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दिल की डायरी: यूं मकरंद देशपांडे के नाटक की नायिका आयशा रजा बनीं कुमुद मिश्रा की असल कहानी की हीरोइन

Wed, 28 Oct 2020 10:45 AM IST
प्रतीक्षा राणावत रोहिताश सिंह परमार, मुंबई
रोहिताश सिंह परमार, मुंबई Published by: प्रतीक्षा राणावत Updated Wed, 28 Oct 2020 10:45 AM IST
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Dil Ki Diary Know How Bollywood Actor Kumud Mishra Met His Wife and Theater Artist Ayesha Raza
कुमुद मिश्र - फोटो : Instagram: @kumud_mishra

अमर उजाला डिजिटल के पाठकों के लिए हम एक नई सीरीज 'दिल की डायरी' शुरू कर रहे हैं। इस सीरीज में सिनेमा, टीवी और ओटीटी के चर्चित कलाकार अपने प्रशंसकों के साथ अपनी वे यादें साझा करेंगे, जिनके बारे में उनके चाहने वाले हमेशा जानना चाहते रहे हैं। चूंकि मामला दिल की डायरी का है, सो ये सारी बातें ये कलाकार खुद अपने शब्दों में ही बताएंगे। इस कड़ी में आज चर्चित अभिनेता कुमुद मिश्र पेश कर रहे हैं, ये 'दिल की डायरी'।

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'अभिनय की ओर मैं अपने पिताजी की वजह से आकर्षित हुआ। दरअसल, मेरे पिताजी रामलीला किया करते थे। बाद में जब वह फौज में भर्ती हुए और हवलदार बने। तब भी वह नाटकों में भाग लिया करते थे। तो, मैंने वहां से बहुत कुछ सीखा है। मेरे पिताजी भले ही एक फौजी थे लेकिन उनकी रंगमंच में बहुत दिलचस्पी थी। फौज से निकलने के बाद फिर वह अध्यापक बन गए। उनके अलावा मेरे परिवार में ऐसा कोई नहीं रहा जो अभिनय की दुनिया में कूदा हो। मैं ही हूं जो अकेले इस शहर (मुंबई) में आया। मेरे अभिनय करियर को शुरू करने में राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वहां से ही मुझे अभिनय में हाथ आजमाने का मौका मिला था।'

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Dil Ki Diary Know How Bollywood Actor Kumud Mishra Met His Wife and Theater Artist Ayesha Raza
कुमुद मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'हमारे अध्यापक बहुत अच्छे थे इसलिए हमें माहौल भी कुछ वैसा ही मिल गया था। मेरे पिता ने भी मेरा इसमें बहुत साथ दिया। मिलिट्री स्कूल से जब मैं भोपाल आया था, उस समय यहां एक वर्कशॉप चल रही थी। उसे अलखनंद जी करवा रहे थे। उस वर्कशॉप में हिस्सा लेने के लिए मुझे खुद मेरे पिताजी लेकर गए। यह उस समय के लिए चमत्कार वाली बात थी कि कोई पिता अपने बेटे को अभिनय की ओर भेज रहा है। उनको पता था कि मेरी दिलचस्पी अभिनय में है। वह खुद हवलदार थे और चाहते ही होंगे कि उनका बेटा भी कोई सुरक्षित नौकरी करे! लेकिन, उन्होंने मुझे कभी इस ओर कदम बढ़ाने से रोका नहीं, बल्कि सहारा दिया। इसका पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है।'

'इसके बाद मैंने अपने पिताजी को बिना बताए एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) के लिए आवेदन दे दिया। मैं उस समय भोपाल में ही थिएटर कर रहा था। मेरे साथ आलोक चटर्जी, गुरु वर्धन जैसे लोग थे। उस दौरान ही मुझे ड्रामा स्कूल के बारे में पता चला। मैंने उसका फॉर्म भरा और बाद में पिताजी को बताया। उन्होंने कहा कि ठीक है। कोशिश करो। दरअसल, उस स्कूल में दाखिला मिलना बहुत मुश्किल है। कई परीक्षाओं से होकर गुजरना होता है। हजारों लोग फॉर्म भरते हैं, उसमें से सिर्फ 75 या 80 लोगों को ही चुना जाता है। उनकी चार दिन की वर्कशॉप होती है। यहां तक पहुंचना भी बहुत बड़ी बात है। फिर उसमें से 20 लोगों का चुनाव होता है। जरूरी नहीं है कि जितने लोगों के चुनाव हुए हैं, वह सब हुनरमंद ही हों। कई लोग अपने काम में बहुत अच्छे होते हैं, फिर भी उनका नहीं हो पाता। मैंने वर्ष 1991 में दाखिला लिया था और 1994 में पास हो गया था।'

'रंगमंच से मेरा गहरा संबंध रहा है। उस वक्त मैं सिनेमा से भाग रहा था और अपनी जीविका के लिए टीवी पर काम कर रहा था। टीवी मुझे अच्छा खासा पैसा भी दे रहा था। इसके लिए मैं हमेशा टीवी का ऋणी रहूंगा। सिनेमा को लेकर मेरे अंदर कोई ज्यादा उत्साह था नहीं। आप उसे डर का भी नाम दे सकते हैं। मैंने कभी उस तरफ जाने के बारे में सोचा नहीं क्योंकि मैं थिएटर से ही संतुष्ट था। फिल्मों में मेरी रुचि थी नहीं इसलिए 1996 में फिल्म 'सरदारी बेगम' में काम करने के बाद मैं वापस थिएटर करने चला गया। बाद में मैंने सिनेमा को भी टटोलना शुरू किया तो जाना कि इसका जादू क्या है। तब मैंने 2007 में आई फिल्म '1971' से फिल्मों में वापसी की। अब भी मैं इस जादू को जानने की कोशिश में लगा हुआ हूं और बीते सालों की भरपाई करने की कोशिश भी कर रहा हूं।'

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कुमुद मिश्रा, आयशा रजा - फोटो : File Photo

'एक नाटक के दौरान ही मुझे मेरी जीवनसाथी भी मिली हैं। आयशा रजा से मेरी पहली मुलाकात एक नाटक के दौरान ही हुई थी। वह मंच पर एक नाटक 'हजारों में एक' में काम कर रही थीं। उनके साथ मकरंद देशपांडे भी थे। उस नाटक में उन्होंने बेहतरीन काम किया था। नाटक देखने के बाद मैं उनसे मिलने और बधाई देने गया। वहां हमारी पहली मुलाकात हुई थी। फिर उसके कुछ सालों बाद 2008 में हमने शादी कर ली।'

'अपने काम के लिए मैं हमेशा ऑडिशन देने से बचता हूं। अगर ऑडिशन के बूते मैं काम पाने की चाह रखता तो शायद मुझे कभी काम नहीं मिलता। अब भी मैं बेरोजगार ही बैठा होता। मुझे काम हमेशा धोखे से मिला है। लोगों को यह गलतफहमी हो गई थी कि मैं अच्छा काम कर लेता हूं। उसी धोखे की वजह से मुझे कई लोगों ने काम दे दिया है। और मेरा काम चल पड़ा। जब मैं काम करता हूं तो ठीक ठाक कर लेता हूं। कोई भी ऑडिशन लेने वाला नहीं चाहता कि जिसका वह ऑडिशन ले रहा है, वह विफल हो। लेकिन, जब मैं ऑडिशन देता था तो मैं चेहरा देखकर समझ जाता था अगला आदमी मेरे बारे में क्या सोच रहा है। वह सोचता था कि ये आदमी इतना खराब कैसे हो सकता है और इस शहर में क्या कर रहा है?'

'कई बार तो ऐसा हुआ है कि दूसरे को ऑडिशन देते हुए देखकर मैं वहां से भाग गया हूं। मैं सोच रहा था कि मैं तो ऐसा कर ही नहीं पाऊंगा। हालांकि, वह कोई चमत्कार नहीं कर रहा था। लेकिन, मुझे वह मुश्किल लगा। अब भी मैं ऑडिशन देने से बचता हूं। फिर भी कोशिश कर रहा हूं कि मैं कोई ऑडिशन पूरा कर पाऊं। देखिए, ऑडिशन देना तो हमारे पेशे की जरूरत है। अगर किसी किरदार के लिए किसी निर्देशक को मेरा ऑडिशन चाहिए होगा तो मैं जरूर दूंगा। हालांकि, मुझे यह मानकर ही चलना होगा कि मुझे यह किरदार मिलने वाला नहीं है। अगर कहीं धोखा या कोई चमत्कार हो जाए तो शायद मैं सफल हो जाऊं। हालांकि, उस चमत्कार का इंतजार मैं आजतक कर रहा हूं।'

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