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'रागिनी एमएमएस' देखने से तो अच्छा है कि...
लिपिका वर्मा/अमर उजाला, मुंबई
Updated Tue, 18 Mar 2014 03:31 PM IST
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संजय बोल्ड नहीं, बल्कि इंटेलिजेंट ऐक्टर हैं। वह इस सप्ताह रिलीज होने वाली निर्देशक रजत कपूर फिल्म ‘आंखों देखी’ के हीरो हैं। उन्होंने बातचीत में कुछ खास बातें बताईं।
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यह फिल्म हट के है
मैंने बहुत लोगों से कहा है कि ‘आंखों देखी’ एक अलग किस्म की फिल्म है। मतलब टचिंग है। दिल को छूती है। यह संयुक्त परिवार में रहने वाले लोगों कि कहानी है।
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जिसमें एक बाबूजी (संजय मिश्रा) हैं। वह उसी बात को मानते हैं जिसे वे आंखों से देखते हैं। यहां तक कि शेर दहाड़ता है, यह बात भी वह तभी मानते हैं जब आंखों से देख लेते हैं। यह दिल्ली के चांदनी चौक की गलियों में रहने वाले लोगों की कहानी है। पूरी तरह से भारतीय।
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बढ़िया रहा रजत का साथ
एक समय तक रजत कपूर के साथ मैंने काम नहीं किया था और व्यक्तिगत तौर पर भी नहीं जनता था। मुझे उनकी एक्टिंग पसंद थी। मैं रजत से ‘फंस गए रे ओबामा’ के वक्त मिला।
यह परिचय की एक सामान्य शुरुआत थी। फिर कुछ दिनों बाद मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि यार तूने रजत पर कैसा जादू चलाया वो तेरे लिए कुछ अच्छा किरदार लिख रहा है।
मैंने ध्यान नहीं दिया। एक दिन उन्होंने बुलाया और कहा कि यार यह कहानी है सुन लो। रजत कि कहानी में मुझे वो बाबूजी दिख गए, जिनका रोल मुझे निभाना था। मैंने तुरंत हां कह दी।
ऐक्टर को संवेदनशील होना चाहिए
मुझे लगता है कि ऐक्टर को 24 घंटे अपना दिमाग खुला रहना चाहिए। उसका दिमाग ही उसका ऑफिस है। ऐक्टर को सारी चीजों के लिए तैयार होना चहिए।
यदि एक आदमी सड़क पर मार खा रहा है, दस आदमी उसे मार रहे हैं तो आपको पता होना चाहिए कि आपको किसकी तरफ होना है। मेरा मतलब है कि ऐक्टर को संवेदनशील होना चाहिए।
आप को ठंड लगने की एक्टिंग करनी है, जब तक आप को ठंड लगी न हो तो आप कैसे उसे दिखलाएंगे? साथ ही ऐक्टर को दिमाग से भी सोचना चाहिए। अगर ऐसा हो तो फिर उसे ज्यादा कड़ी मेहनत की जरूरत नहीं होगी।
सबसे इडियट होते हैं ऐक्टर
मैं समझता हूं कि सबसे इडियट कौम एक्टर की है। अमूमन वह अपने लुक पर ही ध्यान देते हैं। अरे, जब तक आप अपने किरदार में विश्वास नहीं करेंगे तो दर्शक कैसे बिलीव करेंगे।
अमिताभ बच्चन जब निरुपा राय को मां बोलते थे तो दर्शक विश्वास करते थे। आजकल ऐक्टर बोलते हैं, यार दो बजे से आया हूं। मेरा सीन ही नहीं आया। इनके पास बक-बक करने के अलावा कुछ नहीं होता।
अपने मोबाइल पर लगे रहते है। ऐक्टिंग इतनी आसान नहीं है दोस्त। जब आप स्क्रिप्ट सुनते हो तो आपका किरदार 25% होता है बाकि 25% जब लोकेशन पर पहुंचते हैं तब वो जिंदा होता है।
25 % सारे डिपार्टमेंट मिल जाते है तब बनता है और 25% आप उसे जिंदा करते हो। मैंने बहुत से एक्टर्स देखे हैं, डायरेक्टर ने यहां ‘कट’ बोला और वहां उनका मोबाइल बजा।
क्यों फ्लॉप होती है फिल्में
हमने फिल्मों को कमोडिटी (वस्तु) मान लिया है। बस बिकने लायक माल के रूप में उसे तैयार हो जाना चाहिए। कई बार डायरेक्टर कुछ किरदारों से सेट पर ही मिलते है।
सहायक निर्देशक सब फाइनल कर देता है। डायरेक्टरों को केरेक्टर आर्टिस्ट की कॉस्ट्यूम के बारे में तक नहीं पता होता। सत्यजीत रे की फिल्में देखिए।
वे इतनी बारीकी से काम करते थे कि उन्हें यह तक पता होता था कि एक्स्ट्रा आर्टिस्ट को कहां और कैसे खड़ा होना है। आज फिल्म में डकैत और नौकर तक नए कपड़े में आते हैं। कैमरा सब पकड़ लेता है। हमारे समय में किसी डायरेक्टर को कॉस्ट्यूम का सेंस है तो वह हैं, तिग्मांशु धूलिया।
यह तो अन्याय हो गया
एक बड़ा गलत काम मीडिया ने किया है। वह है कलाकारों को हीरो और केरेक्टर आर्टिस्ट में बांटने का। जबकि फिल्म में हर किरदार महत्वपूर्ण होता है। सिर्फ अमिताभ बच्चन ही हीरो नहीं हैं।
जीवन, प्राण और कन्हैया लाल भी मंजे हुए कलाकार हैं। क्या ये किसी हीरो से कम थे। फिल्म राम और श्याम मुझे याद है। प्राण का सीन देख कर सब बहुत डर जाते थे।
दिलीप साब से ज्यादा प्रवाह था उनका। शोले का हीरो कौन है? गब्बर सिंह। जिन्हें आप केरेक्ट आर्टिस्ट कहते हैं, वे स्क्रिप्ट के स्तंभ होते हैं। सिर्फ अच्छी शर्ट-पैंट पहनने वाला हीरो नहीं होता। सिनेमा का हर कलाकार केरेक्टर होता है।
रागिनी से क्या टक्कर
लोग पूछते हैं कि ‘रागिनी एमएमएस-2’ के साथ आपकी फिल्म की टक्कर है। मैं कहता हूं कि मैंने पहली फिल्म भी नहीं देखी और यह भी नहीं देखूंगा। सच तो यह है कि ऐसी फिल्म देखने से बेहतर है कि मैं ब्लू फिल्म देखूं।
मैं किसी की निंदा नहीं कर रहा। ऐसी फिल्मों के दर्शक अलग हैं। लेकिन मुझे लगता है कि फिल्में परिवार और समाज के लिए बननी चाहिए। ऐसी फिल्मों के बाद अगर गलत काम होते हैं तो कौन जिम्मेदारी लेगा।
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