यूं गुजरा दिल्ली का पहला फिल्म फेस्टिवल
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जंतर-मंतर, इंडिया गेट के आसपास जब दिल्ली गैंग रेप से जुड़े प्रदर्शन अपने चरम पर थे ठीक उन्हीं लम्हों में कनॉट प्लेस स्थित दिल्ली का एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटरऐतिहासिक क्षणों का सृजन कर रहा था। यहां 21 से 27 दिसंबर तक दिल्ली का पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया जा रहा था। फिल्म से इत्तफाक रखने वालों के लिए यह गौरव और आनंद के क्षण थे। यहां वहां की फिल्मों को देखने वाले बिना किसी शोर-शराबे के यहां पहुंचते रहे। सात दिन तक सुबह से शाम तक यहां लगातार तीन ऑडियों में फिल्में चलती रहीं। हर मिजाज और रेंज की फिल्में।
इस फिल्म फेस्टिवल में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वह कौन सी फिल्म छोड़ें और कौन से देखे। ऑडी के बाहर का नजारा भी कम दिलचस्प नहीं था। जब एक ही क्षेत्र के जानकार एक जगह एकत्रित हों तो स्वाभाविक है कि 'ज्ञानवर्द्घक गप्पे' छिड़ेंगी ही। यह गप्पे उन फिल्मों से कम मनोरंजन नहीं थीं जो अंदर ऑडी में चल रहीं थीं। फिल्म समीक्षक से लेकर किशोर उम्र के फिल्म प्रेमी इस फेस्टिलव में नजर आए। छुट्टी के दिन तो लोग सपरिवार फिल्म फेस्टिवल में पहुंचे। फेस्टिवल ने सबके लिए अपने दरवाजे खुले रखे थे। भारत के अलावा बड़ी संख्या में दूसरे देशों के लोग भी यहां दिखे। भाषा की बाध्यता या सीमाएं इस फेस्टिलव में नजर नहीं आईं।
यूं तो 1952 में ही भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (इफ्फी) की शुरुआत हो गई थी लेकिन यह समारोह लंबे अर्से तक खानाबदोश बना रहा और दिल्ली को इसकी मेजबानी के मौके बहुत कम मिले। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों से होता हुआ यह फेस्टिवल गोआ में जाकर टिक गया है। अर्से बाद दिल्ली को अपना फिल्म फेस्टिवल मिला। राजधानी दिल्ली में दिल्ली के नाम से किसी फिल्म समारोह ‘डिफ्फ’ का आगाज होना सचमुच गौरव की बात है।
इस फेस्टिलव में शामिल होने के दुनिया भर से तकरीबन सात सौ छोटी-बड़ी फिल्में आईं जिनमें से प्रदर्शन के लिए 32 देशों की 174 फिल्मों को चुना गया है। इन फिल्मों में जहां दूर-दराज के देशों की फिल्में हैं तो वहीं पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल की फिल्में भी रहीं। पाकिस्तानी फिल्मों ने प्रभावित भी किया। इस बात का एहसास हुआ कि यह फिल्मकारों को यदि छूट होती तो वह किस तरह का सिनेमा रचते। समारोह की समापन फिल्म भी पाकिस्तान की ‘लम्हा’ ही रही। यहां एक सेक्शन एनआरआई फिल्मकारों की फिल्मों का भी रहा। भारत के तमाम एनआरआई फिल्मकार चाहकर भी भारत में अपनी फिल्म नहीं दिखा पाते हैं। उनके लिए यह फेस्टिवल बड़ा मौका लेकर आया। उन्होंने प्रभावित भी किया।
इस फिल्म फेस्टिलव में लेखिका तसलीमा नसरीन, फिल्मकार मुजफ्फर अली, केंद्रीय मंत्री हरीश रावत के अलावा साहित्य और राजनीति के क्षेत्र से कई चर्चित चेहरे दिखे। कई बड़े फिल्मकारों को इस फेस्टिवल में शरीक होना था लेकिन अलग-अलग कारणों से वह नहीं आ सके। इस कार्यक्रम को संयोजित करने वाले रामकिशोर पारचा कहते हैं कि दिल्ली की शुरुआत है। हम हर साल ऐसे आयोजन करके दुनिया और देश को बता देंगे कि फिल्मी समझ के मामले में दिल्ली कितनी प्रबुद्घ हैं।