{"_id":"6aec50f1c3a6124b22055461","slug":"how-ramayana-vfx-made-ranbir-kapoor-yash-sai-pallavi-namit-malhotra-2026-11-05","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"रामायण: अगरबत्ती से बनता था कोहरा, रूई से बादल.. एक युद्ध सीन पर लगे साढ़े छह साल; वीएफएक्स की अनसुनी कहानी","category":{"title":"Entertainment","title_hn":"मनोरंजन","slug":"entertainment"}}
रामायण: अगरबत्ती से बनता था कोहरा, रूई से बादल.. एक युद्ध सीन पर लगे साढ़े छह साल; वीएफएक्स की अनसुनी कहानी
सार
- 1987 में रामानंद सागर की रामायण में रूई से बादल बनाए जाते थे।
- अब नमित मल्होत्रा की रामायण में हजारों लोग वीएफएक्स पर काम कर रहे हैं।
- एक युद्ध सीन तैयार करने में साढ़े छह साल लगे। जानिए चार दशक में रामायण को पर्दे पर दिखाने की तकनीक कितनी बदल गई।
विज्ञापन
रामायण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
नमित मल्होत्रा की ‘रामायण: पार्ट वन’ रिलीज हो चुकी है। रणबीर कपूर, यश, साई पल्लवी और सनी देओल की इस फिल्म में कई ऐसे सीन्स हैं, जिन्हें देखकर अंदाजा लगता है कि इन्हें तैयार करने में कितनी मेहनत लगी होगी। भगवान विष्णु का विराट रूप, इंद्र के वाहन ऐरावत, सोने की लंका और रावण-जटायु का युद्ध...इन सभी सीन्स को बड़े पर्दे पर दिखाने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कुछ सीन्स बेहद भव्य हैं। हालांकि, कुछ राक्षसों के किरदार उतने असली नहीं लगते। उन्हें देखकर समझ आता है कि वे कंप्यूटर की मदद से बनाए गए हैं।
इस फिल्म के पीछे हजारों कलाकारों और तकनीशियनों ने काम किया है। निर्देशक नितेश तिवारी के मुताबिक, रावण और जटायु के युद्ध का एक सीन तैयार करने में करीब साढ़े छह साल लगे। पुष्पक विमान का डिजाइन तय करने में लगभग दो साल लगे। इसके लिए 40 से 50 डिजाइन बनाए गए।
विज्ञापन
इस फिल्म के पीछे हजारों कलाकारों और तकनीशियनों ने काम किया है। निर्देशक नितेश तिवारी के मुताबिक, रावण और जटायु के युद्ध का एक सीन तैयार करने में करीब साढ़े छह साल लगे। पुष्पक विमान का डिजाइन तय करने में लगभग दो साल लगे। इसके लिए 40 से 50 डिजाइन बनाए गए।
विज्ञापन
Trending Videos
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
दोनों पार्ट को मिलाकर करीब 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसमें फिल्म बनाने से लेकर उसकी शूटिंग के बाद के काम और दुनियाभर में प्रचार तक का खर्च शामिल है। फिल्म के कई बड़े सीन्स तैयार करने में भी काफी पैसा और समय लगा है। VFX के लिए देश-विदेश के कई स्पेशलिस्ट ने काम किया है।
आज एक सीन को तैयार करने में वर्षों लग रहे हैं, लेकिन करीब चार दशक पहले रामानंद सागर ने सीमित साधनों के बीच रामायण को छोटे पर्दे पर उतारा था। उस समय न कंप्यूटर से सीन बनाए जा सकते थे और न ही आज जैसे बड़े स्टूडियो थे। इसके बावजूद उनकी रामायण के कई सीन आज भी लोगों को याद हैं।
आज एक सीन को तैयार करने में वर्षों लग रहे हैं, लेकिन करीब चार दशक पहले रामानंद सागर ने सीमित साधनों के बीच रामायण को छोटे पर्दे पर उतारा था। उस समय न कंप्यूटर से सीन बनाए जा सकते थे और न ही आज जैसे बड़े स्टूडियो थे। इसके बावजूद उनकी रामायण के कई सीन आज भी लोगों को याद हैं।
विज्ञापन
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
नौ लाख रुपये में तैयार होता था एक एपिसोड
साल 1987 में दूरदर्शन पर रामानंद सागर की ‘रामायण’ शुरू हुई थी। उस समय कंप्यूटर से सीन बनाने की सुविधा नहीं थी। ऐसे में टीम को कैमरे की तरकीबों, छोटे मॉडल और दूसरी तकनीकों से काम चलाना पड़ता था।
एक बातचीत में, रामानंद सागर के बेटे मोती सागर ने बताया था कि कोहरा दिखाने के लिए धूप और अगरबत्ती जलाई जाती थी। बादल बनाने के लिए रूई का इस्तेमाल होता था। धनुष से तीर निकलने और उसके असर को दिखाने के लिए SEG 2000 नाम की मशीन का इस्तेमाल किया गया था।
उनके मुताबिक, उस समय रामायण का बजट करीब नौ लाख रुपये प्रति एपिसोड था। हनुमान को उड़ते हुए दिखाना हो या पुष्पक विमान और युद्ध के सीन्स तैयार करने हों, हर बार टीम को अलग तरीका निकालना पड़ता था। आज की तरह कंप्यूटर पर पूरी दुनिया बनाने की सुविधा नहीं थी।
रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने भी बताया था कि उस दौर में कंप्यूटर से इफेक्ट्स तैयार करने की सुविधा नहीं थी। टीम बैक प्रोजेक्शन, छोटे मॉडल, स्लाइड प्रोजेक्टर और कैमरे की मदद से दृश्य बनाती थी। पहाड़ दिखाने होते थे, तो उनके छोटे मॉडल तैयार किए जाते थे। कांच पर तस्वीरें और आकृतियां बनाकर भी शूटिंग में उनका इस्तेमाल होता था।
साल 1987 में दूरदर्शन पर रामानंद सागर की ‘रामायण’ शुरू हुई थी। उस समय कंप्यूटर से सीन बनाने की सुविधा नहीं थी। ऐसे में टीम को कैमरे की तरकीबों, छोटे मॉडल और दूसरी तकनीकों से काम चलाना पड़ता था।
एक बातचीत में, रामानंद सागर के बेटे मोती सागर ने बताया था कि कोहरा दिखाने के लिए धूप और अगरबत्ती जलाई जाती थी। बादल बनाने के लिए रूई का इस्तेमाल होता था। धनुष से तीर निकलने और उसके असर को दिखाने के लिए SEG 2000 नाम की मशीन का इस्तेमाल किया गया था।
उनके मुताबिक, उस समय रामायण का बजट करीब नौ लाख रुपये प्रति एपिसोड था। हनुमान को उड़ते हुए दिखाना हो या पुष्पक विमान और युद्ध के सीन्स तैयार करने हों, हर बार टीम को अलग तरीका निकालना पड़ता था। आज की तरह कंप्यूटर पर पूरी दुनिया बनाने की सुविधा नहीं थी।
रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर ने भी बताया था कि उस दौर में कंप्यूटर से इफेक्ट्स तैयार करने की सुविधा नहीं थी। टीम बैक प्रोजेक्शन, छोटे मॉडल, स्लाइड प्रोजेक्टर और कैमरे की मदद से दृश्य बनाती थी। पहाड़ दिखाने होते थे, तो उनके छोटे मॉडल तैयार किए जाते थे। कांच पर तस्वीरें और आकृतियां बनाकर भी शूटिंग में उनका इस्तेमाल होता था।
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
1987 के बाद कई बार पर्दे पर लौटी रामायण, हर बार बदला कहानी दिखाने का अंदाज
फिल्मों में कैसे बढ़ता गया VFX का इस्तेमाल
फिल्मों में कंप्यूटर ग्राफिक्स का इस्तेमाल बढ़ने लगा। कंप्यूटर की मदद से अब ऐसे किरदार, जगहें और चीजें बनाई जाने लगीं, जिन्हें असल में शूट करना मुश्किल होता है। इसे CGI कहा जाता है। VFX में शूटिंग के दौरान रिकॉर्ड किए गए सीन में कंप्यूटर से तैयार चीजें जोड़ी जाती हैं या जरूरत के मुताबिक पूरा सीन बदला जाता है।
भारतीय सिनेमा में ‘बाहुबली’ ने इस तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया। फिल्म के महल, झरने और युद्ध के मैदान तैयार करने के लिए असली सेट के साथ कंप्यूटर की मदद भी ली गई। इसके बाद ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्मों में भी VFX का काफी इस्तेमाल हुआ। इन फिल्मों में तकनीक सिर्फ कुछ सीन्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरी कहानी की दुनिया बनाने में इसका इस्तेमाल हुआ।
अब किसी बड़े सीन की तैयारी शूटिंग से पहले ही शुरू हो जाती है। पहले कंप्यूटर पर उसका एक खाका तैयार किया जाता है। इसमें तय होता है कि कलाकार कहां खड़े होंगे, कैमरा किस तरफ रहेगा और पीछे क्या दिखाई देगा। इससे शूटिंग के समय टीम को पहले से पता होता है कि सेट पर क्या बनाना है और बाकी काम कंप्यूटर पर कैसे होगा।
- रामानंद सागर की रामायण के बाद भी इस महाकाव्य को पर्दे पर दिखाने की कोशिशें जारी रहीं।
- साल 1992 में भारत और जापान के सहयोग से एनिमेटेड फिल्म 'रामायण: द लीजेंड ऑफ प्रिंस राम' बनी।
- इसके बाद 2002 में बीआर चोपड़ा ने टीवी पर रामायण पेश की।
- साल 2008 में आनंद सागर ने गुरमीत चौधरी और देबिना बनर्जी के साथ इसे नए अंदाज में बनाया।
- 2015 में आए 'सिया के राम' में कहानी सीता के नजरिए से दिखाई गई।
- हर दौर में कहानी वही रही, लेकिन उसे पेश करने का तरीका बदलता गया।
फिल्मों में कैसे बढ़ता गया VFX का इस्तेमाल
फिल्मों में कंप्यूटर ग्राफिक्स का इस्तेमाल बढ़ने लगा। कंप्यूटर की मदद से अब ऐसे किरदार, जगहें और चीजें बनाई जाने लगीं, जिन्हें असल में शूट करना मुश्किल होता है। इसे CGI कहा जाता है। VFX में शूटिंग के दौरान रिकॉर्ड किए गए सीन में कंप्यूटर से तैयार चीजें जोड़ी जाती हैं या जरूरत के मुताबिक पूरा सीन बदला जाता है।
भारतीय सिनेमा में ‘बाहुबली’ ने इस तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया। फिल्म के महल, झरने और युद्ध के मैदान तैयार करने के लिए असली सेट के साथ कंप्यूटर की मदद भी ली गई। इसके बाद ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्मों में भी VFX का काफी इस्तेमाल हुआ। इन फिल्मों में तकनीक सिर्फ कुछ सीन्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरी कहानी की दुनिया बनाने में इसका इस्तेमाल हुआ।
अब किसी बड़े सीन की तैयारी शूटिंग से पहले ही शुरू हो जाती है। पहले कंप्यूटर पर उसका एक खाका तैयार किया जाता है। इसमें तय होता है कि कलाकार कहां खड़े होंगे, कैमरा किस तरफ रहेगा और पीछे क्या दिखाई देगा। इससे शूटिंग के समय टीम को पहले से पता होता है कि सेट पर क्या बनाना है और बाकी काम कंप्यूटर पर कैसे होगा।
रामायण फिल्म
- फोटो : इंस्टाग्राम
आदिपुरुष के बाद VFX पर उठे सवाल
फिर 2023 में आई 'आदिपुरुष' ने बड़े स्तर पर डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया। हालांकि, इसके कई विजुअल्स दर्शकों को पसंद नहीं आए और उनकी आलोचना हुई। फिल्म में राक्षसों के किरदार, युद्ध के दृश्य और डिजिटल दुनिया काफी बनावटी नजर आई।
टीजर रिलीज होने के बाद ही इसके विजुअल्स की आलोचना शुरू हो गई थी। फिल्म रिलीज हुई तो यह नाराजगी और बढ़ गई। दर्शकों ने इसके खराब VFX और किरदारों की डिजाइन को लेकर सवाल उठाए।
इससे एक बात साफ हुई कि सिर्फ ज्यादा पैसा खर्च करने या खूब सारे इफेक्ट्स लगाने से कोई सीन अच्छा नहीं बन जाता। पर्दे पर जो दिख रहा है, उसका कहानी से जुड़ा होना भी जरूरी है। अगर किरदार और उसके आसपास की दुनिया अलग-अलग लगें, तो ऑडियंस का ध्यान कहानी से हटकर उस सीन की कमियों पर चला जाता है।
फिर 2023 में आई 'आदिपुरुष' ने बड़े स्तर पर डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया। हालांकि, इसके कई विजुअल्स दर्शकों को पसंद नहीं आए और उनकी आलोचना हुई। फिल्म में राक्षसों के किरदार, युद्ध के दृश्य और डिजिटल दुनिया काफी बनावटी नजर आई।
टीजर रिलीज होने के बाद ही इसके विजुअल्स की आलोचना शुरू हो गई थी। फिल्म रिलीज हुई तो यह नाराजगी और बढ़ गई। दर्शकों ने इसके खराब VFX और किरदारों की डिजाइन को लेकर सवाल उठाए।
इससे एक बात साफ हुई कि सिर्फ ज्यादा पैसा खर्च करने या खूब सारे इफेक्ट्स लगाने से कोई सीन अच्छा नहीं बन जाता। पर्दे पर जो दिख रहा है, उसका कहानी से जुड़ा होना भी जरूरी है। अगर किरदार और उसके आसपास की दुनिया अलग-अलग लगें, तो ऑडियंस का ध्यान कहानी से हटकर उस सीन की कमियों पर चला जाता है।
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
नमित मल्होत्रा की रामायण में DNEG और ReDefine का काम
‘रामायण: पार्ट वन’ में VFX का काम DNEG और ReDefine जैसी कंपनियों ने संभाला है। DNEG ‘इंसेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’ और ‘ड्यून’ जैसी इंटरनेशनल फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स पर काम कर चुकी है। कंपनी को इस काम के लिए आठ एकेडमी अवॉर्ड मिल चुके हैं।
इस फिल्म में अयोध्या, लंका, जंगल और युद्ध के मैदान को पर्दे पर दिखाना बड़ी चुनौती थी। हर जगह असली सेट बनाना संभव नहीं था। इसलिए कुछ हिस्से सेट पर तैयार किए गए और बाकी को कंप्यूटर की मदद से बनाया गया।
फिल्म के सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार ने एक बातचीत में बताया था कि कई जगह सेट के कुछ हिस्से ही बनाए गए और पीछे ब्लू स्क्रीन लगाई गई। बाद में इस बैकग्राउंड की जगह कंप्यूटर से तैयार की गई दुनिया दिखाई गई।
इसकी तैयारी शूटिंग से पहले शुरू हो जाती है। टीम पहले ही तय कर लेती है कि कैमरा कहां रहेगा, कलाकार किस तरफ से आएंगे और पीछे क्या दिखाई देगा। इस तरह शूटिंग के वक्त ही नहीं, उससे पहले भी VFX टीम का काम शुरू हो जाता है।
‘रामायण: पार्ट वन’ में VFX का काम DNEG और ReDefine जैसी कंपनियों ने संभाला है। DNEG ‘इंसेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’ और ‘ड्यून’ जैसी इंटरनेशनल फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स पर काम कर चुकी है। कंपनी को इस काम के लिए आठ एकेडमी अवॉर्ड मिल चुके हैं।
इस फिल्म में अयोध्या, लंका, जंगल और युद्ध के मैदान को पर्दे पर दिखाना बड़ी चुनौती थी। हर जगह असली सेट बनाना संभव नहीं था। इसलिए कुछ हिस्से सेट पर तैयार किए गए और बाकी को कंप्यूटर की मदद से बनाया गया।
फिल्म के सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार ने एक बातचीत में बताया था कि कई जगह सेट के कुछ हिस्से ही बनाए गए और पीछे ब्लू स्क्रीन लगाई गई। बाद में इस बैकग्राउंड की जगह कंप्यूटर से तैयार की गई दुनिया दिखाई गई।
इसकी तैयारी शूटिंग से पहले शुरू हो जाती है। टीम पहले ही तय कर लेती है कि कैमरा कहां रहेगा, कलाकार किस तरफ से आएंगे और पीछे क्या दिखाई देगा। इस तरह शूटिंग के वक्त ही नहीं, उससे पहले भी VFX टीम का काम शुरू हो जाता है।
रामायण
- फोटो : यूट्यूब
86 कैमरों से कलाकारों की बॉडी स्कैनिंग
फिल्म की तैयारी में 86 कैमरों वाले एक खास सेटअप का भी इस्तेमाल हुआ। अभिनेत्री इंदिरा कृष्णन ने बताया कि उनके शरीर को अलग-अलग कोणों से रिकॉर्ड करने के लिए यह व्यवस्था की गई थी।
इसमें कई कैमरे एक साथ कलाकार को रिकॉर्ड करते हैं। इससे उसके शरीर और चेहरे की बनावट से जुड़ी जानकारी मिलती है। बाद में इस जानकारी का इस्तेमाल डिजिटल किरदार या सीन तैयार करने में किया जा सकता है।
यानी आज किसी कलाकार की सिर्फ शूटिंग करना ही काफी नहीं है। कई बार उसके शरीर और चेहरे की बारीकियों को भी अलग से रिकॉर्ड किया जाता है, ताकि कंप्यूटर पर तैयार दृश्य में उसका हाव-भाव और बनावट सही दिखाई दे।
फिल्म की तैयारी में 86 कैमरों वाले एक खास सेटअप का भी इस्तेमाल हुआ। अभिनेत्री इंदिरा कृष्णन ने बताया कि उनके शरीर को अलग-अलग कोणों से रिकॉर्ड करने के लिए यह व्यवस्था की गई थी।
इसमें कई कैमरे एक साथ कलाकार को रिकॉर्ड करते हैं। इससे उसके शरीर और चेहरे की बनावट से जुड़ी जानकारी मिलती है। बाद में इस जानकारी का इस्तेमाल डिजिटल किरदार या सीन तैयार करने में किया जा सकता है।
यानी आज किसी कलाकार की सिर्फ शूटिंग करना ही काफी नहीं है। कई बार उसके शरीर और चेहरे की बारीकियों को भी अलग से रिकॉर्ड किया जाता है, ताकि कंप्यूटर पर तैयार दृश्य में उसका हाव-भाव और बनावट सही दिखाई दे।
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
पुष्पक विमान के 40-50 डिजाइन, युद्ध दृश्य पर लगे साढ़े छह साल
नितेश तिवारी के मुताबिक, रावण और जटायु के युद्ध का एक सीन तैयार करने में करीब साढ़े छह साल लगे। इस पर हजारों लोगों ने काम किया। इस सीन की तैयारी में पुष्पक विमान का डिजाइन भी अहम था।
निर्देशक ने आगे बताया कि विमान का अंतिम डिजाइन तय करने में करीब दो साल लगे। इसके लिए 40 से 50 डिजाइन बनाए गए। टीम चाहती थी कि विमान देखने में भव्य होने के साथ कहानी के हिसाब से भी सही लगे।
विमान का डिजाइन तय होने के बाद युद्ध के सीन पर भी दोबारा काम करना पड़ा। जटायु किस तरफ से आएगा, विमान पर कहां हमला करेगा और कैमरे में यह लड़ाई कैसी दिखेगी, इन सब पर काम हुआ।
फिल्म में इस मेहनत का असर कई जगह दिखाई देता है। रावण और जटायु का युद्ध, इंद्र के वाहन ऐरावत और भगवान विष्णु से जुड़े दृश्य अच्छे बन पड़े हैं। लंका को भी बड़े पैमाने पर दिखाया गया है। हालांकि, कुछ राक्षसों के किरदार बनावटी लगते हैं। उनके चेहरे और हाव-भाव में वह स्वाभाविकता नहीं दिखती, जिसकी उम्मीद इतने बड़े प्रोजेक्ट से की जाती है।
नितेश तिवारी के मुताबिक, रावण और जटायु के युद्ध का एक सीन तैयार करने में करीब साढ़े छह साल लगे। इस पर हजारों लोगों ने काम किया। इस सीन की तैयारी में पुष्पक विमान का डिजाइन भी अहम था।
निर्देशक ने आगे बताया कि विमान का अंतिम डिजाइन तय करने में करीब दो साल लगे। इसके लिए 40 से 50 डिजाइन बनाए गए। टीम चाहती थी कि विमान देखने में भव्य होने के साथ कहानी के हिसाब से भी सही लगे।
विमान का डिजाइन तय होने के बाद युद्ध के सीन पर भी दोबारा काम करना पड़ा। जटायु किस तरफ से आएगा, विमान पर कहां हमला करेगा और कैमरे में यह लड़ाई कैसी दिखेगी, इन सब पर काम हुआ।
फिल्म में इस मेहनत का असर कई जगह दिखाई देता है। रावण और जटायु का युद्ध, इंद्र के वाहन ऐरावत और भगवान विष्णु से जुड़े दृश्य अच्छे बन पड़े हैं। लंका को भी बड़े पैमाने पर दिखाया गया है। हालांकि, कुछ राक्षसों के किरदार बनावटी लगते हैं। उनके चेहरे और हाव-भाव में वह स्वाभाविकता नहीं दिखती, जिसकी उम्मीद इतने बड़े प्रोजेक्ट से की जाती है।
'रामायण'
- फोटो : अमर उजाला
रूई के बादल से डिजिटल दुनिया तक पहुंची रामायण
रामानंद सागर की रामायण से नमित मल्होत्रा की फिल्म तक करीब चार दशक का सफर तय हो चुका है। तब कोहरा दिखाने के लिए धूप-अगरबत्ती जलाई जाती थी और बादल बनाने के लिए रूई इस्तेमाल होती थी। आज कंप्यूटर पर आसमान, शहर और युद्ध के मैदान तक तैयार किए जा सकते हैं। उड़ते किरदारों को दिखाने के तरीके भी पूरी तरह बदल गए हैं।
तकनीक भले ही बदल गई हो, लेकिन रामायण को पर्दे पर दिखाने की चुनौती आज भी वही है। दर्शक राम, सीता, हनुमान और रावण के किरदारों से पहले से जुड़े हैं। ऐसे में फिल्म बनाने वालों के लिए सिर्फ भव्य दृश्य दिखाना काफी नहीं है। उन्हें कहानी और किरदारों को भी पर्दे पर विश्वसनीय बनाना होता है।
रामानंद सागर की रामायण से नमित मल्होत्रा की फिल्म तक करीब चार दशक का सफर तय हो चुका है। तब कोहरा दिखाने के लिए धूप-अगरबत्ती जलाई जाती थी और बादल बनाने के लिए रूई इस्तेमाल होती थी। आज कंप्यूटर पर आसमान, शहर और युद्ध के मैदान तक तैयार किए जा सकते हैं। उड़ते किरदारों को दिखाने के तरीके भी पूरी तरह बदल गए हैं।
तकनीक भले ही बदल गई हो, लेकिन रामायण को पर्दे पर दिखाने की चुनौती आज भी वही है। दर्शक राम, सीता, हनुमान और रावण के किरदारों से पहले से जुड़े हैं। ऐसे में फिल्म बनाने वालों के लिए सिर्फ भव्य दृश्य दिखाना काफी नहीं है। उन्हें कहानी और किरदारों को भी पर्दे पर विश्वसनीय बनाना होता है।