फिल्मी हस्तियां गिड़गिड़ाती हैं, 'मुझे पद्मश्री दिला दो'
सच्चे कलाकार को तालियों और तारीफों की भूख होती है, पुरस्कारों की नहीं। हमें तो रिवार्ड चाहिए, अवार्ड नहीं। किसी भी बॉलीवुड कलाकार से पुरस्कारों और तारीफों में से किसी एक को चुनने पर सवाल पूछिए तो आपको ऐसे ही जवाब मिलेंगे। परंतु अंदर की हकीकत और है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक सार्वजनिक समारोह में जब से पद्म पुरस्कारों की लॉबिंग के मुद्दे पर सीनियर अभिनेत्री आशा पारेख का नाम लिया, पुरस्कारों को लेकर फिल्मी हस्तियों का लालच फिर चर्चा में आ गया है।
वास्तव में पुरस्कार प्रतिभा का सम्मान होते हैं लेकिन जब इनके आधार पर काम-दाम-सुविधाएं मिलने लगती हैं तो जोड़-तोड़ शुरू हो जाती है। बीते साल के आखिरी दिनों में जब नाराज कवि और लेखक सरकारी पुरस्कार लौटा रहे थे तो भाजपा सांसद/अभिनेत्री हेमा मालिनी ने 13 फिल्मकारों द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने के बाद एक साक्षात्कार में यह कह कर चौंका दिया था कि बहुत सारे लोग मेरे पास आते हैं कि मुझे पद्मश्री दिला दो, मुझे ये दिला दो, वो दिला दो। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था।
परंतु गडकरी द्वारा आशा पारेख का नाम लेते ही बॉलीवुड में कई लोग हिल गए हैं कि कहीं उनके भी नाम धीरे-धीरे समाने न आने लगें। हालांकि कई लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि गडकरी ने आशा पारेख का नाम क्यों लिया और बाकी किसी का क्यों नहीं? गडकरी को जानने वालों का कहना है कि इसके पीछे उनकी कोई मंशा नहीं थी, भाषण देते वक्त उनकी जुबान पर बस यह नाम आ गया।
सरकारी पुरस्कारों का मौसम आते ही जोड़-तोड़ में लग जाते हैं सितारे
उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड में ऐसे कई फिल्मकार, ऐक्टर, संगीतकार, गीतकार, गायक-गायिका हैं जो सरकारी पुरस्कारों का मौसम आते ही जोड़-तोड़ में लग जाते हैं। वे नेताओं के करीबियों को पटाते हैं। नेताओं के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। उनसे नजदीकी बनाते हैं। कभी इसका सिला भी मिलता है और देखने में आता है कि पुरस्कार पाने वालों की सूची से ज्यादा प्रतिभाशाली और वरिष्ठ लोग बाहर रह गए हैं। आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी चलता है।
उल्लेखनीय है कि सिर्फ सरकार द्वारा दिए जाने वाले नागरिक सम्मान ही नहीं, बल्कि फिल्म पुरस्कारों पर भी कुछ मौकों पर पक्षपात के आरोप लगे हैं। जबकि निजी फिल्म पुरस्कारों का तो कहना ही क्या! अब यह बात खुल कर सामने आ चुकी है कि कई सितारे सिर्फ इस बात के लिए अवार्ड समारोहों में अच्छा काम करने की ट्रॉफी पा जाते हैं क्योंकि वे आयोजन में ठुमके लगा देते हैं। ट्रॉफियों से इन सितारों का अहंकार संतुष्ट होता है।
ऐसा सिर्फ आज ही नहीं है। जिस दौर में निजी पुरस्कार कम थे तब इंडस्ट्री के कई दिग्गजों ने धन देकर अवार्ड खरीदे। जिन्होंने धन देने से इंकार किया, उन्हें पुरस्कार नहीं दिए गए। असल में ये सब बंद दरवाजों की बातें हैं, जो कभी कभी बड़ी धमक के साथ बाहर आ जाती हैं। हालांकि हर दौर में ऐसे भी कलाकार रहे हैं जिन्होंने इन पुरस्कारों की हकीकत जानने के बाद खुद को इस चूहा दौड़ से अलग कर लिया। उनका नाम पुरस्कारों की सूची में भले ही दर्ज नहीं होता, लेकिन दर्शकों के दिलों में उनके लिए सदा सम्मान रहता है।
सैफ अली खान को 2010 में जब पद्मश्री से नवाजा गया था। तब भी काफी बवाल मचा था। स्नकूर चैंपियन यसिन ने तो बाकयदा पत्र लिखकर सैफ को अवार्ड दिए जाने पर कई गंभीर सवाल उठाए थे।