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जब राजेश खन्ना को रीगल से उलटे पांव भागना पड़ा
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 31 Mar 2017 07:37 PM IST
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राजेश खन्ना
नई दिल्ली का जाना माना सिने स्मारक 'रीगल' गुरुवार को बंद हो गया। इसके साथ ही 1932 में शुरू हुआ इसका सफर भी खत्म हो गया। इस सिनेमाहाल ने वो समय भी देखा है जब उसके सामने सभी चीजें मामूली दिखती थीं।
1950 के दशक में जब बहुत कम सिनेमाहाल और फिल्में हुआ करती थीं, तब किसी तांगेवाले को सवारियों को हांक लगाते हुए यह सुनना काफी आम था, "एक सवारी, रीगल, रीगल, कनॉटप्लेस।" यह तथ्य है कि तांगेवाले पड़ोस में स्थित रिवोली, प्लाजा और ओडियन की बजाय रीगल बोलते थे। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका स्टेटस कितना बड़ा था।
इसके सामने सब फीके थे
सत्तर के दशक में सार्वजनिक परिवहन में फट फट गाड़ियों का चलन था। ये गाड़ियां पालिका बाजार में खड़ी की जाती थीं और ड्राइवर सवारियों को आकर्षित करने के लिए 'रीगल, रीगल, पालिका' चिल्लाते थे। किसी अन्य सिनेमाहाल के मुकाबले, रीगल की शोहरत कुछ ऐसी होती थी।
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साठ के दशक की बात है जब धर्मेंद्र अभी फिल्मों में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, वो मीना कुमारी के साथ यहां आए थे। मीना कुमारी तब तक बहुत आला दर्जे की अभिनेत्री का दर्जा हासिल कर चुकी थीं। उनकी फिल्म 'फूल और पत्थर' ने यहां सिल्वर जुबली मनाई।
दिलचस्प बात है कि एक बार 1969 में राजेश खन्ना का ड्राइवर उन्हें 'आराधना' की रिलीज के मौके पर यहां लेकर आया था।
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1950 के दशक में जब बहुत कम सिनेमाहाल और फिल्में हुआ करती थीं, तब किसी तांगेवाले को सवारियों को हांक लगाते हुए यह सुनना काफी आम था, "एक सवारी, रीगल, रीगल, कनॉटप्लेस।" यह तथ्य है कि तांगेवाले पड़ोस में स्थित रिवोली, प्लाजा और ओडियन की बजाय रीगल बोलते थे। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका स्टेटस कितना बड़ा था।
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इसके सामने सब फीके थे
सत्तर के दशक में सार्वजनिक परिवहन में फट फट गाड़ियों का चलन था। ये गाड़ियां पालिका बाजार में खड़ी की जाती थीं और ड्राइवर सवारियों को आकर्षित करने के लिए 'रीगल, रीगल, पालिका' चिल्लाते थे। किसी अन्य सिनेमाहाल के मुकाबले, रीगल की शोहरत कुछ ऐसी होती थी।
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साठ के दशक की बात है जब धर्मेंद्र अभी फिल्मों में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, वो मीना कुमारी के साथ यहां आए थे। मीना कुमारी तब तक बहुत आला दर्जे की अभिनेत्री का दर्जा हासिल कर चुकी थीं। उनकी फिल्म 'फूल और पत्थर' ने यहां सिल्वर जुबली मनाई।
दिलचस्प बात है कि एक बार 1969 में राजेश खन्ना का ड्राइवर उन्हें 'आराधना' की रिलीज के मौके पर यहां लेकर आया था।
जब राजेश खन्ना प्रशंसकों से बाल बाल बचे
राजेश खन्ना
असल में खन्ना के आग्रह पर रीगल के बगल में स्थित रिवोली में फिल्म का शो दिखाया जा रहा था। वो रिवोली में इसका प्रीमियर देखना चाहते थे। लेकिन रीगल पर इतनी भीड़ थी कि ड्राइवर ने यहीं कार रोक दी और जैसे ही खन्ना के लिए दरवाजा खोला, उन्हें गलत जगह आने का आभास हो गया। जब तक राजेश खन्ना के प्रशंसक उनके पास पहुंचते वो वापस गाड़ी में जा बैठे।
श्याम बेनेगल की फिल्मों का तो रीगल से खास रिश्ता था। जब गंभीर फिल्मों को थियेटर में जगह मिलने में मुश्किलात का सामना कर पड़ता था, रीगल आगे आता था।
यथार्थवादी फिल्मों का ठिकाना
इसमें 'मंथन', 'निशांत' और इससे पहले 'अंकुर' भी लग चुकी थी। इन फिल्मों ने यहां अच्छा व्यवसाय किया। यथार्थवादी सिनेमा को सपोर्ट करने के लिए, फिल्म जगत में भी रीगल की तारीफ होती थी। ये सब स्टार और फिल्म निर्माताओं की बातें थीं, लेकिन आम लोगों के पास रीगल की अपनी कहानी थी।
कुछ लोगों की याद अपनी गर्लफ्रेंड के साथ फिल्म देखने से जुड़ी है जबकि कुछ को अभी तक याद है कि फिल्म 'सत्यम शिवम् सुंदरम' में जीनत अमान को देखकर कैसे लोग आहें भरते थे। इस फिल्म के प्रीमियर से पहले हवन कराया गया था। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो राज कपूर से यहां कई बार मिल चुकने का दावा करते हैं। राजकपूर को अपनी फिल्म रिलीज के मौके पर मौजूद रहने के लिए जाना जाता था।
श्याम बेनेगल की फिल्मों का तो रीगल से खास रिश्ता था। जब गंभीर फिल्मों को थियेटर में जगह मिलने में मुश्किलात का सामना कर पड़ता था, रीगल आगे आता था।
यथार्थवादी फिल्मों का ठिकाना
इसमें 'मंथन', 'निशांत' और इससे पहले 'अंकुर' भी लग चुकी थी। इन फिल्मों ने यहां अच्छा व्यवसाय किया। यथार्थवादी सिनेमा को सपोर्ट करने के लिए, फिल्म जगत में भी रीगल की तारीफ होती थी। ये सब स्टार और फिल्म निर्माताओं की बातें थीं, लेकिन आम लोगों के पास रीगल की अपनी कहानी थी।
कुछ लोगों की याद अपनी गर्लफ्रेंड के साथ फिल्म देखने से जुड़ी है जबकि कुछ को अभी तक याद है कि फिल्म 'सत्यम शिवम् सुंदरम' में जीनत अमान को देखकर कैसे लोग आहें भरते थे। इस फिल्म के प्रीमियर से पहले हवन कराया गया था। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो राज कपूर से यहां कई बार मिल चुकने का दावा करते हैं। राजकपूर को अपनी फिल्म रिलीज के मौके पर मौजूद रहने के लिए जाना जाता था।
रीगल के लिए नेहरू की दीवानगी
पंडित नेहरू
पंडित जवाहरलाल नेहरू के रीगल से खास रिश्ते को नहीं भूला जा सकता है, वो अक्सर यहां फिल्म देखने आते थे। वो भीड़ से बचने के लिए फिल्म खत्म होने से कुछ मिनट पहले ही उठकर चले जाते थे।
'गॉन विद द विंड' फिल्म के भारत में प्रीमियर की कहानी तो वाकई न भूलने वाली है। इसका प्रीमियर रीगल में हुआ। ये वो दौर था जब रीगल ने बेहतरीन विदेशी फिल्मों को दिखाने की शुरुआत की थी। 'दि रोब' के प्रीमियर में खुद प्रधानमंत्री शामिल हुए थे। नेहरू यहां कभी कभार आने वाले दर्शकों में ही शामिल नहीं थे।
ये इस बात से पता चलता है कि वो एक बार 'दिल्ली चलो' फिल्म का प्रिंट लेकर आए थे, जोकि आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष पर आधारित थी। एक बार उनका पूरा कैबिनेट रीगल फिल्म देखने आया था।
सर सोभा सिंह की जमीन पर बनने वाले इस सिनेमाहाल को वॉल्टर साइक्स ने डिजाइन किया था। इसकी अंदरूनी बनावट में मौजूद भित्तचित्र, आधा गोलाकार गुंबद तकनीक आदि मुगल प्रभाव को दिखाता है। अपने शुरुआती दिनों में यहां बेहतरीन नाटक भी दिखाया जाता था। यहां 'द लंदन रीव्यू कंपनी' और 'द रशियन बैले ट्रुप' के प्रदर्शन भी हुए थे।
'गॉन विद द विंड' फिल्म के भारत में प्रीमियर की कहानी तो वाकई न भूलने वाली है। इसका प्रीमियर रीगल में हुआ। ये वो दौर था जब रीगल ने बेहतरीन विदेशी फिल्मों को दिखाने की शुरुआत की थी। 'दि रोब' के प्रीमियर में खुद प्रधानमंत्री शामिल हुए थे। नेहरू यहां कभी कभार आने वाले दर्शकों में ही शामिल नहीं थे।
ये इस बात से पता चलता है कि वो एक बार 'दिल्ली चलो' फिल्म का प्रिंट लेकर आए थे, जोकि आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष पर आधारित थी। एक बार उनका पूरा कैबिनेट रीगल फिल्म देखने आया था।
सर सोभा सिंह की जमीन पर बनने वाले इस सिनेमाहाल को वॉल्टर साइक्स ने डिजाइन किया था। इसकी अंदरूनी बनावट में मौजूद भित्तचित्र, आधा गोलाकार गुंबद तकनीक आदि मुगल प्रभाव को दिखाता है। अपने शुरुआती दिनों में यहां बेहतरीन नाटक भी दिखाया जाता था। यहां 'द लंदन रीव्यू कंपनी' और 'द रशियन बैले ट्रुप' के प्रदर्शन भी हुए थे।
हमेशा इतिहास का हिस्सा रहेगा रीगल
रीगल सिनेमा
रीगल एक ऐसा सिनेमाहाल था, जिसने मनोरंजन के इतिहास में अपना अलग मुकाम बनाया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, यहां फिल्म देखना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती थी।
जैसा गालिब ने लिखा है, "हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे/कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां और", रीगल के बारे में भी हरकोई ऐसा ही कह सकता है।
बाकी सिनेमाहाल फिल्म दिखाते थे, रीगल कई मायनों में इसे जीवन भर का अनुभव बना देता था। लेकिन इसकी शोहरत फिकी पड़ने लगी। सबसे पहले यहां एडल्ट फिल्मों के मॉर्निंग शो शुरू हुए। इसके बाद वीडियो पॉर्लरों से इसे टक्कर मिली। इसके तुरंत बाद मल्टीप्लेक्स का हमला शुरू हुआ और रीगल अपने वजूद की लड़ाई लड़ने तक सिमट गया। नई दिल्ली का प्रीमियर थियेटर इतिहास है। किस्मत से, यह इतिहास का भी हिस्सा है।
जैसा गालिब ने लिखा है, "हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे/कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां और", रीगल के बारे में भी हरकोई ऐसा ही कह सकता है।
बाकी सिनेमाहाल फिल्म दिखाते थे, रीगल कई मायनों में इसे जीवन भर का अनुभव बना देता था। लेकिन इसकी शोहरत फिकी पड़ने लगी। सबसे पहले यहां एडल्ट फिल्मों के मॉर्निंग शो शुरू हुए। इसके बाद वीडियो पॉर्लरों से इसे टक्कर मिली। इसके तुरंत बाद मल्टीप्लेक्स का हमला शुरू हुआ और रीगल अपने वजूद की लड़ाई लड़ने तक सिमट गया। नई दिल्ली का प्रीमियर थियेटर इतिहास है। किस्मत से, यह इतिहास का भी हिस्सा है।