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क्या मार सकेगी मौत उसे औरों के लिए जो जीता है!
देव प्रकाश चौधरी
Updated Sat, 13 Jul 2013 08:50 AM IST
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वह गिरगिट की तरह चेहरे का भाव बदल सकते थे, शैतान की तरह आंखें घूमती थीं, धारदार चाकू की तरह संवाद निकलते थे और मुस्कान ऐसी खतरनाक कि जान ही सूख जाए।
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लेकिन कैमरा बंद होता था तो कुछ पल पहले का शैतान एक शरारती मासूम बच्चे में बदल जाता था...तभी तो उन्हें सर आंखों पर बिठा कर तालियां बजाती रही ये दुनिया।
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पान की दुकान पर किस्मत से मुलाकात हुई तो दुनिया को एक ऐसा अभिनेता मिला, जिन्हें कभी देखकर लोग भागते थे तो कभी जिन्हें देखने के लिए भीड़ जमा होती थी।
हिंदी फिल्मों के 'प्राण' नहीं रहे
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वह भारतीय सिनेमा के इकलौते खलनायक थे, जिनकी फोटो पोस्टर पर देखकर लोग सरेआम उसको गालियां देते थे, जूते बरसाते थे।
आवाज में वह दम था, जिसे लोग सुनने के लिए हरपल बेकरार रहते थे और जब उन्होंने खलनायक से चरित्र अभिनेता के रूप में खुद को ढाला तो गले लगाने के लिए हजारों हाथ आगे बढ़ गए...क्योंकि वह प्राण थे।
प्राण के फिल्मी सफर के 21 अनसुने किस्से
किसे पता था कि दिल्ली और शिमला को छोड़कर फोटोग्राफी में कैरियर को तराश रहे एक बेहद खूबसूरत नौजवान के लिए लाहौर के मैसालोर रोड की एक पान की दुकान पर किस्मत इंतजार कर रही है।
पान चबाने और थूकने की अदा पर एक फिल्म निर्माता दलसुख एम पंचौली के लिए कहानी लिख रहे वली मोहम्मद वली इस कदर फिदा हुए कि प्राण की जिंदगी की कहानी भी फिल्मी अंदाज में बदलती चली गई।
लाहौर से मुंबई का सफर और फिर एक से बढ़कर एक अदाकारी। एक वक्त वह भी आया जब दर्शक यह पूछते थे कि इस फिल्म में प्राण हैं या नहीं? जवाब होता था कि प्राण हैं, तो उसके मुंह से यही वाक्य निकलता कि प्राण है तो फिल्म में जान जरूर होगी।
भारतीय सिनेमा के आन बान और शान थे प्राण
विक्टोरिया न. 203 में दिलफेंक आशिक मिजाज, जिस देश में गंगा बहती है में राका डाकू इसके इतर सलीम जावेद की जंजीर में पठान और उपकार में मंगल चाचा समेत तमाम अनेक ऐसी फिल्में हैं जिनमें प्राण के अभिनय के सामने अन्य अभिनेताओं का अभिनय चलता सा लगा।
जंजीर में अपने अभिनय पर उन्होंने कहा था-"'जंजीर' की बात करूं, सिर्फ एक कास्ट्यूम, लाल दाढ़ी और बिग पहनने से ही मैं शेर खान थोड़े ही हो सकता था। उसके लिए आवाज का उतार-चढ़ाव भी तो जरूरी था। मैंने अपने तई इस बात पर जोर दिया कि मेरी आवाज एक असली पठान की तरह ही लगनी चाहिए। मैंने इसके लिए खूब मेहनत की। कई बार तो मुझे एक सही शब्द बोलने के लिए 18-18 रीटेक देने पड़े।"
फिल्मों के 10 डायलॉग, जिनमें प्राण ने डाली जान
1969 से 1982 तक प्राण का ऐसा चमत्कारिक दौर था जब अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना जैसे अन्य बड़े सितारों को उनके नायक बनने पर इतना पैसा नहीं मिलता था जितना कि प्राण को उनकी ख़लनायक की भूमिका पर दिया जाता था। लेकिन अभिनय के इस अदभुत व्यक्तित्व को अपना पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिलने में 20 वर्ष लग गए।
1968 में उपकार, 1970 में आंसू बन गए फूल, 1973 में फिल्म बेईमान के लिए फिल्मफेयर अवार्ड व इसके बाद 1997 में लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड तथा 2001 में पद्म भूषण सम्मान मिला।
एक लंबी अवधि फिल्मी दुनिया में बिताने के बाद वर्ष 1998 में उन्होंने फिल्मों से अलविदा कहा और अब जब वे दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं तो बार-बार फिल्म 'संन्यासी' का उन पर फिल्माया गाना 'क्या मार सकेगी मौत उसे औरों के लिए जो जीता है' याद आ रहे हैं।
एक विराट व्यक्तित्व है प्राण साहब का, जिनकी उपस्थिति ने फिल्म दर्शकों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। वास्तव में साठ साल तक दर्शकों और उनके बीच पूरी तरह एक जादुई रिश्ता व डायलॉग बना रहा। प्राण का अर्थ है- जीवन या जान, और उन्होंने अपनी बेजोड़ व बेदाग कलाकारी से सिनेमा में यही डाला भी। उन्होंने दर्शकों के दिलों को आतंक से दहला देने के बाद भी यह शिक्षा देकर उसका शमन भी किया कि ‘देवियों और सज्जनों, बुराई कभी नहीं जीतती।’--अमिताभ बच्चन