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हर इन्सान के अंदर एक 'सत्याग्रह' है: प्रकाश झा
देव प्रकाश चौधरी
Updated Sun, 28 Apr 2013 09:59 AM IST
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फिल्म 'सत्याग्रह' की शूटिंग भोपाल में तकरीबन दो महीने से चल रही है। इसी दौरान अमर उजाला के फीचर हेड देव प्रकाश चौधरी को 'सत्याग्रह' के बारे में भीतर से जानने का मौका मिला।
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आइए जानें, प्रकाश झा और उनकी टीम ने अमर उजाला को 'सत्याग्रह' से कैसे रू-ब-रू करवाया।
हर इन्सान के अंदर एक 'सत्याग्रह' है, निर्देशक प्रकाश झा उसे बाहर निकालने के लिए अपनी पूरी टीम के साथ भोपाल में जुटे हैं। कहते हैं, `इसे 'पर्सनल सत्याग्रह' से जोड़ कर देखिए।
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आदमी की जिंदगी में और समाज में सत्याग्रह कई रूप में आता है।’ इसके भी कई रूप हैं। एक रिश्ते में बाप होता है, जाहिर है वह अमिताभ बच्चन ही होंगे।
एक रिश्ते में बेटा होता है, वह अजय देवगन हैं। बाप अपना बेटा खो चुका है। उसे अब समाज की फिक्र है। इधर बेटा भी अपना बाप खो चुका है। एक बाप और एक बेटे के मन के उद्वेलन से सत्याग्रह शुरू होता है।
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लेकिन यह सब इतना आसान है क्या? मनोज वाजपेयी का भी रोल है, वे भी तो आएंगे। अर्जुन रामपाल हैं, उनका अपना सत्य है। सत्याग्रह में विघ्न यहीं से शुरू होता है।
फिर बिना किसी रिश्ते के पत्रकार बनकर करीना कपूर आती हैं। बाद में स्क्रिप्ट के हिसाब से उनका रिश्ता तय होता है।
कभी भोपाल की शान रहे और अब लगभग खंडहर बन चुके ताजमहल के सुनसान माहौल में संगीतकार आदेश श्रीवास्तव का गाया गाना, `सांवरिया...रस से भरे तोरे नैन...’ गूंजता है, पत्रकार करीना वहां आती हैं, अजय देवगन पहले से वहां होते हैं। प्रेम का एक सच सामने आता है।
फिल्म की शूटिंग पिछले कई महीनों से जारी है। इस पर कई तरह की चर्चाएं भी हो चुकी हैं।
लोग अपनी-अपनी तरह से इसकी व्याख्या करते रहे हैं। किसी ने कहा, `फिल्म में अमिताभ अन्ना हजारे के रोल में हैं। अजय देवगन अरविंद केजरीवाल हैं।’ फिल्मी बात चलती है, तो बिना डोर की पतंग की तरह इधर से उधर उड़ती-फिरती रहती है।
कई सप्ताह से अपने ससुराल (भोपाल) में डटे अमिताभ बच्चन ऐसी चर्चाओं का खंडन नहीं करते। समर्थन भी नहीं करते। वह फिल्म के 'द्वारका आनंद' हैं, बस शहंशाही मुस्कान के साथ कहते हैं, `फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी। आनंद आ जाएगा।’
अजय देवगन फिल्म में 'मानव' हैं-`यह `गंगाजल’ से आगे की चीज है।’ अपने अभिनय और रोल को लेकर वह आत्मविश्वास से भरे दिखते हैं।
करीना कपूर यास्मिन के नाम से फिल्म में दर्शकों से रूबरू होंगी। पत्रकार का किरदार। बात मामूली नहीं और ऊपर से प्रकाश झा जैसे कड़क निर्देशक!
करीना कहती हैं, `प्रकाश जी के साथ काम करते हुए हम बहुत कुछ सीखते हैं। स्क्रिप्ट इतनी जानदार है कि दर्शकों को कुछ नया, लीक से हटकर देखने को मिलेगा।’ लेकिन करीना को एक मलाल भी है, `पत्रकार का रोल कर रही हूं, पर किसी से यह नहीं पूछ पाई कि आप शादी कब करोगे।’
फिल्म की कहानी अंबिकापुर नाम के एक कस्बे के इर्द-गिर्द भी घूमती है। जिन लोगों ने प्रकाश झा की राजनीति देखी है, उन्हें शायद याद होगा कि कैटरीना कैफ एक मैदान में लोगों को संबोधित करती हैं।
भोपाल का वह मैदान `सत्याग्रह’ का अंबिकापुर बन चुका है। एक कस्बा बसाया गया है। घर, दुकानें, सिनेमाहॉल सब कुछ वैसे ही, जैसा कस्बों में होता है।
सेट के मामले में प्रकाश झा खिलाड़ी हैं, `छह महीने के लिए सरकार से मैदान लीज पर लिया और एक शहर बसाया।’ अंबिकापुर में एक गांधी चौक भी है। करीब-करीब हर दीवार पर पोस्टर चिपके हुए हैं- `द्वारका आनंद को रिहा करो, क्या इस शख्स को जेल के अंदर रहना चाहिए, फ्री द्वारका’ आदि-आदि।
जाहिर है फिल्म में द्वारका आनंद जेल जाते हैं। मगर क्यों? जवाब प्रकाश झा टाल देते हैं, `सत्याग्रह को जंतर-मंतर का धरना नहीं समझिए। यह रामलीला मैदान का कोई अनशन भी नहीं है। यह आम आदमी की जिंदगी में मूल्यों की एक लड़ाई है, जिससे सब जूझते हैं।’ अमिताभ भी जूझते हैं।
जिंदगी का संघर्ष और बढ़ जाता है, जब मनोज वाजपेयी के 'फिल्मी उत्पात' का असर इस कस्बे पर पड़ता है और कहानी में नया मोड़ आता है। और भी कई मोड़ हैं।
फिल्म की शूटिंग पचास दिन से ज्यादा हो चुकी है। अब भी जारी है। भोपाल में इन दिनों और भी कई फिल्मों की शूटिंग हुई। सन्नी देओल और प्रकाश राज भी वहां अपनी आने-वाली फिल्म `सिंह साहब दि ग्रेट’ की शूटिंग कर चुके हैं, लेकिन वहां के लोगों में `सत्याग्रह’ का आकर्षण कुछ ज्यादा ही है।
इस फिल्म के कुछ हिस्से की शूटिंग नूर-अस-सभा पैलेस नाम के हैरिटेज होटल में भी हुई है। फिल्म कब पूरी होगी, यह तो किसी ने नहीं बताया लेकिन अगस्त में रिलीज होगी।
खबर यह भी आई है कि इसका प्रीमियर दक्षिण अफ्रीका में भी होगा, जहां गांधीजी ने अपना पहला सत्याग्रह शुरू किया था। यानी अन्ना और केजरीवाल की जिंदगी से जुड़ चुकी यह कहानी अब गांधी की ओर मुड़ चुकी है।
शूटिंग में जो देखा, एडिटिंग में जो होगा और फिर फिल्म में जो देख पाएंगे, वह भी एक अलग कहानी होगी, लेकिन अमिताभ बच्चन तो यही कहते हैं- `यह आम आदमी की कहानी है।’
विवाद पर बोले प्रकाश झा
आमतौर पर लोग मानते हैं कि फिल्मों पर हुए विवाद में निर्माता, निर्देशक और अभिनेता का ही हाथ होता है, ताकि एक किस्म का प्रचार मिले और फिल्मों का बिजनेस अच्छा हो।
बहुत सारे लोग प्रकाश झा को भी इसी श्रेणी में रखकर देखते हैं। चाहे वह `गंगाजल’ के साधु यादव का विवाद हो या कुछ समय पहले आई `आरक्षण’ का।
विवाद इनकी फिल्मों में भी उठता है, लेकिन प्रकाश झा कहते हैं-`विवाद से किसी का भला नहीं होता। `आरक्षण’ के विवाद से मुझे नुकसान हुआ। और इस बात में कोई दम नहीं कि विवाद हम लोग खुद फैलाते हैं। हम बोलते कुछ और हैं, लोग कुछ और अर्थ निकालते हैं। अब देखिए न, `सत्याग्रह’ के कितने अर्थ निकल रहे हैं?’