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Exclusive Interview: प्रसून जोशी बोले- स्ट्रगल का महिमामंडन नहीं करता

Sat, 17 Sep 2016 09:33 PM IST
टीम डिजिटल /अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल /अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 17 Sep 2016 09:33 PM IST
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Happy birthday Prasoon Joshi: exclusive interview and interesting facts about prasoon joshi
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता गीतकार, हिंदी कवि, ऐड गुरू और कहानीकार प्रसून जोशी का आज जन्मदिन है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा से लेकर मुंबई की मायानगरी तक उनकी जर्नी रोचक, प्रेरक और रोमांचक रही है। जन्मदिन के खास मौके पर उन्होंने निजी व सामाजिक जीवन से जुड़े छुए और अनछुए मुद्दों पर खास और तफ्सील से बातें कीं। 
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पहाड़ से लुढका हुआ पत्‍थर हूं 
मुझसे अपने संघर्ष का महिमामंडन नहीं होता। क्यों नहीं होता, इसका कारण आप को बताता हूं। जिस जीवन और संघर्ष का हम जिक्र करते हैं, वह हर किसी के हिस्से आता है। यह कहना गलत होगा कि संघर्ष सिर्फ हम आप के हिस्से आता है। ऐसे में उसका महिमामंडन करना देश के उस बृहद आबादी की जिंदगी का मखौल उड़ाना सा होगा, जो रोजाना सालों से वह जिंदगी जी रहे हैं। वह आबादी उसे संघर्ष कैसे कह सकती है? अगर मैं यहां आकर छोटे से कमरे में रहकर आज अट्टालिकाओं में रह रहा हूं, तो मुंबई में  छोटे से कमरे में बिताई रात को संघर्ष नहीं सफर कहूंगा। ऐसा सफर, जिसे इस देश का किसान, मजदूर, मिडिल क्लास रोज जीता है। ठीक है आज मेरे पास गाड़ी और बंग्ले हैं, पर मैं अंधेरी रातें भी मेरी उतनी ही अपनी हैं, जितनी आज तमाम सुख-सुविधाओं से लैस कमरे में बिताई रात। हालांकि कई लोग अपने संघर्ष का महिमामंडन करते हैं। मुझसे वह नहीं होता। हां, अपने सफर में मुझसे ढेर सारी चीजें टकराईं। कुछ खूबसूरत चीजें मुझे मिलीं। तो कई खराब चीजें भी, पर मेरे निर्माण में दोनों का योगदान है। मैं स्वंय को पहाड़ से लुढ़का हुआ पत्‍थर का वह गोला मानता हूं, जो नदी और समंदर किनारे तराशा हुआ मिलता है। पता नहीं वह कबसे लुढकता हुआ आ रहा है। चट्टानों से टकराता हुआ। ऐसे ही मैं भी लुढ़कता हुआ, टकराता हुआ यहां तक पहुंचा हूं। लिहाजा आप को लगता है कि मैं तराशा हुआ हूं। मुझ में कुछ अच्छा है तो उसका श्रेय उन चोटों को है, जिसकी वजह से मुझ जैसा पत्‍थर यहां तक पहुंच सका।
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इस इंटरव्यू का वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें 
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संघर्ष के किस्सों से प्रेरणा न लें  

Happy birthday Prasoon Joshi: exclusive interview and interesting facts about prasoon joshi

 मैं बंबई से पहले दिल्ली रहा। दिल्ली में कुछ दोस्तों के साथ रहा करते थे। छोटा सा कमरा था। खुद से खाना बनाना। कमरा इतना छोटा था कि अगर कोई बाथरूम जाए तो उस का पांव दूसरे के माथे से टकराए ही। कई बार भूखे पेट भी सोना पड़ता था।

लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि इन चीजों की परवाह आप के सुनने वालों को नहीं करनी चाहिए। प्रेरणा भी नहीं लेनी चाहिए। वह मेरे काम से लेनी चाहिए। यह ज्यादा जरूरी है कि आप के सपने प्रज्जवलित हैं कि नहीं? आप को अपने सपनों में यकीन रखना चाहिए। बाकी भोजन मिलेगा कि नहीं बहुत छोटी सी बात है। वह संघर्ष तो पुराने जमाने का होता था, जब गांव से निकले इंसान को शाम हो जाती थी, शहर पहुंचते-पहुंचते।

रास्ते में कभी खाना मिलता था, कभी नहीं। बंबई में आप सड़क पर आधे घंटे खड़े हो जाइए, आप को खाना मिल जाएगा। आज आप एक प्वॉइंट से दूसरे प्वॉइंट तक पैदल पहुंचेंगे कि गाड़ी से, खाना मिलेगा कि नहीं। पानी मिलेगा कि नहीं, इन चीजों का संघर्ष नहीं है।

आज  संघर्ष यह है कि आप अपनी प्रतिभा जो भी समझते हैं, वह चाहे जिस किसी फील्ड से जुड़ी हो, पत्रकारिता से जुड़ी हो, आप की तरह। आप कॉरपोरेट वर्ल्ड में कुछ करना चाहते हैं। आप बिजनेस में कुछ करना चाहते हैं।

आप राजनीति में कुछ करना चाहते हैं। यह समझिए कि आप जो किताबों में पढ़ते हैं, सच्चाई उससे बिल्कुल उलट है। और एक व्यक्ति की सच्चाई, दूसरे व्यक्ति की सच्चाई नहीं होती। हरेक व्यक्ति का सच यूनिक है।

ठीक उसी तरह, जैसे आप की प्रतिभा यूनिक है। आप का टैलेंट यूनिक है। वैसे ही आप का संघर्ष यूनिक है। कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें शारीरिक संघर्ष से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे मानसिक उद्वेलन से परेशान होते हैं। कई लोग ऐसे हैं, जो शारीरिक संघर्ष से परेशान हो जाते हैं। हर तासीर के लोग हैं। तो अपनी तासीर को समझना। अपने ध्येय को समझ लगातार उस तरफ काम करते रहना जरूरी है। 

सफलता को फिर से डिफाइन करें

Happy birthday Prasoon Joshi: exclusive interview and interesting facts about prasoon joshi

सफलता की एक नैरो डेफिनिशन होती जा रही है, पद हासिल करना या पैसे कमा लेना ही सफलता है! मुझे सफलता की उस परिभाषा से परहेज है। मुझे लगता है कि सफलता को फिर से परिभाषित करना होगा।

सफलता के मायने ये भी हैं कि आप अपने परिवार का ख्याल कैसे रखते हैं? आप अपने कमिटमेंट्स को कैसे निभाते हैं? आप सच्चे दोस्त, अच्छे बेटे, पिता व भाई हैं कि नहीं। दुर्भाग्य से आज के आर्थिक हो चले युग में सफलता को येन-केन-प्रकारेण पद, प्रतिष्ठा और धनार्जन तक सीमित कर दिया गया है।

इसे सफलता का मापदंड मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। वह इसलिए कि जब इंसान इन चीजों के चक्कर में पड़ता है तो आगे चलकर उसे महसूस होता है कि उसने कितनी अहम चीजों को अपनी अंधी महत्‍वाकांक्षा की आग में स्वाहा कर दिया।

शायद उन चीजों का त्याग उन्हें नहीं करना चाहिए था। तो अपने जीवन में सबसे पहले तो सफलता की परिभाषा बदलें। आप जिंदगी में कैसे इंसान हैं, वह जरूरी है। आप कितने अच्छे इंसान हैं? आज विश्व को जरूरत अच्छे इंसानों की है। जुझारूओं से ज्यादा अच्छे इंसान की दरकार है। उसकी सफलता में एक स्वास होती है, गंध होती है। उस खुशबू की दुनिया को काफी दरकार है। 

ग्लैमर जगत, डिमांड से ज्यादा सप्लाई 

Happy birthday Prasoon Joshi: exclusive interview and interesting facts about prasoon joshi

इस जगत में प्रसिद्ध‌ि मिलती है। फोटो छपती हैं। लोगों की चाहत बढ़ती है कि उनका भी नाम छपे। इससे लोगों की तादाद बढ़ती है। जबकि उतनी जॉब्स और संभावनाएं नहीं हैं, जितनी इच्छाएं हैं लोगों के अंदर। तो डिमांड और सप्लाई का पुराना समीकरण ही रहने वाला है।

खासकर भारत जैसे मुल्क में, जहां की पॉपुलेशन इतनी ज्यादा है। सपने इतने पल्लवित हैं तो  सब की आशाएं पूरी हो जाएं, वह जरूरी नहीं है। तभी मैं कहता हूं कि आप अपने ध्येय की परिभाषा तय करने में जरा ध्यान रखें।

अगर आपने अपने लिए सफलता का मानक यह बना लिया है कि मुझे फिल्मफेयर जीतना है तो आप आसानी से डिप्रेस हो जाएंगे। इसकी जगह आप का ध्येय चार लोगों को खुश करना है तो बिना फिल्मफेयर व बड़ा अवार्ड जीते ही सफल हो जाएंगे। जरूर सपने देखें।

जरूर उनके लिए काम करते रहें, लेकिन यह न सोचें कि इन चीजों के ना मिलने पर जीवन में कुछ नहीं बचेगा। वह इसलिए कि हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ यूनिक है। सवाल इस बात का है कि लोग जिद पर आ जाते हैं। कई लोग मुझे मिलते हैं यहां पर।

बंबई में बहुत से लोग आए थे, वे सफल नहीं हुए। मैंने जब उन्हें जाना तो पता लगा कि इसमें प्रतिभा नहीं है, फिर भी उसे एक्टर ही बनना है। वह व्यक्ति फिर भी जिद पर अड़ा हुआ है। कई बार यह मानना बहुत जरूरी है कि मुझ में शायद दूसरी प्रतिभाएं हैं। मसलन मैं अध्यापन अच्छा कर सकता हूं। सवाल सिर्फ ग्लैमर से जुड़े प्रफेशन में सक्सेस पाने का नहीं है। 

सितारों से मिल भर इंप्रेस नहीं होता
मैं आप के सुनने वालों को यही कहना चाहता हूं कि मैं कतई इंप्रेस नहीं होता बड़े सितारों से मिलकर। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं गीतकार बनूंगा, विज्ञापनों के लिए लिखूंगा या कहानियां लिखूंगा। ठीक है मेरा प्रारब्‍ध है।

चीजें मेरे सामने आती गईं। मैं उसे ऊपर वाले का आदर्श मानकर करता गया। लेकिन मैं ढेर सारे खूबसूरत लोगों को जानता हूं, जो इस हसीन दुनिया से जुड़े हुए नहीं हैं। कई प्रोफेसर हैं, कुछ ऑटो ड्राइवर हैं।  चंद गवर्नमेंट ऑफिसर हैं।

मैं उनसे जुड़ना पसंद करूंगा। उनके संग नहीं, जो चमक-दमक के करियर से जुड़े हुए हैं, मगर उनके निजी जीवन में सब कुछ अग्ली यानी बदसूरत है। अगेन मैं यह कहना चाहता हूं कि मुंबई तो सपनों की नगरी है।

अगर मुझ में है आग तो हम कुछ करके ही मानेंगे। यह सब बातें भुलावे की चीज हैं। आप को खुद पर यकीन होना चाहिए। मैंने ही लिखा था, 'अभी अभी हुआ यक़ीन की आग है मुझ में कही हुई सुबह मैं जल गया सूरज को मैं निगल गया रू-ब-रू रोशनी'।

लेकिन मैं इसे एंड करता हूं रौशनी से। आग से ज्यादा रौशनी महत्वपूर्ण है। रौशनी जो है, वह खूबसूरत चीज है। आग जरूरी है, पर वह आग आप को न जला दे। महत्वाकांक्षा की आग में खुद न जलें। कहीं न कहीं यह मानकर चलें कि थोड़ा आप का हाथ है। थोड़ा ऊपर वाले का भी हाथ है। जीवन का मतलब सिर्फ सफलता नहीं है और सफलता के मायने भी जरा तब्दील और वृहद करने की जरूरत है। 

आईना दिखाने वाले लोग हों जिंदगी में  

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जरूरी नहीं कि उसमें आग हो। उसके अंदर बर्फ भी हो सकती है। उसके अंदर बरसात भी हो सकती है। यह उसे  पता होता है। जब भी वह आंखें बंद कर चिंतन करता होगा। मुश्किल यह समझना है कि उसके अंदर वो है कि नहीं, जो वह समझता है।

मिसाल के तौर पर जब सुरेश नाम का कोई आदमी गायक है। उसके घरवाले, दोस्त-यार उसकी तारीफ कर देते हैं। उसे चने की झाड़ पर चढ़ा देता है। फिर एक दिन वह बंबई आ जाता है, जहां रोज हजारों प्रतिभाशाली लोग आते हैं।

यह मानकर कि उनमें कुछ न कुछ है। वहां सुरेश को असलियत का भान होता है। वह निराश होने लगता है। फिर वह घर फोन करता है। घर वाले उसे जवाब देते हैं, अरे वहां तो सिफारिश चलती है। यह मुझे अजीब लगता है।

सिफारिश भी होती होगी, लेकिन अंततः सिफारिश से कुछ नहीं होता। मैं तो यहां मुंबई में किसी को नहीं जानता था। उत्तराखंड के छोटे से इलाके से आया था। यहां आ गीतें लिखीं। विज्ञापन फिल्में कीं। जीवन में कोई आईना दिखाने वाला भी तो हो।

मैं यह नहीं कहता कि लोगों में प्रतिभा नहीं होती। कई बार उसका सही मूल्यांकन नहीं होता। जब अच्छे लोग आप की सराहना करें, तब आप को‌शिश करते रहें। एक न एक दिन आप को आप का अभीष्ट मिलेगा। सही लोगों से अपना मूल्यांकन करवाएं।  

वरना आप की जिंदगी के 15-20 साल निकल जाएंगे। आप को कोई नहीं कहने वाला होगा कि राजा नंगा है। मुझे वैसे लोगों से प्रॉब्लम है। मुझे अगर किसी का संगीत पसंद नहीं आता है तो मैं उनसे कटू सत्य कहना ज्यादा बेहतर समझता हूं।

मैंने उन्हें वापस घर भेज दिया। मुझे लगा कि वे लोग अपना मूल्यांकन सही नहीं कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें मैंने यहां रोका। उनसे कहा कि आप लगे रहें। जो लोग जिद पर अड़े रहे, उनकी हालत देख मुझे निराशा होती है। वे कटु होते जा रहे हैं। खुद के लिए और समाज के लिए भी। मेरा मानना है कि अपना सही मूल्यांकन करवाना। सही लोगों को अपनी प्रतियां व रचनाएं दिखाना। उसके बाद आप को लगता है कि आप में कुछ है तो अपार धीरज के साथ लगे रहिए। यह शहर बहुत जल्दी तोड़ देता है। 

विकेंद्रीकरण हो इंडस्ट्री का 
इसकी वजह शायद यह भी मानी जाती है कि फिल्म जगत में हिंदी पट्टी के लोग हैं, मगर यह इंडस्ट्री डीसेंट्रिलाइज नहीं हो रही। क्या  अच्छा होता कि उत्तराखंड, लखनऊ जैसे सेंटर्स में भी फिल्म निर्माण की गतिविधियां होती तो भीड़ को मुंबई में बुनियादी समस्याओं से निपटने की जरूरत नहीं पड़ती।

मुझे लगता है कि ऐसा होना चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि यह लॉजिस्टिकली करेक्टर लगता है। अलग-अलग सेंटर ऑफ एक्सेलेंस हों फिल्म के लिए। कई बार मुझे लगता है कि फिल्मों को बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती है।

इतनी अहमियत कहीं नहीं दी जाती। मीडिया इतना स्‍थान दे देती है कि फिल्म जीवन है। जीवन ही फिल्म है। मनोरंजन जीवन का हिस्सा हैं। फिल्में उस जीवन के एक हिस्से का कतरा भर है। मनोरंजन का मतलब, प्ले, थिएटर भी है। मगर ऑडियो विजुअल का माध्यम मनोरंजन की बाकी विधाओं पर हावी हो चुका है। आज जरूरत इस बात की है कि बाकी विधाओं को भी अहमियत दी जाए। फिल्मों को उतनी ही तरजीह दी जाए, जितनी जरूरत है। और फिल्में मुंबई में ही केंद्रित क्यों रहे? 

शब्दों की महफिल नहीं जमाता 

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हिंदी फिल्मों में हिंदी गीतों की परंपरा रही है। उसकी शुरूआत शैलेंद्र साहब से मानी जाती है। गोपालदास नीरज और संतोष आनंद ने उसे आगे बढ़ाया। उस कड़ी में मेरा भी नाम आता है। मैं शब्दों के संयोजन के लिए नहीं लिखता।

शब्दों की भीड़ जमा करने को नहीं लिखता। शब्दों का समारोह या उसकी महफिल जमाने को नहीं लिखता। शब्दों की ऊंगली पकड़ता हूं और अपनी बात शब्दों के माध्यम से कहने की कोशिश करता हूं। उ स समय जो शब्द उचित और श्रेयस्कर लगता है, मैं उसी का इस्तेमाल करता हूं।  

तारे जमीं पर का गीत मैंने लिखा, 'धूप है झम से बिखर"। कई लोग छम से यूज करते हैं। पर वह झम होता है। झम पहाड़ी भाषा का शब्द है। पहाडों में बोला जाता है। हिंदी भाषा में नहीं बोली जाती। सब आंचलिक भाषाएं हिंदी की ही सखी-सहेलियां हैं।

मैंने मसककली इस्तेमाल किया। मसककली शब्द ही नहीं है। दरअसल गीत के संस्कार होते हैं, जो परिलक्षित होते हैं। मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं, जो बचपन में छायावाद के कवियों को पढ़ा। पंत जी के परिवार से मेरा संबंध होना। और आगे चलकर हिंदी कविता की ओर रुझान। वह सब स्वतः ही आप के काम में झलकने लगता है। लेकिन यह मानना कि और भाषाओं का इस्तेमाल नहीं करना, वह गलत है। 

हिंदी पर पंजाबी ही वाही
हिंदी के ही कई रूप हैं, मगर वह मुंबई में आकर मोनोपोलाइज हो जाता है। ऐसा क्यों है कि एक लड़की को पंजाबी में क्या कहते हैं, वह आम हिंदुस्तानियों को पता है, मगर उड़िया में क्या कहा जाए, वह नहीं मालूम।

वजह यह थी कि पंजाबी लोग फिल्मों के  बिजनेस में शुरू से थे, लिहाजा उन्होंने अपनी चीजों का प्रचार-प्रसार किया,  लेकिन बाकी भाषाएं और संस्कृतियां पिछड़ गईं। जगह-जगह फिल्मों का निर्माण हो।

यह जरूरी है। सब बस बॉलीवुड के दायरे में रहकर ही दम न तोड़ दें। किसान क्या वही होता है, जो फिल्मों में दिखाया जाता है? नहीं। यहां ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने रियल किसान देखा ही नहीं है। सोचिए इस देश में कितनी बड़ी दूरी है? क्या हम न्याय कर पा रहे हैं उस दूरी को पाटने में? नहीं। तरह-तरह के सब्जेक्ट्स आने चाहिए। ये मुट्ठी भर लोगों के सब्जेक्ट्स डौमिनेट कर जाते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। बहुत अच्छा सवाल था कि इंडस्ट्री को डीसेंट्रिलाइज होना चाहिए। 

गमले में खिलने वाला पौधा नहीं
लोगों को मेरे गीत व विज्ञापन की पंक्तियों में जमीन से जुड़ाव महसूस होता है। वे पंक्तियां ऊंची इमारतों में एसी में कैद रहकर भी जहन में आती है। मेरा मानना है कि आप कहीं भी लिखें, फर्क नहीं पड़ता है।

मैं गमले में उगने वाला पौधा नहीं हूं, जिसे किसी भी बालकनी में उगा दें। मैं तो आंगन में उगने वाला वृक्ष हूं। ऊपर मेरी शाखाएं हवा में लहरा रही हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं जड़ो से नहीं जुड़ा हूं। मेरा बचपन पहाड़ो में बीता है। तो कहीं न कहीं मेरा बीजारोपण ऐसी धरती पर हुआ है, जिसकी सुवास मेरे भीतर सदा रहती है। चाहे मेरी शाखें कहीं भी हों, वह मुझसे जुड़ी रहती है। 

उत्तराखंड का सपना अधूरा  

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उत्तराखंड के आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में अमर उजाला का अहम योगदान रहा है।  उत्तराखंड के उत्तरांचल बनने तक या बनने से लोगों का सपना पूरा हो पा रहा है या राजनीतिक गलियारों में उसका मूल मकसद गुम सा हो तो गया है।

सिर्फ राज्य बनने से वह सपना पूरा नहीं होने वाला। वह तब पूरा होगा, जब वहां के लोगों की अपेक्षाएं पूरी हों। उनके लिए रोजगार की संभावनाएं बढें। उनका जीवन जब तक बेहतर नहीं होगा, तब तक सभी चीजें बेमानी हैं।

जन्मदिन तो फोबिया सा हो चुका है
ज्यादातर अपने परिवार के साथ जन्मदिन मनाता रहा हूं। जरूरी है कि बड़ो का आशीर्वाद लिया जाए। जो दोस्त परिवार का हिस्सा बन चुके हैं, उनके साथ वक्त बिताता हूं। कई बार ऐसा हुआ है कि दोस्तों ने पार्टियां रखीं। एक रोचक वाकया है।

मैं ऐड फिल्म के लिए सिंगापुर में गया हुआ था। वहां किसी को मालूम नहीं था कि उस दिन मेरा जन्मदिन है। वहां मैं किसी को जानता भी नहीं था तो मैं खुद भी भूल चुका था कि उस दिन मेरा जन्मदिन था।

मैं ऑफिस के नीचे किताब पढ़ता चाय पी रहा था। ऊपर विज्ञापन फिल्म की एडीटिंग का काम हो रहा था। अचानक मुंबई में मेरे एक मित्र ने एडीटिंग करने वालों को सूचित किया कि मेरा जन्मदिन है। वे लोग बड़े खुश हुए।

उनमें से एक व्यक्ति सपरिवार आए और उन्होंने मुझे फिर सरप्राइज पार्टी दी। बाकी जन्मदिन मेरे लिए बहुत बड़ा जलसा नहीं रहा है। जिंदगी का एक और दिन जैसा भर है वह। बचपन में मां उस मौके पर कुछ मीठा मंगवा लेती थी। हो जाता था सेलिब्रेशन। आज तो यह फोबिया सा हो गया है। लोग डरे रहते हैं कि क्या होगा? 

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