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कौन है दादा साहेब फाल्के, जानिए

Thu, 02 May 2013 07:27 AM IST
आईएएनएस
आईएएनएस Updated Thu, 02 May 2013 07:27 AM IST
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Birth anniversary celebration of Dadasaheb Phalke

भारतीय सिनेमा के 'पितामह' का खिताब पाने वाले दादा साहेब फाल्के उर्फ धुंदीराज फाल्के ने अपना सिनेमाई सपना तब बुना जब देश में इस कला की कोई स्पष्ट विधा आकार भी नहीं ले पाई थी।

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जब सिनेमा में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों और मशीनों के लिए भी हम विदेश पर निर्भर थे, उस समय फाल्के भारत की पहली मूक फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' लेकर आए।
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फाल्के का जन्म महाराष्ट्र के नासिक से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था। बचपन से ही उनमें कला के प्रति रुझान था।

उन्होंने 1885 में मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में प्रवेश लिया। वर्ष 1890 में यहां से उत्तीर्ण होने के बाद फाल्के ने बड़ौदा के कला भवन में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने मूर्तिशिल्प, इंजीनियरिंग, ड्राइंग, पेंटिंग और फोटोग्राफी का ज्ञान प्राप्त किया।
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फाल्के ने गोधरा में एक फोटोग्राफर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 1903 में वह भारतीय पुरातत्व विभाग में ड्राफ्ट्समैन के तौर पर काम करने लगे।

उन्होंने प्रख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा के साथ भी काम किया। उन्होंने एक जर्मन जादूगर के साथ बतौर मेकअप मैन काम किया।
वर्ष 1909 में उन्होंने जर्मनी जाकर सिनेमाई कला से संबंधित आधुनिक प्रौद्योगिकी व मशीनरी को जाना। यही वह समय था जब फिल्म निर्माण की कला उन्हें आकर्षित करने लगी।

फाल्के के जीवन में फिल्म निर्माण से जुड़ा रचनात्मक मोड़ 1910 में 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखने के बाद आया। इसी से उन्हें फिल्म निर्माण की प्रेरणा मिली।

इसके बाद उन्होंने इस दौर की और भी फिल्में देखीं। उन्होंने अपने एक मित्र की मदद से इंग्लैंड जाकर फिल्म निर्माण के लिए जरूरी आवश्यक उपकरण खरीदे।

फाल्के ने 1912 में अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई, जो एक मूक फिल्म और देश की पहली फीचर फिल्म थी। फिल्म के निर्माण में लगभग 15 हजार रुपये खर्च हुए। उस समय यह एक बहुत बड़ी राशि थी।

फाल्के ने किसी तरह फिल्म पूरी की तो इसका प्रदर्शन एक बड़ी समस्या बन गया। उन दिनों नाटकों का बोलबाला था।

दो आने में लोग छह घंटे के नाटक का आनंद लेते थे। ऐसे में तीन आने खर्च कर एक घंटे की फिल्म कौन देखता।

शायद यही वजह थी कि फाल्के ने दर्शकों को आकर्षित करने के लिए एकदम नए ढंग से इसका विज्ञापन किया।

'सिर्फ तीन आने में देखिए दो मील लंबी फिल्म में 57 हजार चित्र'। भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का विज्ञापन कुछ इसी प्रकार का था।

03 मई, 1913 को मुंबई के कोरोनेशन थियेटर में इसे दर्शकों के लिए प्रदर्शित किया गया। दर्शक एक पौराणिक गाथा को चलते-फिरते देखकर वाह-वाह कर उठे।

भारत की पहली फिल्म दर्शकों के सामने थी। मूक फिल्म होने के कारण परदे के पीछे से पात्रों का परिचय और संवाद आदि बोले जाते थे।

उस समय महिलाओं के किरदार पुरुष ही किया करते थे, इसलिए फिल्म में रानी तारामती की भूमिका सालुंके नामक युवक ने निभाई।

अपने यादगार फिल्मी सफर के तकरीबन 25 वर्षो में उन्होंने 'राजा हरिश्चंद्र' के अलावा सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्रीकृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), कंस वध (1920), शकुंतला (1920), संत तुकाराम (1921), और भक्त गोरा (1923) सहित 100 से ज्यादा फिल्में बनाईं।


वर्ष 1931 में आर्देशिर ईरानी की 'आलम आरा' से भारतीय फिल्मों के सवाक-युग का सूत्रपात हुआ। मूक-युग एवं फाल्के कालीन सिनेमा के दिन अब समाप्त हो चले थे।

वर्ष 1932 में प्रदर्शित हुई 'सेतुबंधन' फाल्के की अंतिम मूक फिल्म थी। इसके बाद वह एक तरह से फिल्मी दुनिया से बाहर रहने लगे।
संकल्प के धनी फाल्के ने एक बार फिर सवाक फिल्म 'गंगावतरण' (1937) से सिनेमा जगत में लौटने का प्रयास किया। लेकिन उनका जादू नहीं चल सका। 'गंगावतरण' उनकी पहली और अंतिम सवाक फिल्म थी।

फाल्के के अंतिम दिन नासिक में बीते। 16 फरवरी, 1944 को 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

उनकी सौवीं जयंती के अवसर पर 1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना हुई।

यह भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार है जो फिल्मों में आजीवन योगदान के लिए केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है।

पहला फाल्के पुरस्कार अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया।

अब तक 43 फिल्मी हस्तियों को यह पुरस्कार दिया जा चुका है। साल 2012 का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार अभिनेता प्राण को दिए जाने की घोषणा की गई है।

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