कॉमेडी का ट्रैक पकड़ खूब दौड़े गोविंदा
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90 दशक के शुरुआती सालों में फिल्म इंडस्ट्री बिना किसी स्टार के चल रही थी। 80 के दशक के हीरो बुढ़ा रहे थे और इस दौर में आए नए नायकों के बूते फिल्में नहीं चल रहीं थीं। गोविंदा ने इस सूनेपन को तब तोड़ा जब वह कॉमेडी, डांस और रोमांस के ट्रैक पर आए। गोविंदा को निर्देशक के रूप में डेविड धवन जैसा सच्चा संगी मिला। फिर यहां से शुरु हुई परफेक्ट टाइमिंग वाली कॉमेडी का सिलसिला। गोविंदा को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे अच्छे डांसरों में भी शुमार किया जाता है। गोविंदा के डांस का मजा लेना हो तो टीवी पर उनके गाने बिना आवाज के देखिए। उनके डांस में एक तरह की अजीब फुर्ती दिखती है जो हास्य पैदा करती है।
एक जैसे फॉर्मूलों और ट्रीटमेंट के साथ बन रहीं ढेर सारी फिल्मों के बीच गोविंदा और डेविड धवन की यह जुगलबंदी धीरे-धीरे इंडस्ट्री को रास आने लगी। जिस तरह से खिलाड़ी सीरिज के साथ अक्षय कुमार जुड़े थे कुछ वैसी ही सीरिज गोविंदा ने नंबर 1 के साथ शुरू की। 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'आंटी नंबर 1', 'अनाड़ी नंबर 1', 'जोड़ी नंबर 1' फिल्मों ने कॉमेडी और गोविंदा दोनों को ही पहचान दी। इसी दौरान 'साजन चले ससुराल', 'बनारसी बाबू', 'दूल्हे राजा', 'महाराजा', 'बड़े मियां छोटे मियां', 'हसीना मान जाएगी', 'जोरु का गुलाम', 'हद कर दी आपने' जैसी फिल्में गोविंदा और इंडस्ट्री के लिए याद रखने वाली फिल्में बनीं।
गोविंदा की सभी फिल्मों में हास्य लगभग एक जैसा होता था। फिल्म का कैनवास भी रिपीट सा लगता। कादर खान या तो उनके पिता बनते या ससुर। यह दोहराव 2000 के बाद की फिल्मों में दर्शकों को अखरने लगा। 2000 के बाद जब इंडस्ट्री विषय को लेकर तेजी से बदल रही थी उसके बाद आई गोविंदा की यह पारंपरिक फिल्में फ्लाप हुईं। गोविंदा मुख्य धारा की सिनेमा से कुछ समय के लिए गायब भी हुए।
गोविंदा की दूसरी पारी 2006 से शुरू हुई। इस साल उनकी दो फिल्में 'भागम भाग' और 'सलाम ए ईश्क' हिट हुईं। थुलथुल हो चुके गोविंदा की ऐक्टिंग दर्शकों को रास आई। गोविंदा अगले साल 'पार्टनर' फिल्म में दिखे। इसके बाद गोविंदा कभी सोलो हीरो तो कभी मल्टी स्टारर फिल्मों में नजर आने लगे। आज से 48 साल के हुए गोविंदा इंडस्ट्री में राज कर रही खान तिकड़ी के हम उम्र ही है। बावजूद इसके वह इंडस्ट्री से आउट हुए। इसके पीछे फिल्म के जानकार उनका बढ़ता हुआ वजन मानते हैं।
गोविंदा ने एक राजनीति पारी भी खेली। यह पारी बिल्कुल जल्दबाजी में हुई। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 2004 में मुंबई के एक क्षेत्र से टिकट दिया। गोविंदा ने भाजपा के एक बड़े नेता राम नाईक को बड़े अंतर से हराकर जीत दर्ज की। जीतने के बाद गोविंदा की तनिक भी रुचि राजनीति में नहीं रही। धीरे-धीरे करके उन्होंने राजनीति से किनारा कर लिया।