‘यौन शिक्षा के बारे में बात करना जिम्मेदारी’, मिथिला पालकर ने कहा- लोगों की सोच को बदलने में समय लगेगा
Mithila Palkar: एक्ट्रेस मिथिला पालकर ने यौन शिक्षा को लेकर बात की। जानिए उन्होंने नो मीन्स नो को लेकर क्या कुछ कहा…
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अभिनेत्री मिथिला पालकर इन दिनों अपनी हालिया रिलीज सीरीज ‘सुपर सुब्बू’ को लेकर चर्चाओं में हैं। यह सीरीज यौन शिक्षा के बारे में बात करती है। एक्ट्रेस का मानना है कि स्क्रीन पर यौन शिक्षा के बारे में बात करने की बड़ी जिम्मेदारी होती है। मिथिला ने बताया कि आखिर क्यों उन्होंने इस सीरीज को हां किया और साथ ही अपने परिवार के बारे में भी की बात।
मुद्दे की गंभीरता को बनाए रखते हुए ह्यूमर के साथ दिखाया
इंडिया टुडे के साथ बातचीत में यौन शिक्षा जैसे टैबू विषय पर मिथिला ने कहा कि मुझे लगता है कि यह बहुत संवेदनशील विषय है और इसके नतीजे कुछ भी हो सकते हैं। इसलिए जिस तरह से स्क्रिप्ट में इसे संभाला गया और जिस तरह से उन्होंने हर किरदार और कहानी को लिखा है, उससे मैं बहुत खुश थी। इसने मुझे बहुत खुश कर दिया।
स्क्रिप्ट पढ़ना खत्म करते-करते मुझे यकीन हो गया था कि मैं इसका हिस्सा बनना चाहती हूं। किसी संवेदनशील विषय को खासकर जब उसमें कॉमेडी भी हो सही संवेदनशीलता के साथ और बिना उसे हल्का बनाए पेश करने के लिए वाकई खास हुनर की जरूरत होती है।
भले ही इस सीरीज में ह्यूमर का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन जिन मुद्दों पर इसमें बात की गई है, उनका मजाक कभी नहीं उड़ाया गया। हम बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में जरूरी बातों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन हम उन्हें लेकर पूरी तरह से गंभीर और पक्के हैं। हम किसी भी विषय या स्थिति को हल्के में नहीं ले रहे हैं। इसलिए, मुझे लगता है कि इसे बहुत ही बेहतरीन ढंग से लिखा गया है।
लोगों की सीमित सोच को चुनौती देती है सीरीज
मिथिला का मानना है कि 'सुपर सुब्बू' यौन शिक्षा के बारे में लोगों की सीमित सोच को चुनौती देता है। उन्होंने कहा कि जब आप यौन शिक्षा के बारे में सोचते हैं, तो आपके मन में इसके बारे में बहुत सीमित विचार आते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि हम उन बहुत जरूरी चीजों के बारे में बात कर रहे हैं जो असल में इसका हिस्सा होनी चाहिए।
जैसे कि सहमति जिसके बारे में बिल्कुल बात नहीं की जाती और अपनी सीमाएं तय कर पाना। सहमति एक व्यापक बात है। 'ना का मतलब ना' हर चीज के लिए लागू होता है। हम भले ही इसे एक खास नजरिए से देख रहे हों, लेकिन सहमति हर उस चीज के लिए जरूरी है, जिसे आप नहीं करना चाहते।
मुझे लगता है कि हम इसके कई अलग-अलग पहलुओं पर बात कर रहे हैं। लेकिन हम कहीं भी यह नहीं कह रहे हैं कि 'बैठ जाओ, हम तुम्हें यह सिखाने की कोशिश कर रहे हैं।' इसे बिल्कुल भी उस तरह से नहीं किया जाता है।
गहरी सोच या कंडीशनिंग सबसे बड़ी वजह है
जब उनसे पूछा गया कि समाज आज भी ‘ना का मतलब ना’ जैसी आसान बात को समझने में क्यों संघर्ष करता है, तो मिथिला ने बरसों से चली आ रही सोच या कंडीशनिंग की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हमने इस बारे में बात क्यों नहीं की या हम अभी भी इस बारे में अजीब क्यों महसूस करते हैं, इसकी वजह गहरी सोच या कंडीशनिंग है।
यह सबसे आसान एक-वाक्य वाला जवाब है। क्योंकि इतने साल से हमारा चित्रण ऐसा ही रहा है। ऐसा कभी नहीं होता कि 'ओह, उसने ना कहा।' हमेशा यही होता है कि उसने ना कहा, लेकिन 'उसके ना में हां है।' नजरिया यही रहा है।
आम तौर पर सभी सीमाओं का सम्मान नहीं किया गया है। सहमति को वास्तव में ध्यान में नहीं रखा गया है। कोई भी सोच या कंडीशनिंग जो इतने साल से इतनी गहरी हो, उसे बदलने में बहुत समय लगेगा।
'सुपर सुब्बू' में संदीप किशन, मुरली शर्मा और मिथिला पालकर मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह पहली तेलुगु सीरीज में से एक है जो ह्यूमर के जरिए यौन शिक्षा और सहमति जैसे विषयों को उठाती है। यह सीरीज 2 जुलाई से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम कर रही है।