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‘लड़कियां अपना चेहरा क्यों ढकती हैं?’, जावेद अख्तर ने बुर्का पहनने पर उठाया सवाल; बोले- हो चुका है ब्रेनवॉश

Thu, 18 Dec 2025 04:34 PM IST
आराध्य त्रिपाठी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: आराध्य त्रिपाठी Updated Thu, 18 Dec 2025 04:34 PM IST
सार

Javed Akhtar On Burqa: जावेद अख्तर अपने गीतों के साथ-साथ अपनी बेबाकी के लिए भी जाने जाते हैं। अब जावेद अख्तर ने बुर्का को लेकर ऐसा बयान दिया है, जो चर्चा में है। जानिए गीतकार ने क्या कहा…

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Javed Akhtar Questioning To Wearing Burqa He Sparked Conversation On Choice Dignity And Social Pressure
जावेद अख्तर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

दिग्गज गीतकार जावेद अख्तर किसी भी मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए मशहूर हैं। अब गीतकार ने एक बार फिर एक ऐसे मुद्दे पर अपनी राय रखी है, जिस पर बहस होना लाजिमी है। जावेद अख्तर ने इस बार महिलाओं के बुर्का पहनने को लेकर अपनी राय रखी है। लेखक ने महिलाओं के बुर्का पहनने पर सवाल उठाते हुए पूछा कि एक महिला को अपने चेहरे से शर्म क्यों आनी चाहिए? जानिए लेखक ने इस पूरे मामले पर अपनी क्या राय रखी…

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खुले कपड़े सही नहीं लगते
संस्कृति मंत्रालय द्वारा समर्थित इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी द्वारा आयोजित एक सत्र में बोलते हुए, जावेद अख्तर ने बुर्का या हिजाब पहनने के मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखी। छात्रों और आम जनता की मौजूदगी वाले इस सत्र में चर्चा के दौरान एक युवा लड़की ने जावेद अख्तर की उस टिप्पणी का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका पालन-पोषण ऐसी महिलाओं के बीच हुआ है जो बुर्का नहीं पहनती थीं। लड़की ने पूछा कि क्या खुद को ढकने से महिला की ताकत कम हो जाती है? इसी सवाल पर जावेद अख्तर ने बेबाकी से अपना जवाब देते हुए कहा, ‘आपको अपने चेहरे पर शर्म क्यों आनी चाहिए? मेरा मानना है कि खुले (Revealing) कपड़े चाहे पुरुष पहनें या महिलाएं, गरिमापूर्ण नहीं लगते। अगर कोई पुरुष ऑफिस या कॉलेज में बिना आस्तीन की कमीज पहनकर आता है, तो यह ठीक नहीं है। उसे ढंग से कपड़े पहनने चाहिए। इसी तरह महिलाओं को भी सलीके से कपड़े पहनने चाहिए।’

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क्यों ढकना है अपना चेहरा?
इस दौरान जावेद अख्तर ने सलीके से कपड़े पहनने और चेहरा ढकने के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया। गीतकार ने कहा कि लड़कियां अपना चेहरा क्यों ढकती हैं? उनके चेहरे में ऐसा क्या भद्दा, अश्लील, अशोभनीय है कि वह उसे ढकती हैं? क्यों? इसका क्या कारण है? लोगों से इस बारे में सोचने के लिए कहते हुए जावेद अख्तर ने इसे सामाजिक दबाव बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले शायद ही कभी अकेले लिए जाते हों। यह एक सामाजिक दबाव का नतीजा है। क्योंकि उसका ब्रेनवॉश हो चुका है। अगर वो ये कहती भी है कि वो अपनी मर्जी से ये सब कर रही है, तब भी उसका ब्रेनवॉश हो चुका है। क्योंकि उसे पता है कि उसके कुछ साथी इस बात की तारीफ ही करेंगे।

इन प्रथाओं को नहीं देना चाहिए बढ़ावा
लड़कियों-महिलाओं को इस बारे में खुद चुनाव करने की स्वतंत्रता देने का जावेद अख्तर ने समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर आप उसे स्वतंत्र छोड़ दें, तो कोई अपना चेहरा क्यों ढकेगा? क्या वह अपने चेहरे से नफरत करती है? क्या उसे अपने चेहरे पर शर्म आती है? लेकिन ये सब सिर्फ सामाजिक दबाव में और समाज को दिखाने के लिए करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक दबाव और लंबे समय से चली आ रहीं प्रथाएं, लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और चुनाव की क्षमता को दबा देती हैं। मेरा मानना है कि हमें इन प्रथाओं को लोगों का व्यक्तिगत फैसला मानकर सांस्कृतिक और सामाजिक ताकतों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। वर्ना इनके दूरगामी परिणाम और भी खतरनाक हो सकते हैं।

जावेद अख्तर को मिला सम्मान
शिक्षा 'ओ' अनुसंधान विश्वविद्यालय में आयोजित हुए इस महोत्सव में जावेद अख्तर को साहित्य और कला में उनके योगदान के लिए एसओए साहित्य सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

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