इस सुपरस्टार की हां ने बदल दी मिलाप झावेरी की जिंदगी, अमर उजाला से EXCLUSIVE मुलाकात में किया खुलासा
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फिल्म 'ये मोहब्बत है' से लेखक के तौर पर फिल्मी दुनिया में आए मिलाप झावेरी ने फिल्म 'जाने कहां से आई है' से निर्देशन में कदम रखा। मिलाप की अगली फिल्म है 'मरजावां' जिसमें वह फिल्म एक विलेन की हिट जोड़ी सिद्धार्थ मल्होत्रा और रितेश देशमुख को साथ ला रहे हैं। ऐसे में अमर उजाला ने की निर्देशक के साथ खास बातचीत..
आपने एक्शन, ड्रामा, रोमांस, थ्रिलर लगभग सभी तरह की फिल्मों के संवाद लिखे हैं। आपको सबसे ज्यादा मजा क्या लिखने में आता है?
मुझे सबसे ज्यादा मजा एक्शन, थ्रिलर में आता है। जब डायलॉग्स पर थिएटर में सीटियां बजती हैं, तालियां बजती हैं तो मुझे बहुत मजा आता है। चाहे मेरी फिल्म कांटे हो, मुसाफिर हो, शूटआउट एट वडाला हो या सत्यमेव जयते हो, जो मज़ा दर्शकों की तालियों और सीटियां सुनने में है, वैसा मज़ा किसी और चीज़ में नहीं है। वहीं कॉमेडी में जब लोग दिल खोलकर हंसते हैं तो अच्छा लगता है।
बतौर निर्देशक आपकी पहली फिल्म 'जाने कहां से आई है' के समय से आपकी रितेश से दोस्ती रही है, फिल्म भी अच्छी बनी, क्या वजह रही इसके फ्लॉप होने की?
मुझे रितेश के साथ कुछ अलग करना था। उन्होंने कॉमेडी तो बहुत की थी लेकिन 'तुझे मेरी कसम' के बाद उन्होंने लव स्टोरी नहीं की थी। तो इसी से विचार आया कि एक लड़का, एक एलियन लड़की के प्यार में गिर जाता है, तो क्या होता है? दुर्भाग्य से उस समय फ़िल्म की मार्केटिंग और प्रमोशन ठीक से नहीं हो पाया था। अच्छी और बुरी तो दूर की बात है, लोग थिएटर तक पहुंच ही नहीं पाए। तब इतनी अवेयरनेस भी नहीं थी।
और एक समय ऐसा भी आया जब लोगों ने आपसे मिलना बंद कर दिया?
मैंने 'ग्रैंड मस्ती' लिखी जो काफी बड़ी हिट हुई थी। फिर 'मस्तीजादे' का ऑफर मिला। सनी लियोनी की रागिनी एमएमएस 2 भी अच्छी चली। 'मस्तीजादे' बनने के बाद फिल्म सेंसर में अटकने के चलते आठ-नौ महीने लेट हो गई। तब तक उसी तरह की फ़िल्म 'क्या कूल हैं हम 3' रिलीज हो गई। 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' भी लाइन में लग गई। मस्तीजादे नहीं चली तो बतौर लेखक भी मुझे काम मिलना बंद हो गया। लोगों ने मिलना ही छोड़ दिया। मैंने कांटे, शूटआउट एट वडाला जैसी फिल्में लिखी थी लेकिन, मुझे ऐसी फिल्में निर्देशित करने का मौका कोई नहीं दे रहा था।
फिर आपको मिला वरदान सत्यमेव जयते का?
जी हां, कह सकते हैं। खाली दिनों में मैंने एक शॉर्ट फिल्म 'राख' बनाई जिसमें वीरदास और रिचा चड्ढा थे। उस फिल्म को सराहना मिली तो मेरे अंदर एक आस जगी। तभी मुझे सत्यमेव जयते का विचार आया। मैंने स्क्रिप्ट लिखी और जॉन से मुलाकात की। उन्होंने फिल्म के लिए तुरंत हां बोल दिया और फिर मेरी ज़िंदगी बदल गई। जितना मजा मुझे जॉन के साथ आया, उतना ही मज़ा मुझे 'मरजावां' में आया।
रितेश देशमुख को आप अपनी पहली फिल्म से जानते हैं, कितने बदले रितेश अब तक?
रितेश दिल के बहुत साफ व्यक्ति हैं। मैं उन्हें अपनी निर्देशित पहली फ़िल्म से जानता हूं। एक लेख के रूप में मैंने उनके साथ मस्ती, हे बेबी, हॉउसफुल जैसी फिल्में की हैं। वह दोस्तों पर जान छिड़कते हैं। मैं उन्हें 'सेठ जी' बुलाता हूं। वह मेरे दोस्त तो हैं ही, साथ ही मेरे मेंटॉर भी हैं।
फ़िल्म के फाइट सीक्वेंस दक्षिण भारतीय फिल्मों से दिख रहे हैं, वजह?
भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी हिट एक दक्षिण भारतीय फिल्म ही है। दिवाली पर रिलीज हुई फ़िल्म 'बिजिल' भी ब्लॉकबस्टर हुई है। जनता को एक सुपरहीरो चाहिए। उसकी असल जिंदगी में हीरो नहीं होते तो वह पर्दे पर हीरो देखने आती है। सनी देओल, अजय देवगन, अक्षय कुमार जब एक्शन करते हैं तो पब्लिक तालियां बजाती हैं। मरजावां में सिद्धार्थ मल्होत्रा को हमने वही बनाया है जिसके वह हकदार हैं। और, जनता भी उन्हें ऐसे ही किसी रोल में देखने को बेताब रही है।