Ab Dilli Dur Nahin Review: संघर्ष के सबक सिखाती इमरान की डेब्यू फिल्म, यूपीएससी परीक्षा की राह दिखाती कहानी
दुनिया सिर्फ कामयाब इंसान की पूजा करती है, उसके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि कामयाबी हासिल कैसे की। सफलता हासिल करने के लिए एक इंसान के जीवन में काफी उतार चढ़ाव आते हैं, सपने कई बार टूट कर बिखर जाते हैं। लेकिन अगर इंसान के अंदर दृढ संकल्प हो तो दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं जो इंसान न कर सके। कभी कभी मंजिल बहुत करीब होते हुए भी ऐसे लगता है कि अब हमसे वह काम नहीं हो पाएगा, जीवन में एक ऐसा मोड़ होता है, जब इंसान अपने सपनों को भूलकर ऐसा रास्ता अखित्यार कर लेता है कि पूरे जीवन में सिर्फ निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता। 'दिल्ली दूर नहीं' एक ऐसे ही आईएएस की कहानी है जो जीवन में तमाम संघर्ष और मुश्किल हालत में कामयाबी हासिल करके लोगों के लिए प्रेरणा श्रोत बनता है।
फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' की कहानी आईएएस अधिकारी गोविन्द जायसवाल की जिंदगी से प्रेरित है। गोविंद जायसवाल के माता -पिता ने अपने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए बहुत कड़ा संघर्ष किया है। यहां तक की गोविंद जायसवाल के पिता ने रिक्शा तक चलाया। यह फिल्म समाज में खासकर के युवाओं को संदेश देती है कि अगर पूरी ईमानदारी और लगन से कोई भी काम किया जाए, तो देर सबेर सफलता जरूर मिलती है। फिल्म में आईएएस अधिकारी गोविन्द जायसवाल की जिंदगी से प्रेरित अभय शुक्ला का किरदार पहली बार बड़े परदे पर उतरे इमरान जाहिद ने निभाया है। फिल्म की शुरुआत निर्देशक महेश भट्ट के टॉक शो से होती है, जिसमे अभय शुक्ला शामिल होता है और आईएएस अधिकारी बनने के अपने सफर के बारे में बताता है। अभय शुक्ला बिहार के एक जिले का टॉपर है और वह आईएएस की तैयारी करने दिल्ली आता है। बिहार का एक सीधा साधा युवक किस तरह से तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपने को पूरा करता है, इस कहानी को फिल्म में बहुत ही मार्मिक तरीके से पेश किया गया है।
फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' में आरक्षण जैसे मुद्दे को भी बहुत प्रमुखता से उठाया गया है। सामान्य कैटेगरी का लड़का अच्छे अंक लाने के बावजूद आरक्षण की वजह से अनुसूचित, पिछड़ी जातियों से पीछे रह जाता है। यह बात ठीक इसी तरह से है कि तेज दौड़ने वाले लड़को के पैरो में बेड़ियां पहना दी जाएं और कमजोर दौड़ने वाले बच्चों को स्कूटर पर बैठाकर बॉउंड्री पार करा दिया जाए। ऐसी स्थिति में सामान्य कैटेगरी के सपने जाहिर सी बात है कि टूटकर बिखर जाते हैं। लेकिन प्रतिभागी अगर यह मान ले कि सामान्य कैटेगरी के एक सीट के लिए उसे अपनी लड़ाई लड़नी है और उस हिसाब से तैयारी करे तो सफलता जरूर मिलती है। जीवन का सिर्फ एक ही लक्ष्य होना चाहिए कि हर विपरीत से विपरीत परिस्थियों में सिर्फ आगे ही बढ़ना है।
कहते हैं कि किसी भी इंसान के जीवन में सफलता के पीछे एक औरत का हाथ होता है। वह औरत आपकी मां, बहन, प्रेमिका या फिर आपकी दोस्त भी हो सकती है। फिल्म में अभय शुक्ला के जीवन में एक ऐसा भी क्षण आता है, जब वह आईएएस बनने का सपना छोड़कर कोचिंग सेंटर में बच्चों को पढ़ाने की सोचता है। कोचिंग सेंटर चलाने वाला शानू बार- बार अभय शुक्ला को इस बात का प्रलोभन भी देता है कि कोचिंग सेंटर में बहुत पैसे हैं। लेकिन उस मां बाप के सपने का क्या, जो दिन रात मजदूरी करके एक एक पाई जुटाकर अपने बेटे को कलेक्टर बनाने का सपना देखते हैं। फिल्म में ऐसे कई भावनात्मक पहलू को दिखाया गया है जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आपकी सफलता के पीछे न जाने कितने लोगों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
फिल्म में महेश भट्ट का एक संवाद आता है कि इंसान को असफलता को अपना गहना बना लेना चाहिए। जिंदगी में हर कदम पर आपको असफतला मिलेगी लेकिन अगर आपका दृढ़ निश्चय है तो सफलता आपको जरूर मिलेगी। कोचिंग क्लास के आड़ में चलने वाले गोरखधंधे को भी फिल्म में प्रमुखता से दिखाया गया है। देखा जाए तो फिल्म के कलाकार कोई बड़े स्टार नहीं है लेकिन अपनी भूमिकाओं में सबका शत प्रतिशत योगदान रहा है। अभय शुक्ला की भूमिका में इमरान जाहिद बड़े परदे पर फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' से डेबयू कर रहे हैं। शॉर्ट फिल्म ‘लक्ष्मी’ में अपना हुनर दिखा चुके इमरान ने लंबा समय महेश भट्ट के सानिध्य में रंगमंच पर गुजारा है। उनके नाटकों की खूब प्रशंसा हो चुकी है। अब बारी फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' में उनके अभिनय की है। एक गैर फिल्मी पृष्ठभूमि से होते हुए भी सिनेमा में नायक के तौर पर बड़े परदे पर पेश होना ही उनकी बड़ी जीत है। अभिनय भी उनका प्रभावी है। हां, थोड़ा उन्हें खुद को तराशने की जरूरत है और यह भी समय के साथ होता ही जाएगा।
अभय शुक्ला के दोस्त शनि की भूमिका में राजीव मिश्रा, कोचिंग संचाकक की भूमिका में सत्यकाम आनंद और अभय शुक्ला की प्रेमिका नियति की भूमिका में श्रुति सोढ़ी का काम सराहनीय रहा है। निर्देशक सुधीर मिश्रा के सहायक निर्देशक रहे कमल चंद्रा की 'अब दिल्ली दूर नहीं' बतौर निर्देशक पहली फिल्म है। उन्होंने फिल्म के लेखक दिनेश गौतम की लिखी प्रेरक कहानी के माध्यम से एक ऐसे मुद्दे को उठाया है, जो आपके युवाओं को एक प्रेरणा देती है। यह फिल्म जीवन में सफलता और असफलता के मायने पर बात करती है।
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फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' की पूरी शूटिंग दिल्ली के मुखर्जी नगर, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कनॉट प्लेस जैसे कई खूबसूरत लोकेशन पर हुई है। फिल्म के सिनेमैटोग्राफर श्रीकांत असाती ने दिल्ली के खूबसूरत लोकेशन को बड़ी ही खूबसरती के साथ अपने कैमरे में कैद किया है। फिल्म का संपादन राम किशन सुतार ने बहुत ही चुस्त किया। फिल्म देखने के बाद बोरियत महसूस नहीं होती है। इस फिल्म में तीन गाने 'ठुल्लू रे', 'हमारी अधूरी कहानी' और 'महसूस हुआ' है जिसका संगीत कमशः अभिजीत गावड़े, तरुण शर्मा और अजय सिन्हा ने तैयार किए है। अजय सिन्हा का संगीतबद्ध किया गीत 'महसूस हुआ' बहुत ही खूबसूरत गीत है,यह एक रोमांटिक सांग है, जिसे जुबिन नौटियाल ने गाया है। इस गाने में इमरान जाहिद और श्रुति सोढ़ी के बीच की कमेस्ट्री बहुत अच्छी लगी है।
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