Amar Ujala Samwad: नुसरत ने 40 दिनों तक बेटी खाेने का दर्द महसूस किया, निर्देशक बोले- यह गुस्से वाली फिल्म
Amar Ujala Samwad 2025 Event Lucknow: अमर उजाला के दो दिवसीय वैचारिक संगम संवाद कार्यक्रम का आगाज आज गुरुवार से लखनऊ में गोमती नगर के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हो चुका है। चर्चित अभिनेत्री नुसरत भरूचा और निर्देशक विशाल फुरिया ने कार्यक्रम में शिरकत की है।
विस्तार
साल 2025 के पहले अमर उजाला संवाद का आगाज हो चुका है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम की शुरुआत हुई है। मशहूर फिल्म अभिनेत्री नुसरत भरूचा और निर्देशक विशाल फुरिया ने आज गुरुवार को संवाद में शिरकत की है।
नुसरत इन दिनों फिल्म 'छोरी 2' में नजर आ रही हैं, जिसका निर्देशन विशाल ने किया है। संवाद के मंच पर फिल्म का ट्रेलर भी दिखाया गया। संवाद कार्यक्रम में नुसरत और विशाल फुरिया ने फिल्म और सिनेमा से जुड़ी कई दिलचस्प बातें साझा की हैं।
छोरी 2 बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
संवाद में सवाल किया गया कि 'छोरी' के बाद 'छोरी 2' फिल्म बनाने की जरूरत क्यों लगी? इस पर नुसरत ने कहा, 'इस मंच पर बुलाने के लिए सबसे पहले शुक्रिया। 'छोरी' फिल्म के अब तक पांच साल पूरे हो गए। हमारी छोरी थोड़ी बड़ी हो गई है अब। दर्शकों का शुक्रिया। 'छोरी' के बाद 'छोरी 2' का ऐसा कोई आइडिया तो नहीं था। लेकिन, जब हम 'छोरी' को प्रमोट कर रहे थे तो हम और विशाल फुरिया फ्लाइट में थे।
तभी विशाल के दिमाग में आया कि अगर फिल्म का जो कॉन्सेप्ट है भ्रूण हत्या का उसे एक स्टेप और आगे बढ़ाया जाए तो दूसरी क्या चीज घटित हो सकती है, जो हो सकता है। उन्होंने एक आइडिया दिया बाल विवाह का। और मैंने सहमति जताई।
मुझे लगा एक मां ने एक बच्ची को बचाया, वह बड़ी हुई, लेकिन उसका डर खत्म नहीं हुआ। वह एक ऐसी स्थिति मे आती है, जहां हर मुकाम पर उसे लड़ना पड़ता है। मुझे वह विचार काफी दिलचस्प लगा। हमने इस दुनिया में एक ईमानदार कदम आगे रखा'।
गुस्से वाली फिल्म है छोरी 2
विशाल फुरिया ने 'छोरी 2' को लेकर कहा, 'पहली कोशिश ये थी कि भ्रूण हत्या के आंकड़े इतने ज्यादा थे कि वह बाहर नहीं आते। सरकारें प्रयास करती हैं, लेकिन फिर भी आंकड़े आते नहीं है। मुझे बहुत डरावना लगा यह। उस मां पर क्या बीतती होगी, जिसकी बेटी छिन जाती है। उस मां की पीड़ा को महसूस करो। लोगों की विचारधारा को बदलने की कोशिश होनी चाहिए कि बच्ची भी उतना ही सम्मान लेकर आती है, जितना कि बेटा।
फिल्म छोरी में मां वहां से निकल जाती है और हम एक उम्मीद की तरफ बढ़ते हैं। लेकन, मुझे लगा वह उम्मीद उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। फिर बाल विवाह भी एक समस्या है। अब छोरी 2 बनाई है। यह एक गुस्से वाली फिल्म है। मैं एक मां का दर्द समझता हूं।'
यह फिल्म दर्द के बारे में है
राइटर दिव्य प्रकाश दुबे भी संवाद में शामिल हुए हैं, जिन्होंने 'छोरी 2' के लेखन का काम किया है। प्रकाश दुबे ने कहा, 'यह फिल्म उस दर्द के बारे में है, जो हमें पता है। समाज में मौजूद है'। उन्होंने आगे कहा, 'फिल्म की मेकिंग के दौरान मुझे हरियाणवी सीखने में बहुत मजा आया। हॉरर एक अलग तरह का जोनर है। इसे स्थापित करना अलग तरह का चैलेंज रहा'।
'छोरी 2' के दौरान क्या चैलेंज रहे?
इस पर नुसरत भरूचा ने कहा, पहले पार्ट और इस पार्ट दोनों में मेरे लिए सबसे मुश्किल था, मां बनना। मैं रियल लाइफ में न मां बनी हूं, न वो रिश्ता समझ आता है। परदे पर मां बनना बहुत मुश्किल था। मैं जब छोरी 2 देखती हूं तो यह देखती हूं कि क्या मैंने मां के इमोशन को ठीक से किया है। मेरे लिए वह फीलिंग बहुत जरूरी थी। इसलिए, दोनों फिल्मों में वह मेहनत मेरे लिए बहुत जरूरी थी।
बाकी सारी फिल्में इसके मुकाबले काफी आसान थीं। कॉमेडी करना इसे देखते हुए काफी आसान लगा। छोरी और छोरी 2 के लिए मुझे और विशाल सर को काफी चर्चा करनी पड़ी। मेरी बच्ची मुझसे छिन गई है, उस इमोशन में मुझे लगातार रहना पड़ा। पूरी शूटिंग के दौरान। एक ऐसी फिल्म में घुसना और निकलना वाकई बहुत मुश्किल है। हम एक्टर्स को वाकई एक फिल्म के बाद थैरेपी लेनी चाहिए कि इन इमोशन से कैसे निकलें। खुद को हील करना बहुत जरूरी है'।
हॉरर ही क्यों चुना विषय?
इस सवाल पर विशाल फुरिया ने कहा, 'हॉरर ऐसा जोनर है कि वह दिमाग पर छप जाता है। इसका इम्पैक्ट बहुत गहरा होता है। मैं जब 'लपाछपी' पहली फिल्म लिख रहा था तो पहले मैंने सिर्फ हॉरर फिल्म लिखना शुरू किया था। एक ऐसी कहानी, जिसमें एक बच्ची की दो मां हैं, एक मर गई और एक जिंदा है।
मैंने महाराष्ट्र में ऐसी कुछ कहांनियां सुनी थीं। फिर मुझे लगा कि यह चीजें खुद-ब-खुद फिल्म में आ रही हैं। जब 'लपाछपी' बनी तो बहुत सारी औरतें सिनेमा में आईं। उन्होंने फिल्म की तारीफ की और बच्चों को लड़कर फिल्म दिखाने थिएटर ले जा रही थीं। फिल्म ग्लोबर स्तर पर गई। यह हॉरर तब से बढ़ा ही है। हम समाज के हॉरर को फिल्म में मिरर कर रहे हैं'।
क्या कभी ट्रोलिंग से परेशानी हुई?
यह पूछा जाने पर नुसरत ने कहा, 'हम कुछ वक्त बाद ऐसी फिल्म बना रहे होंगे, जहां लोग सोशल मीडिया का प्रेशर को दिखा रहे होंगे। इस पर फिल्म बनेगी कि क्या हुआ हमारे युवाओं के साथ और खुद हमारे साथ कि हम इस दबाव को कैसे झेल पाए। यह बहुत बड़ा मॉन्स्टर है।
अब तो यह आदत हो गई है कि हम लोगों को उनके नाम नहीं, उनके सोशल मीडिया हैंडल के नाम से जानते हैं। यह जगह बहुत डरावनी हो चुकी है। पहले बाजार जाना, सब्जी खरीदना रोज का काम था। अब हम ऑनलाइन बैठकर सब्जियां खरीदते हैं तो मार्केट कौन जाएगा? हमने अपनी जिंदगी ऐसा बना ली है'।
क्या बदलते दौर के साथ सिनेमा में गालियों की जरूरत है?
संवाद के इसी सेशन में राइटर दिव्य प्रकाश दुबे से पूछा गया कि समय के साथ स्क्रिप्ट लेखन में बदलाव क्या आए हैं? अब गालियां भी कहानी का हिस्सा बन गई हैं। क्या इसकी जरूरत है?
इस पर दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा, 'टीवी सीरियल लिमिटिड तरीके से लिखे जाते थे। फिर जब हमें ओटीटी पर दस घंटे मिले और समय की पाबंदी नहीं रही तो हम फ्री हो गए। यह हम राइटर्स के लिए बहुत बड़ा मौका है। यह सवाल अक्सर आता है कि क्या गाली डालने से कोई चीज चलती है? तो कहूंगा कि बिल्कुल नहीं चलती।'
दिव्य ने आगे कहा, 'कोई चीज तब चलती है, जब कोई बात किसी को टच करती है। फिर उसमें गाली है या नहीं है। अगर 17 और 18 साल का कोई लड़का है, ऐसा हो नहीं सकता कि उसके जीवन में गाली न हो। पान सिंह तोमर फिल्म को ही देखिए कि डकैत के जीवन पर फिल्म है और उसमें एक भी गाली नहीं है। गली बॉय में एक भी गाली नहीं है, जबकि यहां होनी चाहिए थी। मेरा मानना है कि जबरदस्ती गाली शामिल करना और जहां जरूरत है वहां से हटाना दोनों ही ठीक नहीं है। ऐसे में बैलेंस बनाना पड़ता है।'
'अच्छी फिल्में बनानी ही पड़ेंगी'- नुसरत भरूचा
नुसरत भरूचा ने कहा, 'जब हम पिक्चरें बनाते थे और वह फिल्म चल गई तो वैसी ही फिल्में बनाते रहते थे। हॉरर चल गई तो हॉरर, इवेंट वाली चल गई तो इवेंट वाली ही बनाते रहो। आपका कहानी कहने और बनाने की जो सोल और पवित्रता होती है, वह कहीं गुम हो गई है। शायद लॉकडाउन एक वजह थी। सब घर बैठे थे और सबको काम करना था।
लॉकडाउन हटने के बाद जो अफरा-तफरी थी कि सबको काम करना है, लोग थिएटर नहीं जा रहे थे। घर से फिल्में-सिनेमा देखा जा रहा था। हमारा कंटेंट कहीं गुम हो गया और ओटीटी ने इतना कुछ दिखा दिया कि अब भी नहीं समझ आ रहा कि दर्शकों को क्या पसंद आएगा क्या नहीं। इसलिए इस भेड़चाल में है कि एक फिल्म चल गई तो वैसा ही कुछ बनाते रहो।
हम इस वक्त थोड़ा लॉस्ट हैं, हमें नहीं पता कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। कॉन्टेंट पिकअप होना ही पड़ेगा। अच्छी फिल्में बनानी ही पड़ेंगी'।
कंटेंट आधारित फिल्मों की कमी पर बोलीं नुसरत
नुसरत से पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि कंटेंट आधारित फिल्में आपको नहीं मिलीं? इस पर नुसरत ने कहा, 'मुझे कंटेंट नहीं मिलने की वजह अगर आपको सच में जाननी है तो बता दूं कि अगर आपने एक फिल्म में किसी को देख लिया तो वैसी ही फिल्में आपको मिलेंगी। जैसे कि मैंने 'प्यार का पंचनामा' की तो लोगों की मानसिकता हो गई कि ये ऐसे ही रोल कर सकती है।
तब आपको एक निर्देशक चाहिए, जो आपकी प्रतिभा को समझ सके और अलग किरदार दे। हर कलाकार को भूख होती है कि वो कुछ अलग करे। एक जैसा किरदार करने की बजाय, पिछली इमेज ब्रेक करने का मजा अलग है। मेरे हाथ जो आया वो मैंने दोनों हाथों से पकड़ा और मैंने किया'।
'छोरी' और 'छोरी 2' में नुसरत ही क्यों?
विशाल फुरिया से जब पूछा गया कि आपको कैसे लगा कि नुसरत 'छोरी 2' फिट हो जाएंगी? इस पर विशाल ने कहा, 'हर कलाकार नई चीजें नहीं देखता। कुछ कलाकार एक जैसी ही चीजें करते रहते हैं। उन्हें नए निर्देशक भी नहीं चाहिए।
हालांकि, मैं भी हिंदी इंडस्ट्री में नया था। मैं फिल्म बना रहा था। मुझे नुसरत से मिलने को कहा गया। मैं उनसे मिला तो इतनी अच्छी मीटिंग हुई। समझ आया कि जो मेरी भूख है, वही इनकी भी भूख है। हमारे प्रोड्यूसर के मुंह से भी इनका ही नाम निकला। यह हमारी फर्स्ट चॉइस बनीं फिल्म के लिए'।
क्या नुसरत को रियल लाइफ में डर लगता है? इस्राइल में लगा?
हां डर लगता है। बहुत रियल डर है मेरा। पानी से डर लगता है। मुझे स्विमिंग नहीं आती। छोरी 2 में मुझे कुएं में डाल दिया, बहुत डर लगा। मुझे बिल्डिंग के नीचे अटक जाने में भी डर लगता है। घुटन होती है। एक फॉरेन कंट्री में, जहां मुझे कुछ आइडिया नहीं था। वहां अटैक हो जाता है। वहां फंस जाने पर भी डर लगता है। वह हेल्पलेस फीयर था।
पानी में आप गिर जाओगे तब भी कम से कम आप हाथ पैर तो मारोगे ही। यहां तो डर था कि अब क्या ही करूं? वहां तो मैं सिर्फ कोई मदद मिलने का इंतजार ही कर सकती थी। कई बार एंजाइटी इस बात को लेकर भी होती है कि अब अगली पिक्चर कहां से आएगी? हर शुक्रवार को जो एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को लगता वो भी अपने आप में एक डर है।
आपने पीएम मोदी से बात की? क्या कहा आपने? क्या इस्राइल का जिक्र हुआ?
नुसरत ने कहा, 'मैं इस्राइल से जब से वापस आई तो खुद ठीक नहीं थी। मुझे PTSD का पता चला। मुझे उन चीजों से निकलने में वक्त लगा। मैंने थैरेपी लीं। तो मैं कभी उन्हें न मैसेज कर पाई पीएम ऑफिस को न कुछ। संयोग से हम लोग अभी एक ऐसी जगह साथ थे, जहां वे भी आए थे। तब मैंने उनसे बस यही कहा, 'थैंक्यू सो मच सर'। जब कोई आपसे कहे कि हम हैं। आप अकेले नहीं हो तो यही पर्याप्त है। यह सुनकर कोई असहाय नहीं महसूस नहीं करता। मुश्किल परिस्थिति में यह काफी होता है। आप उन स्थितियों से निकल सकते हो। उसके लिए मैंने उन्हें शुक्रिया कहा। उन्होंने मुझसे कहा कि गुजराती में क्यों नहीं बोलती हूं तुम गुजरात से हो। तो मैंने उनसे गुजराती में दो शब्द कहे बस'।
छोरी 2 तक तो आ गए, क्या छोरी 3 भी देखने को मिलेगा?
इस पर विशाल फुरिया ने कहा, 'हां बनाएंगे ऐसा लग रहा है। हर फिल्म के रेस्पॉन्स पर भी सीक्वल निर्भर करता है। छोरी को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। अब पार्ट 3 भी जरूर बनेगा। इस पर चीजें चल रही हैं। हम बैठेंगे इस बारे में तो कुछ निकलेगा।