Exclusive: ‘टीवी पर रोल आते हैं पर ठुकरा देती हूं’, रेणुका शहाणे ने नई सीरीज 'अगं आई…' से जुड़ी बातें की साझा
Renuka Shahane Exclusive Interview: शादी, सास-बहू के रिश्ते और महिलाओं की बदलती भूमिका पर अभिनेत्री रेणुका शहाणे की सोच पारंपरिक धारणाओं से अलग है। इसी सोच को वह एक सीरीज ‘अंग आई अहो आई’ में भी दर्शकों को दिखाएंगी। अमर उजाला से अपनी नई सीरीज और करियर को लेकर रेणुका शहाणे ने कई बातें साझा की हैं।
विस्तार
मराठी वेब सीरीज 'अगं आई अहो आई' के जरिए रेणुका शहाणे रिश्तों की एक नई सोच ऑडियंस तक पहुंचाने जा रही हैं। अमर उजाला डिजिटल से खास बातचीत में उन्होंने शादी, सास-बहू के रिश्ते, जेंडर रोल्स और टीवी पर दिखाए जाने वाले 'किचन पॉलिटिक्स' पर अपनी बात रखी। पढ़िए, अभिनेत्री रेणुका शहाणे से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश-
‘हमारी सीरीज एक सोच को तोड़ती है’
रेणुका कहती हैं, ‘यह सीरीज सिर्फ पारिवारिक मनोरंजन नहीं, बल्कि उन धारणाओं को चुनौती देती है जिन्हें समाज लंबे समय से सच मानता आया है। अक्सर कहानियों में यही दिखाया जाता है कि महिलाएं ही महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं। हमारी सीरीज उस सोच को तोड़ती है और रिश्तों की एक सकारात्मक तस्वीर पेश करती है।’
‘शादी डरने वाली चीज नहीं’
आज के समय में शादी को लेकर युवाओं के मन में बढ़ रहे डर पर रेणुका शहाणे ने कहा, ‘इसकी वजह रिश्तों को लेकर बना नजरिया है। अगर हमने यह तय कर दिया कि लड़के वालों को ज़्यादा पावर मिलनी चाहिए, तो फिर हम एक-दूसरे को व्यक्ति के रूप में नहीं देख रहे। अगर आपकी भावना किसी को नीचा दिखाने की है, तो रिश्ते कभी पनप नहीं सकते। लेकिन अगर एक-दूसरे को समझने की इच्छा हो, तो ऐसा ज़रूरी नहीं कि हर बात पर सहमति हो। समझने की कोशिश होनी चाहिए। अगर ऐसा हो जाए, तो शादी से कोई क्यों डरेगा? वही तो दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है।’
‘बहू बेटी जैसी नहीं होती’
जब रेणुका से पूछा गया कि क्या ऐसी कोई बात है, जो उन्होंने खुद एक बहू के तौर पर महसूस की और जिसे वह अगली पीढ़ी तक नहीं जाने देना चाहेंगी, तो उन्होंने कहा कि आज भी बहू को पूरी तरह अपना नहीं माना जाता। उन्होंने कहा, 'हम यह कहते जरूर हैं कि बहू और बेटी में कोई अंतर नहीं करते। लेकिन अंतर तो होता ही है। कई साल गुजर जाते हैं, बच्चे बड़े हो जाते हैं, फिर भी कहीं-न-कहीं बहू को एक आउटसाइडर की तरह देखा जाता है। कई बार मुझे लगता है कि वह न पूरी तरह मायके की रह जाती है, न ससुराल की।’
‘मायने यह रखता है आप दिखा क्या रहे?’
टीवी पर वर्षों से दिखाए जा रहे 'किचन पॉलिटिक्स' वाले कंटेंट पर भी रेणुका शहाणे ने खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, ‘ऑफर्स तो बहुत मिलते हैं लेकिन मेरा पहला सवाल हमेशा यही होता है कि क्या सास किसी भी तरह से बहू को प्रताड़ित कर रही है? अगर ऐसा है, तो मैं वह रोल नहीं करती। मैं ऐसे रोल के खिलाफ नहीं हूं पर सवाल यह है कि आप दर्शकों तक क्या संदेश पहुंचा रहे हैं। आप छह साल तक एक लड़की को प्रताड़ित करते रहेंगे और आखिर में डेढ़ एपिसोड में उसका साथ दिखा देंगे, तो लोगों के दिमाग में वही छह साल रहेंगे।’
'कपड़ों और संस्कारों का कोई संबंध नहीं है'
बहुओं के पहनावे को लेकर होने वाली जजमेंट से भी रेणुका सहमत नहीं हैं। वह कहती हैं, 'बड़ों का सम्मान करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपकी अपनी कोई आवाज ही न हो। अगर कोई वेस्टर्न ड्रेस भी पहन रहा है, तब भी वह अपने माता-पिता या सास-ससुर का पूरा सम्मान कर सकता है। कपड़ों और संस्कारों का कोई संबंध नहीं है। मैं नहीं चाहूंगी कि मेरी बहू को उसके पहनावे के आधार पर जज किया जाए।'
‘लड़कों से ऐसी उम्मीदें कम होती हैं’
दो बेटों की मां रेणुका मानती हैं कि जेंडर रोल्स की शुरुआत ससुराल से पहले अपने घर से ही हो जाती है। उन्होंने अपने बेटे का एक अनुभव साझा करते हुए कहा, 'मेरे छोटे बेटे ने बताया कि उसकी कई दोस्त जो लड़कियां हैं, जानबूझकर देर से घर जाती हैं, क्योंकि घर पहुंचते ही उनसे काम करवाया जाता है। यही फर्क है। लड़कों से ऐसी उम्मीदें कम होती हैं। जब अपने ही घर में यह अंतर है, तो बाहर की बात क्या करें।'
रेणुका आगे कहती हैं, ‘मेरे बच्चों को लगता है कि मैं बहुओं की ही साइड लूंगी। वो कहते हैं कि आप हमसे ज्यादा बहुओं को प्यार करोगी, क्योंकि आप हमेशा चाहती थीं कि आपके घर एक बेटी भी हो।'
हिंदी और मराठी इंडस्ट्री में काम करने के अनुभव पर रेणुका कहती हैं कि मराठी सिनेमा से उनका रिश्ता बेहद निजी है। वह कहती हैं, 'मराठी इंडस्ट्री मेरे लिए मायके जैसी है। मायका तो आखिर मायका ही होता है। अपनी मातृभाषा मां जैसी होती है। उसमें काम करने का अनुभव बहुत सुखद होता है। यह इंडस्ट्री छोटी है, इसलिए हम एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि यहां महिलाओं के लिए मजबूत और महिला प्रधान किरदार लगातार लिखे जा रहे हैं। मराठी दर्शक ऐसी प्रोग्रेसिव कहानियों को पसंद भी करते हैं।'