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जानिए, नई 'जंजीर' अच्छी है या पुरानी
हरि मृदुल/मुंबई ब्यूरो
Updated Sat, 07 Sep 2013 02:59 PM IST
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अपूर्व लाखिया ने जब 'जंजीर' फिल्म का रीमेक बनाना शुरू किया था तभी से इस बात की चर्चाएं होनी शुरू हो गई थीं कि यह फिल्म पुरानी जैसी होगी या नहीं।
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अब यह फिल्म रिलीज हो गई है। रिलीज होने के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि नई जंजीर बेहतर फिल्म है या पुरानी। हम आपको एक-एक पात्र की समानता बता रहे हैं।
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अपूर्व लाखिया निर्देशित फिल्म जंजीर की रिलीज से पहले एक इंटरव्यू में प्रियंका चोपड़ा से जब पूछा गया कि उनकी इस रीमेक जंजीर की तुलना बिग बी वाली ओरिजनल जंजीर से होगी, वे कितनी तैयार हैं? पीसी ने फौरन जवाब दिया था कि वे इस तुलना के लिए जरा भी तैयार नहीं है।
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अब जब फिल्म रिलीज हो चुकी है, तो महसूस हो रहा है कि प्रियंका ने सच ही कहा था। कहां सोने की जंजीर और कहां सोने की पॉलिस वाली पीतल की जंजीर। चालीस साल पहले रिलीज हुई फिल्म जंजीर की जिन खूबियों से प्रभावित होकर अपूर्व लाखिया ने इसके रीमेक की चुनौती स्वीकार की थी, नई फिल्म में वे कहीं नजर नहीं आईं।
हां, अपूर्व ने इतनी समझदारी जरूर दिखाई कि वक्त के हिसाब से कहानी में थोड़ा बदलाव कर दिया। उन्होंने अपनी जंजीर में ऑयल माफिया के काले कारनामों का चित्रण किया, जब कि ओरिजनल जंजीर में नकली शराब और ड्रग्स के गैरकानूनी धंधे को फिल्माया गया है।
रीमेक 'जंजीर' और ओरिजनल 'जंजीर' के बीच तुलना के लिहाज से बीसियों बिंदु ऐसे हैं, जिन पर गौर किया जा सकता है। स्क्रीन प्ले, डायलॉग, कलाकारों के अभिनय और फिल्म की मेकिंग पर लोगों की तुलनात्मक नजर जानी ही जानी है। फिल्म के टाइटल से बात शुरू करते हैं।
प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी पुरानी फिल्म का टाइटल प्रतीकात्मक था। विलेन तेजा की 'जंजीर' और उसमें ताबीज की तरह गुंथी घोड़े की आकृति फिल्म की कहानी रहस्यमय बनाती है।
रीमेक फिल्म में विलेन के पास ऐसी कोई जंजीर नहीं है, जिसमें घोड़े की आकृति गुंथी हो। नई फिल्म में इस जंजीर की जगह तेजा के हाथ में बने घोड़े के टैटू ने ले ली है। पुरानी जंजीर एक्शन ड्रामा नहीं थी, बल्कि एक संवेदनशील कहानी को विश्वसनीय तरीके से फिल्माया गया था।
कहीं से अमिताभ जैसे नहीं लेगा तेजा
फिल्म में ऐसे दृश्य गिने चुने हैं, जब अमिताभ एक्शन करते दिखते हैं। इसके उलट रीमेक जंजीर के पहले सीन से पता चल जाता है कि एसीपी विजय मारधाड़ में माहिर है। दोनों फिल्मों में हीरो का नाम विजय जरूर है, लेकिन काम में काफी फर्क है।
हीरो ही क्यों, माला, मोना और तेजा जैसे दूसरे किरदारों के नाम भी ओरिजनल फिल्म से ही उठाए गए हैं, लेकिन इन भूमिकाओं में रात और दिन का अंतर है। ओरिजनल फिल्म में कलाकारों के अभिनय की बात करें, तो नई फिल्म इस मामले में फीकी नजर आती है। कहां अमिताभ बच्चन का रियलिस्टिक एप्रोच वाला अभिनय और कहां राम चरण तेजा का कृतिम किरदार।
इस माला और उस माला में बहुत फर्क
यही बात जया बच्चन (भादुड़ी) और प्रियंका चोपड़ा की भूमिकाओं के लिए कही जा सकती है। जितना अंतर विजय की भूमिका निभाते हुए बिग बी और राम चरण तेजा में दिखता है, उतना ही माला का किरदार अभिनीत करते हुए जया और प्रियंका में फर्क महसूस होता है। यही बात तेजा की भूमिका में अजीत और प्रकाश राज के लिए कही जा सकती है। संजय दत्त और प्राण साहब के काम की भी क्या तुलना?
हालांकि अपूर्व लाखिया ने फिल्म को मॉडर्न लुक देने के लिए बहुत से बदलाव किए हैं, लेकिन दिक्कत की बात यह है कि वे वर्क नहीं कर पाए हैं। वे प्रियंका को चाकू और छुरी वाली स्ट्रीट गर्ल नहीं बना सकते थे, इसलिए उन्होंने माला के किरदार को एनआरआई दिखा दिया। चूंकि माला अमेरिका से मुंबई आई है, इसलिए विजय के साथ वह खुलकर रोमांस कर सकती है।
राम चरण तेजा को विजय के किरदार में तेज तर्रार दिखाना वक्त की जरूरत थी। वे चालीस साल पहले के शर्मीले किस्म के विजय का चित्रण नहीं कर सकते थे। बदले वक्त के हिसाब से ही एसीपी विजय और माला की लव कैमिस्ट्री भी दिखानी थी।
प्राण से बहुत दूर खड़े हैं संजय दत्त
इसी तरह शेर खान की भूमिका भी बदली हुई दिखी है। ओरिजनल फिल्म में प्राण साहब का निभाया पठान शेर खान पुरानी गाडिय़ों का धंधा नहीं करता है, जब कि संजय दत्त को यही करते दिखाया गया है।ओरिजनल फिल्म में जर्नलिस्ट का कोई किरदार नहीं था, लेकिन अपूर्व ने अपनी फिल्म में यह नया ट्रैक डाला है। काले कारनामों का भंडाफोड़ करनेवाले एक संपादक का रोल अतुल कुलकर्णी ने बख्रूबी निभाया है। माना जा रहा है कि यह क्राइम रिपोर्टर जे डे मर्डर से प्रेरित है, जिसका दो साल पहले अंडरवल्र्ड के लोगों ने मर्डर करवा दिया था।
असल बात ओरिजनल और रीमेक में अंतर की नहीं है। बात यह है कि आपने बहुचर्चित फिल्म का रीमेक कितनी संजीदगी से किया है। अब जब रीमेक की गई जंजीर प्रदर्शित हो चुकी है, तो साफ समझ में आता है कि अपूर्व लाखिया ने सतही तरीके से अपने काम को अंजाम दिया। उन्हें रीमेक के खतरों का कोई आभास नहीं था। शायद रीमेक की सोच रहे दूसरे फिल्मकार अपूर्व से सबक ले लें।