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2013: फिल्म और दर्शक दोनों के लिए बड़ा साल
विनोद अनुपम
Updated Mon, 30 Dec 2013 11:54 AM IST
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भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष के रूप में याद किया जाता रहा साल 2013, इस अवसर पर भारतीय सिनेमा के आरंभ से लेकर अब तक के ऐतिहासिक पड़ावों को भी गर्व के साथ याद करने की कोशिश पूरे वर्ष जारी रही।
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हिंदी सिनेमा के समकालीन चार प्रतिनिधि फिल्मकारों अनुराग कश्यप, करण जौहर, जोया अख्तर और दिबाकर बनर्जी ने अपनी लघु फिल्मों को एक साथ ‘बाम्बे टॉकीज’ के नाम से प्रस्तुत कर भी इंडस्ट्री को एक ट्रिब्यूट देने की कोशिश की, लेकिन पूरे वर्ष जब फिल्मकारों में एकमात्र होड़ 100 करोड़ के आंकड़े को छूने के लिए मची रही और सिनेमा की श्रेष्ठता उसकी कमाई से ही तय होती रही।
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शुरुआत मटरू की बिजली से
2013 की शुरुआत हालांकि ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ जैसी वाम चेतना से लैस फिल्म के साथ हुई, लेकिन विशाल भारद्वाज ने अपनी इस चेतना से दर्शकों को इतने आधे-अधूरे मन से जोड़ने की कोशिश की कि न तो वह विचार दे सकी, न ही मनोरंजन। वास्तव में ‘लंच बॉक्स’, `मद्रास कैफे’, `भाग मिल्खा भाग’, `काई पो चे’, `बी ए पास’ और ‘लुटेरा’ जैसी गिनती की कुछेक फिल्मों के अलावा इस वर्ष 200 से अधिक बनी हिंदी फिल्मों में शायद ही किसी ने दर्शकों से संवाद कायम करने की कोशिश की।
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अधिकांश फिल्मों के लिए इस वर्ष भी दर्शक उपभोक्ता ही बने रहे। यदि हिंदी सिनेमा अपने शताब्दी वर्ष में जरा भी जवाबदेही महसूस करता, तो शायद दर्शकों के सौंदर्यबोध को चुनौती देती ‘ग्रैंड मस्ती’ जैसी फिल्म परिकल्पित नहीं की जाती। `ग्रैंड मस्ती' 2013 की 100 करोड़ की सीमा पार करने वाली कुछेक सुपरहिट फिल्मों में शामिल होकर वाकई एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि क्या सिनेमा की सफलता में अब उसके बेहतर होने की शर्त शामिल नहीं रही।
संतोष दे गईं गईं फिल्में
ऐसे में ‘लुटेरा’ और ‘रांझणा’ जैसी फिल्म की सफलता संतोष देती है कि प्रेमकथा के माध्यम से भी दर्शकों की संवेदना को उद्वेलित किया जा सकता है। 2013 में यूं तो `आशिकी 2', `गोलियों की रासलीला-रामलीला', `ये जवानी है दीवानी’ जैसी प्रेमकथाओं ने भी दर्शकों को रोमांस की गुदगुदी दी, लेकिन `रांझणा' और `शुद्ध देशी रोमांस' प्रेमकथा होते हुए भी इस भीड़ से अलग रहीं।
दोनों फिल्मों ने प्रेम के दो ध्रुवों को दर्शकों के सामने रखा। उल्लेखनीय है कि एक ही कालखंड को चित्रित करती ‘रांझणा’ में जहां समर्पण की पराकाष्ठा थी, वहीं ‘शुद्ध देशी रोमांस’ में उन्मुक्तता की खुली मांग थी। आश्चर्य कि दर्शकों ने प्रेम के दोनों ही रूपों को स्वीकार किया।
न ही बॉस और न ही हिम्मत
वास्तव में कहीं न कहीं यह हिंदी सिनेमा की व्यापकता का प्रतीक है कि उसके पास सभी तरह की फिल्मों के लिए दर्शक समूह तैयार हैं, जो अपनी पसंद की फिल्मों को हिट करा सकते हैं। बशर्ते वह ‘हिम्मतवाला’ और ‘बॉस’ की तरह दर्शकों की समझ को चुनौती नहीं दे रही हो। सच यही है 2013 में दर्शकों ने यह संदेश देने में कतई कोताही नहीं कि अब उसके लिए महत्वपूर्ण सितारे नहीं, महत्वपूर्ण फिल्में हैं।
बड़े सितारों की फिल्में भी दर्शकों को तभी आकर्षित कर सकीं, जब फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘कृष-3’ की तरह बेहतर बनीं, नहीं तो ‘बेशरम’ की तरह जबरदस्त ओपनिंग देकर ही दर्शकों ने हाथ जोड़ लिए। वहीं ‘काय पो चे’, `ए बी सी डी’, `बी ए पास’, `भाग मिल्खा भाग’, `फुकरे’, `रांझणा’, `मद्रास कैफे’, `लंच बाक्स’ को हिट बनाने के लिए दर्शकों ने किसी सितारे की जरूरत नहीं समझी।
वास्तव में दर्शकों ने इस वर्ष हिंदी सिनेमा को स्पष्ट संदेश दिया कि उसे मतलब सिर्फ कहानी से है, चेहरे से नहीं। वास्तव में यह वर्ष हिंदी सिनेमा के लिए फॉर्मूले से मुक्ति का रहा। बनने को ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’, `रेस2’, ‘यमला पगला दीवाना’ जैसे सीक्वल भी बने, लेकिन फिल्में ब्रांड मात्र से नहीं चलीं, चली वही जिसमें दम दिखा। दर्शकों को कहानी नहीं मिली, तो दर्शकों ने नकारने में देर नहीं लगाई।
(लेखक जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं)