मुगल बाबरी मस्जिद का निर्माण करते हैं। उसके बाद कहानी 1943 से शुरू होती हैं, जब गुरु राघवदास अपने शिष्यों के साथ प्रभु श्रीराम की पूजा अर्चना कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग उस पूजा का विरोध करते हैं कि शंखनाद और घंटों की आवाज से उनकी इबादत में बाधा हो रही है। गुरु राघवदास अपने शिष्य रघुनंदन के साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों से मिलकर इस बात पर विचार विमर्श करते हैं कि कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे मंदिर मस्जिद का विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाए, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोग इस बात से इनकार कर देते हैं। साल 1949 में मस्जिद में स्वतः प्रभु श्रीराम की मूर्ति प्रकट हो जाती है और उसे विवादित जगह बताकर मंदिर में ताला लगा दिया जाता और फैसला अदालत पर छोड़ दिया जाता है।
गुरु राघवदास का एक ही सपना है कि किसी तरह से मंदिर का निर्माण हो, उनके शिष्य रघुनंदन दास थोड़े उग्र स्वभाव के हैं। लेकिन गुरु राघवदास समझाते हैं कि एक रास्ता बंद हुआ तो क्या हुआ, हजार रास्ते खुलेंगे, लेकिन वह शांति से होगा। मरते हुए अपने गुरु को रघुनंदन दास वचन देते हैं कि वह मंदिर के निर्माण में अपना जीवन समर्पित कर देंगे। साल 1949 से लेकर 9 नवंबर 2019 तक न्यायालय का फैसला आने तक के घटनाक्रम को इस फिल्म में दिखाया गया है। इस फिल्म का निर्देशक योगेश भारद्वाज और रजनीश बेरी ने किया है। इंटरवल से पहले फिल्म की कहानी दर्शकों को बांधे रखती हैं, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म की कहानी थोड़ी सी बिखर जाती है।
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इस फिल्म के तीन मजबूत पक्ष है। आदेश के अर्जुन के लिखे जबरदस्त संवाद, फिल्म के कलाकारों का परफॉर्मेंस और फिल्म का संगीत। बाकी इस फिल्म में जितने भी जितने भी घटनाक्रम दिखाए गए हैं, उससे आम जनता भली भांति परिचित है। गुरु राघव दास की भूमिका में अरुण गोविल का अभिनय उत्कृष्ट रहा है। खास करके जब वह सपने में देखते है कि प्रभु श्रीराम अयोध्या आ गए हैं, वह सीन द्रवित कर देता है। रघुनंदन दास की भूमिका में अशोक समर्थ अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं, देखा जाए तो फिल्म की कड़ी अशोक समर्थ ही हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में वकील की पांच मिनट की भूमिका में मनोज जोशी का जबरदस्त परफॉर्मेंस रहा है। मुस्लिम युवक की भूमिका में दयाशंकर पांडे और शैलेन्द्र श्रीवास्तव और जिलाधिकारी की भूमिका में मुकेश तिवारी का किरदार भले ही छोटा क्यों ना हो अपना एक अलग प्रभाव छोड़ते हैं।
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फिल्म में लाल कृष्ण आडवाणी की भूमिका में के के रैना निभाई है। इस भूमिका को उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है और वह इस किरदार में उन्होंने अपने आपको पूरी तरह से ढाल लिया। बाकी जितने भी नेताओं के किरदार में कलाकारों का चयन किया गया है, वह रैना जैसा अच्छा नहीं है। जब लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा की शुरुआत होती है तो नरेंद्र मोदी के किरदार आज के दौर का दिखाया गया है, जबकि उस समय उनकी सफेद दाढ़ी नहीं थी। अटल बिहारी बाजपेयी, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, प्रमोद महाजन के किरदार का चयन सही ढंग से नहीं किया गया। शम्भूनाथ की भूमिका में गोविंद नामदेव और महामंडलेश्वर की भूमिका में अखिलेन्द्र मिश्रा पूरी फिल्म में सिर्फ ओवर एक्टिंग ही करते नजर आए। अखिलेंद्र मिश्रा को इस फिल्म में देखकर ऐसा लगा कि अभी भी वह 'चंद्रकांता' के किरदार से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
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इस समय पूरा देश जिस तरह से प्रभु श्रीराम की भक्ति में डूबा है, अगर इस फिल्म को सही तरीके से प्रमोट किया गया होता तो इस फिल्म से दर्शक जरूर जुड़ते। फिल्म का प्रोडक्शन वैल्यू भले ही शून्य हो, लेकिन जिस तरह से देश में प्रभु श्रीराम के प्रति इन दिनों प्रगाढ़ आस्था देखने को मिल रही है, अगर फिल्म को सही तरीके से प्रमोट किया गया होता तो इस फिल्म को जरूर फायदा मिलता। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, संकलन सामान्य हैं। फिल्म के अधिकांश दृश्यों की शूटिंग क्रोमा पर हुई है और इसके तकनीकी कौशल में विफल रहने के चलते फिल्म का असर भी जाता रहा है।
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