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Children's Day 2025: बॉलीवुड में बचपन गायब...कहां खो गईं बच्चों की फिल्में? एक्सपर्ट्स ने बयां की सच्चाई

Fri, 14 Nov 2025 07:00 AM IST
Kiran Jain किरण जैन
Updated Fri, 14 Nov 2025 07:00 AM IST
सार

Children's Day Special: बाल दिवस, वह दिन है जब हम बच्चों की मासूम दुनिया, उनके सपनों और हंसी का जश्न मनाते हैं। लेकिन इसी दिन एक बड़ा सवाल फिर उठाता है- हिंदी सिनेमा से बच्चों की फिल्में अचानक कहां गायब हो गईं? इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए अमर उजाला ने एक्सपर्ट्स से बात की...

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Childrens Day 2025: why Child actors and Kids Movies disappearing in Bollywood Know Experts view
'तारे जमीन पर'-'आई एम कलाम' - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक दौर था, जब बॉलीवुड में ‘मकड़ी’, ‘ब्लू अम्ब्रेला’, ‘तारे जमीन पर’ ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘आई एम कलाम’ जैसी फिल्में बना करती थीं। ये सिर्फ फिल्में नहीं थीं, बच्चों की मासूमियत, भावनाओं और उनकी छोटी-सी दुनिया का सच्चा प्रतिबिंब थीं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस तरह की फिल्मों का बनना और बड़े स्तर पर रिलीज होना लगभग थम सा गया है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों पर बनीं फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 50 करोड़ तक भी नहीं पहुंच पाता, जबकि हॉलीवुड में बनी इस तरह की फिल्में सौ करोड़ तक कमा लेती हैं। यही अंतर धीरे-धीरे इस जॉनर को हाशिये पर धकेलता गया और बच्चों की फिल्में लगभग गायब हो गईं। आखिर ऐसा क्यों हुआ? जानते है एक्सपर्ट्स से...

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स्टूडियो कल्चर आए और जगह कम होती गई: विवेक शर्मा
अमर उजाला से बातचीत में फिल्म 'भूतनाथ' के निर्देशक विवेक शर्मा ने कहा, ‘जब से स्टूडियो कल्चर आया है, बच्चों की फिल्मों के लिए जगह कम होती चली गई। कंटेंट को एक किनारे कर दिया गया। बच्चों पर फिल्म बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। मैंने कई स्टूडियोज को बच्चों की फिल्में और एनिमेशन सीरीज बनाने का सुझाव दिया पर उन्होंने एक झटके में इसे सिरे से नकार दिया। उन्हें लगता है कि बच्चों की फिल्म क्या ही कमाई कर पाएंगी?'

20 करोड़ सुपरस्टार को दे देंगे पर…
विवेक आगे कहते हैं, 'हमारे सिनेमा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारा दर्शक कंटेंट नहीं, स्टार देखता है। 20 करोड़ रुपये स्टार को दे देंगे लेकिन अच्छे बच्चों की कहानी लिखने वालों को दो लाख भी नहीं मिलते। बच्चों की फिल्मों की कमी ने एक बड़ा मार्किट खाली छोड़ दिया है। जबकि इंटरनेशनल सिनेमा लगातार ऐसी सफल फिल्में बना रहा है जो बच्चों और बड़ों दोनों की भावनाओं को गहराई से छूती हैं। हम उन्हीं को डब करके अपने बच्चों को दिखा रहे हैं पर असल कहानी बनाने से डरते हैं।’ 

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Childrens Day 2025: why Child actors and Kids Movies disappearing in Bollywood Know Experts view
'आई एम कलाम' - फोटो : सोशल मीडिया

बच्चों का सिनेमा आखिरी नंबर पर
विवेक आगे कहते हैं, ‘हर मीटिंग में वही बात होती है कि कौन सा चेहरा है? कंटेंट क्या है, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। बच्चों की कहानी है तो रिजेक्ट कर दिया जाता है। OTT के दौर में कंटेंट ज्यादा एडल्ट, ज्यादा डार्क और ज्यादा शोरगुल वाला होता गया। जैसे-जैसे OTT के कारण ऑडियंस की पसंद बदली, हिंदी सिनेमा अपराध, एक्शन और बड़े बजट की फ्रेंचाइजी पर टिक गया। बच्चे इस बदलाव में बिल्कुल पीछे छूट गए। बच्चों का सिनेमा न जाने कब इंडस्ट्री की प्राथमिकताओं में सबसे आखिरी नंबर पर पहुंच गया।’

दर्शक तैयार, लेकिन इंडस्ट्री को डर है
विवेक आगे बताते हैं, ‘दर्शक इस तरह की फिल्में देखने के लिए तैयार हैं, लेकिन इंडस्ट्री तैयार नहीं। वो इन फिल्मों को बनाने में डरते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि बच्चा कभी अकेले फिल्म देखने नहीं आता, वह अपने पूरे परिवार को साथ लेकर आता है। बच्चों की फिल्म बनेगी तो लगो देखेंगे भी और फिल्में कमाएंगी भी।’

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'मकड़ी' - फोटो : सोशल मीडिया

मेरा दिल बहादुर फिल्मकारों के लिए दुखता है: अमोल गुप्ते
'स्टेनली का डब्बा' और 'तारे जमीन पर' जैसी फिल्मों से जुड़े रहे फिल्मकार अमोल गुप्ते इस गिरावट को बहुत करीब से महसूस करते हैं। वे कहते हैं, ‘मेरा दिल सचमुच उन बहादुर फिल्मकारों के लिए दुखता है जो तमाम मुश्किलो, रुकावटो और कम समर्थन के बावजूद बच्चों की फिल्मो पर टिके हुए है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बच्चों के सिनेमा को सपोर्ट करने की संस्कृति आज बेहद कमजोर पड़ चुकी है, लेकिन रीजनल सिनेमा में यह परंपरा अब भी कही ज्यादा जीवित, मजबूत दिखाई देती है।’

Childrens Day 2025: why Child actors and Kids Movies disappearing in Bollywood Know Experts view
तारे जमीन पर - फोटो : सोशल मीडिया

आमिर खान ने इस कमी की ओर साफ इशारा किया था
इससे पहले भी इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकार बच्चों की फिल्मों पर बात कर चुके हैं। हालिया रिलीज फिल्म 'सितारे जमीन पर' के प्रमोशन के दौरान आमिर खान ने कहा था, ‘भारत में बच्चों से जुड़ा कंटेंट बहुत कम बनता है। हम ज्यादातर बाहर की फिल्मों को खरीदकर यहां डब करके रिलीज कर देते है, जबकि हमें अपनी कहानियां खुद बनानी चाहिए। बच्चों के लिए कहानियां बनाना सिर्फ मनोरंजन है बल्कि जिम्मेदारी है, क्योंकि सही कहानियां उनकी सोच और उनकी ईमानदारी की समझ को आकार देती है।’

तो कहां गईं बच्चों की कहानियां?
तो अंत में फिर वहीं सवाल उठता है कि आखिर कहां गईं बच्चों की कहानियां ? तो इसका जवाब यह है कि आज के दौर में हिंदी सिनेमा इन खूबसूरत कहानियों को वो जगह नहीं दे पा रहा जो कभी बहुत स्वाभाविक लगती थीं। शायद इसी वजह से आज बच्चों की कहानियां भारतीय स्क्रीन पर नहीं है। दुखद यह है कि हम विदेशी फिल्में डबिंग करके पेश भी कर रहे हैं और दर्शक इन्हें देख भी रहे हैं पर फिल्ममेकर इससे यह सीख नहीं ले रहे कि अपनी नई कहानियां दर्शकों तक कैसे पहुंचाएं?

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श्वेता बसु प्रसाद - फोटो : इंस्टाग्राम

पता नहीं इंडस्ट्री में बच्चों का सिनेमा क्यों नहीं बन रहा?: श्वेता बसु प्रसाद
'मकड़ी' फेम अभिनेत्री श्वेता बसु प्रसाद ने भी इस पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा, 'बच्चों की फिल्में कहां गईं? इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है। मैं वास्तव में खुद बच्चों की फिल्मों को बहुत मिस करती हूं। जब हम बड़े हो रहे थे तो बच्चों से संबंधित बहुत सारी फिल्में थीं, पता नहीं अब इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में क्यों प्रोड्यूस नहीं हो रही हैं। हमारे पास तकनीक है। दर्शक हैं। तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, जहां लोग कई प्रयोग कर रहे हैं। लम्बे फॉर्मेट में चीजें देखी जा सकती हैं। काफी कुछ हो सकता है बच्चों से संबंधित सिनेमा में। उनके लिए कहानियां हो सकती हैं। हमारे वक्त में 'हैरी पॉटर', 'तेनाली रामा', 'मकड़ी', 'होम अलोन' जैसा काफी कुछ था। मैं उन्हें मिस करती हूं। मुझे उम्मीद है कि फिर से बच्चों के सिनेमा पर भी कुछ दिलचस्प हो'।

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