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दिलों में आज भी जिंदा हैं किशोर कुमार

Sun, 13 Oct 2013 08:07 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 13 Oct 2013 08:07 AM IST
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kishore kumar is in heart

बीच राह में दिलबर बिछड़ जाये कहीं हम अगर और सूनी सी लगे तुम्हें जीवन की ये डगर हम लौट आयेगें तुम यूं ही बुलाते रहना  कभी अलविदा ना कहना... हिन्दी सिने जगत के महान पार्श्व गायक किशोर कुमार का नजरिया उनके गाये इन पंक्तियों में समाया हुआ है। उनकी पुण्यतिथि पर जाने उनसे जुड़ी ये नौ किस्से।

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क्या था किशोर दा का सपना
मध्यप्रदेश के खंडवा में 4 अगस्त 1929 को मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में अधिवक्ता कुंजी लाल गांगुली के घर मे जन्मे किशोर कुमार के.एल.सहगल के गानों से प्रभावित होकर उनकी ही तरह के गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह लिये किशोर कुमार 18 वर्ष की उम, मे मुंबई पहुंचे. लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पायी।  जबकि बालीवुड में अशोक कुमार की पहचान के कारण उन्हें बतौर अभिनेता काम मिल रहा था।
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अभिनय से नहीं था प्यार
अपनी इच्छा के विपरीत किशोर कुमार ने अभिनय करना जारी रखा। जिन फिल्मो में वह बतौर कलाकार काम किया करते थे उन्हें उसमें गाने का भी मौका मिल जाया करता था। बतौर गायक सबसे पहले उन्हें वर्ष 1948 में बाम्बे टाकीज की फिल्म 'जिद्दी' में सहगल के अंदाज मे हीं अभिनेता देवानंद के लिये..मरने की दुआएं क्यूं मांगू..गाने का मौका मिला।
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नाकामयाब रही पहली फिल्म
किशोर कुमार ने वर्ष 1951 मे बतौर मुख्य अभिनेता फिल्म आन्दोलन से अपने करियर की शुरूआत की लेकिन इस फिल्म से दर्शको के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके। वर्ष 1953 मे प्रदर्शित फिल्म लड़की बतौर अभिनेता उनके कैरियर की पहली हिट फिल्म थी। इसके बाद बतौर अभिनेता भी किशोर कुमार ने अपनी फिल्मो के जरिये दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया।

निर्देशन में भी छोड़ी छाप
किशोर कुमार ने 1964 मे फिल्म..दूर गगन की छांव मे.. के जरिये निर्देशन के क्षेत्र मे कदम रखने के बाद हम दो डाकू.दूर का राही. बढ़ती का नाम दाढ़. शाबास डैडी. दूर वादियो मे कही. चलती का नाम जिंदगी और ममता की छांव मे जैसी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया।

संगीतकार भी बने
निर्देशन के अलावा उन्होनें कई फिल्मों मे संगीत भी दिया जिनमें झुमरू. दूर गगन की छांव मे. दूर का राही. जमीन आसमान और ममता की छांव मे जैसी फिल्मे शामिल है। बतौर निर्माता किशोर कुमार ने दूर गगन की छांव में और दूर का राही जैसी फिल्में भी बनायीं।

ऐसे बने गायकी के बेताज बादशाह
वर्ष 1969 मे निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के जरिये किशोर कुमार गायकी के दुनिया के बेताज बादशाह बने लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के आरंभ के समय संगीतकार सचिन देव वर्मन चाहते थे सभी गाने किसी एक गायक से न गवाकर दो गायकों से गवाएं जाएं।
बाद में सचिन देव वर्मन की बीमारी के कारण फिल्म आराधना में उनके पुत्र आर.डी.बर्मन ने संगीत दिया।..मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू.. और..रूप तेरा मस्ताना.. गाना किशोर कुमार ने गाया. जो बेहद पसंद किया गया। रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके साथ ही फिल्म आराधना के जरिये वह उन ऊंचाइयों पर पहुंच गये जिसके लिये वह सपनों के शहर मुंबई आये थे।

विवादों से भी रहा नाता
हरदिल अजीज कलाकार किशोर कुमार कई बार विवादों का भी शिकार हुए। सन् 1975 में देश में लगाये गये आपातकाल के दौरान दिल्ली में एक सांस्कृतिक आयोजन में उन्हें गाने का न्यौता मिला।किशोर कुमार ने पारिश्रमिक मांगा तो आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गायन को प्रतिबंधित कर दिया गया। आपातकाल हटने के बाद पांच जनवरी 1977 को उनका पहला गाना बजा..दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना.जहां नहीं चैना वहां नहीं रहना..।

आठ बार जीता फिल्मफेयर

किशोर कुमार को उनके गाये गीतों के लिये 8 बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। किशोर कुमार ने अपने सम्पूर्ण फिल्मी कैरियर मे 600 से भी अधिक हिन्दी फिल्मों के लिये अपना स्वर दिया।


फिर नहीं नसीब हुई गांव की मिट्टी
वर्ष 1987 मे किशोर कुमार ने निर्णय लिया कि वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गांव खंडवा लौट जायेंगे। वह अक्सर कहा करते थें कि..दूध जलेबी खायेंगे खंडवा में बस जायेंगे..लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रह गया।
13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार को दिल का दौरा पडा और वह इस दुनिया से विदा हो गये।

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