शोले के 11 ऐसे 'किरदार' जो बिना डायलॉग के ही अमर हो गए
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शोले भारतीय सिनेमा की एक कालजयी फिल्म है। इस फिल्म को रिलीज हुए 40 साल हो चुके हैं लेकिन इन चार दशकों में फिल्म की चमक वैसे ही बनी रही जो रिलीज के पहले दिन थी। अब यह फिल्म भले ही बड़े परदे पर कम लगती हो लेकिन छोटे परदे पर इसकी लोकप्रियता बनी हुई है।
शोले उन चुनिंदा फिल्मों में है जिसने समाज पर काफी प्रभाव छोड़ा है। हर भारतीय और हिंदी सिनेमा के दीवानों के बीच इस फिल्म ने किस कदर अपनी पकड़ बनाई है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर कोई निजी जिंदगी में इस फिल्म के संवाद एक-दो नहीं सैकड़ों बार बोल चुका होगा। फिल्म के एक-एक सीन हर किसी को रट से गए हैं फिर भी इसे देखने की चाह आज भी बनी हुई है।
सबसे खास बात यह भी है कि फिल्म को इसके सिर्फ किरदारों ने ही अपने जोरदार अभिनय से जीवंत नहीं किया बलि्क कुछ ऐसे भी किरदार हैं जो अनायास ही फिल्म में आए और अपनी जगह बना ले गए, एकबारगी ऐसा लगेगा कि फिल्म में उनका कोई रोल भी है लेकिन जब आप गहराई में जाएंगे तो पाएंगे कि भले ही फिल्म बनाते समय इन किरदारों की भूमिका के बारे में ध्यान न दिया गया हो लेकिन ये किरदार इतने दिलचस्प बन गए जिनको फिल्म से हटा दिया जाए तो फिल्म बेजान सी हो जाएगी।
आइए, जानते हैं कि ऐसे 11 नायाब किरदारों को जिनका फिल्म में कोई डायलॉग तो नहीं था फिर भी वे फिल्म को देखने वाले हर जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ गए।
लाल रंग की ट्रेन जिससे होती है जय-वीरू की एंट्री
फिल्म शोले में अभिनेताओं के अलावा कुछ ऐसे निर्जीव किरदार हैं जिन्होंने फिल्म में जान डाल दी है। इनमें सबसे पहले नाम आता है ट्रेन का। फिल्म में ट्रेन का भी बेहद खास रोल रहा है। फिल्म में जय-वीरू की एंट्री ट्रेन से ही होती है और ट्रेन पर लगातार लगभग 15 मिनट का पूरा दृश्य फिल्माया जाता है।
ठाकुर जो पहले एक पुलिस अधिकारी थे इन दोनों को हथकड़ी लगाकर एक पुलिस स्टेशन पर ले जाने के लिए ट्रेन का ही इस्तेमाल करते हैं। जिस ट्रेन पर तीनों सवार होते हैं उसी पर डाकुओं का हमला हो जाता है और जोरदार लड़ाई में ठाकुर दोनों की प्रतिभा को भी पहचान लेते हैं।
वहीं फिल्म के अंत में गब्बर का खात्मा करने के बाद जब वीरू वापस अपने गांव के लिए रवाना होता है तो भी वह ट्रेन से ही जाता है। लेकिन वह आता जय के साथ है लेकिन जाता बसंती के साथ है पर जाने का साधन वही ट्रेन ही होती है।
बाइक है फिल्म में जय-वीरू की पहली चोरी
फिल्म में ट्रेन पर डकैतों से जोरदार भिडंत के बाद जय और वीरू का अगला सीन एक बाइक के साथ होता है। यह बाइक अपने आप में बेहद खास था क्योंकि इस बाइक पर चार लोगों के बैठने की सीट थी।
'1942 BSA WA 500cc बाइक' जिसे फिल्म में शूटिंग के लिए खासतौर से तैयार करवाया गया था। फिल्म में चोर की भूमिका में होते हैं जय-वीरू और दोनों पहली बार इस फिल्म में इसी बाइक की चोरी करते दिखते हैं।
इसी चोरी की बाइक पर भागते हुए दोनों सबसे पॉपुलर गाना 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' भी गाते हैं और अपनी बेजोड़ दोस्ती का परिचय देते हैं।
बसंती का तांगा जिससे गांव पहुंचते हैं जय और वीरू
जय और वीरू जब ट्रेन से उतरते हैं तो उतरते ही एक तांगेवाली से दोनों का मुलाकात होती है। यह तांगेवाली बसंती होती है और फिल्म में बसंती यानी हेमामालिनी की एंट्री भी इसी सीन से होती है और वह अपने बातुनी अंदाज में जहां जय को बोर कर देती है तो वहीं वीरू उसका दीवाना हो जाता है।
इसी तांगे पर वीरू बसंती से इजहारे-इश्क करता है। इसी तांगे पर एक बेहद पॉपुलर गाना भी फिल्माया (कोई हसीना जब रूठ जाती है) गया है। दोनों का रोमांस भी इसी तांगे पर आगे बढ़ता है।
एलिजाबेथ का वो सिक्का जिसने आगे बढ़ाई कहानी
कहने को तो सिक्का बहुत छोटा होता है लेकिन इस महान फिल्म में इस छोटे सिक्के का भी अहम और निर्णायक किरदार रहा है। फिल्म की शुरुआत में ट्रेन पर डाकूओं का सामना करते हुए जब ठाकुर यानी पुलिस अधिकारी घायल हो जाता है तो इन दोनों के पास भागने का शानदार मौका होता है लेकिन जय (अमिताभ बच्चन) इस पर फैसला सिक्के से टॉस करके करता है और टॉस के बाद यह तय होता है कि भागा नहीं जाएगा। उनके इसी फैसले के दो साल बाद ठाकुर उनको अपने गांव बुलाता है और कहानी आगे बढ़ती है।
सिक्के का रोल यहीं पर खत्म नहीं होता आगे भी कई बार इसी सिक्के के जरिए आगे की योजना पर काम किया जाता है। फिल्म के अंत में लड़ाई का फैसला दोनों के बीच इसी टॉस से ही होता है जिसमें जय गब्बर से लड़ाई करने जाता है। हालांकि जय की मौत के बाद वीरू को पता चलता है कि सिक्के के दोनों तरफ हेड ही होता है।
इन दोनों मौकों के अलावा जय और भी कई बार सिक्के का इस्तेमाल टॉस के रूप में करता है।
ठाकुर ने चद्दर का लिया 'अमर सहारा'
फिल्म में संजीव कुमार ने एक दुखियारे ठाकुर का रोल निभाया जिसके दोनों हाथ गब्बर नाम के डाकू ने उसे जेल पहुंचाने के कारण काट लिए थे।
फिल्म की शुरुआती कुछ सीन को छोड़ दिए जाए तो ठाकुर ने पूरी फिल्म में चद्दर से खुद को ढके रखा था। और फिल्म के अंत में उन्होंने इस चद्दर को हटाया गब्बर से बदला लेने के लिए।
गब्बर को मारने के बाद जब ठाकुर निढाल होकर एक खंभे का टेक लेकर बैठे होते हैं तो वीरू उसी चद्दर को उठाकर एक बार फिर उसे ओढ़ाता है।
जय और राधा के बीच सेतु बना माउथ ऑर्गन
शोले में जय यानी अमिताभ बच्चन का वास्तव में कोई साथी होता है तो वह है उनका माउथ ऑर्गन। अपने इसी वाघ यंत्र के सहारे वह ठाकुर की विधवा राधा को रिझाने की कोशिश करते है, जिसमें वह काफी-कुछ सफल भी हो जाते हैं।
फिल्म में माउथ ऑर्गन कई बार इस नायक की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम बना है खासकर अपने प्रेम के इजहार के वक्त। फिल्म में शाम का वो समय जब राधा पूरे घर में रात की रोशनी करने आती है तो जय एक कोने में बैठे माउथ ऑर्गन बजा रहे होते हैं, इस दौरान दोनों की आंखे भी चार होती है।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ जय ने ही माउथ ऑर्गन बजाया हो। जय के दोस्त वीरू ने भी कभी-कभी माउथ ऑर्गन का प्रयोग किया है। खासकर तब जब जय अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहा होता है। फिल्म के अंत में जब वीरू वापस अपने घर जाता है तो उसे अपने साथ भी ले जाता है।
पानी की टंकी और धर्मेंद्र की खुदकुशी का प्रयास
फिल्म शोले की बात हो और पानी की टंकी पर चढ़े वीरू यानी धर्मेंद्र का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। फिल्म के लोकप्रिय दृश्यों में पानी की टंकी चढ़े वीरू का बसंती से हाथ (शादी के लिए) मांगने का वो शानदार अंदाज।
शराब के नशे में घुत वीरू टंकी पर चढ़ जाता है और बसंती से शादी नहीं होने पर खुदकुशी करने की धमकी देता है। इसके अलावा यह बात भी बेहद शानदार रही है कि उस जमाने में जब गांव में बिजली नहीं थी तो 40-50 फुट ऊंचे पानी के इस टंकी पर पानी कैसे भरा जाता था।
साथ ही इसी पानी की टंकी पर चढ़कर वीरू पहली बार डाकूओं पर फायरिंग कर भगाता है जिससे गब्बर अपने साथियों पर काफी नाराज होता है।
बेल्ट के साथ डाकू गब्बर की फिल्म में एंट्री
फिल्म में डाकू गब्बर का वो बेल्ट जिसे वह हाथ में लेकर घूमता है। गब्बर यानि अमजद खान की फिल्म में एंट्री हाथ में पकड़े बेल्ट के साथ ही होती है। गब्बर के परदे पर आने से पहले इसी बेल्ट को दिखाया जाता है फिर उसका लोकप्रिय डायलॉग सुनाई देता है 'कितने आदमी थे।' बेल्ट के बाद वह अपनी पिस्तौल के साथ अपने आदमियों से संवाद करता है।
इसी सीन में वह दृश्य भी है जिसमें वह अपने साथी से पूछता है 'तेरा क्या होगा कालिया' फिर जवाब आता है 'मैंने आपका नमक खाया है।'
धर्मेंद्र के हाथ में शराब की बोतल
वीरू यानी धर्मेंद्र के हाथ में एक शराब की बोतल होती है जो फिल्म में कई बार दिखाई देती है। बसंती से रजामंदी होने के बाद वीरू उससे शादी करने का मन बनाता है जिसके लिए वह जय से बसंती की मौसी के पास शादी का प्रस्ताव लेकर जाने को कहता है।
छोटी सी पहाड़ी पर जय और वीरू आपस में बात करते हैं तो उस समय वीरू के हाथ में शराब की बोतल होती है। इसके अलावा बसंती की मौसी का वीरू के साथ शादी करने से मना करने के बाद वह इसी सफेद शराब वाली बोतल लेकर पानी की टंकी पर चढ़ जाता है और शादी के लिए रजामंद नहीं होने तक टंकी पर ही खड़ा रहता है और बार-बार खुदकुशी की धमकी दे डालता है।
पहाड़ी जिस पर दिखता है गब्बर डाकू का आतंक
जिस रामगढ़ गांव में जय और वीरू डाकू गब्बर का सामना करने के लिए आते हैं वह पहाड़ियों से घिरा होता है। फिल्म में कॉसिं्टग भी पहाड़ियों पर की जाती है। इसी पहाड़ी पर गब्बर अपने साथियों के साथ रहता है और यहीं पर वो सुरती ठोंकते हुए यादगार डॉयलॉग बोलता है 'अरे ओ सांबा, कितना ईनाम रखा है सरकार ने हम पर।'
इसके अलावा एक और डॉयलॉग मशहूर हुआ 'गोली 6 और आदमी 3, बहुत नाइंसाफी है ये।'
वो दो खंभे जिस पर गब्बर ने ठाकुर के काटे दोनों हाथ
डाकू गब्बर का ठिकाना वो पहाड़ी होता है, इसी पहाड़ी के बीचों-बीच पत्थर के आपस में खड़े दो खंभे होते हैं जिसका इस फिल्म में निर्णायक योगदान होता है।
गब्बर इसी दो खंभे पर वीरू को बांध देता है और फिर बसंती से नाचने को कहता है। गब्बर के बसंती से नाचने को कहने पर वीरू नाराज हो जाता है और कहता है 'बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना।' फिर बसंती इसी खंभे के आसपास नाचती है।
यही वो खंभा होता है जिस पर ठाकुर के दोनों हाथ सिकड़ से बांधकर उसे काट देता है। फिल्म के अंत में ठाकुर गब्बर को मारते हुए इसी खंभे के पास ले जाता है और अपने पैरों से मारते हुए मार डालता है।