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सीट का समीकरण: 1967 के बाद हर चुनाव में बदला जीत का चेहरा, ऐसा है गाजीपुर सदर सीट का चुनावी इतिहास
Wed, 23 Sep 2026 10:01 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 23 Sep 2026 10:01 PM IST
सार
गाजीपुर सदर विधानसभा सीट 1957 के विधानसभा चुनाव में अस्तित्व में आई। 2022 के चुनाव में यहां से सपा प्रत्याशी जयकिशन साहू ने भाजपा की डॉ. संगीता बलवंत को हराकर जीत हासिल की। इससे पहले संगीता ने 2017 में भाजपा को जीत दिलाई थी। आइये जानते हैं गाजीपुर सदर सीट का चुनावी इतिहास...
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गाजीपुर सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। भले ही मतदान में अभी समय हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने सीटवार रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। इसके तहत राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने से लेकर संभावित उम्मीदवारों और वोटरों के समीकरण तक पर मंथन कर रहे हैं। ऐसे में हम आपको यूपी की सभी विधानसभा सीटों का इतिहास, राजनीतिक सफर और चुनावी गणित बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं कि इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का चुनावी इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं गाजीपुर सदर सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला गाजीपुर है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं। इनमें- जखनियां, सैदपुर, गाजीपुर सदर, जंगीपुर, जहूराबाद, मोहम्मदाबाद और जमानिया शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर विधानसभा सीट की बात करेंगे। गाजीपुर सदर विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1957 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह विधानसभा अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित थी। यहां के पहले विधायक पब्बर राम बने थे, जिन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
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पहले जानते हैं गाजीपुर सदर सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला गाजीपुर है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं। इनमें- जखनियां, सैदपुर, गाजीपुर सदर, जंगीपुर, जहूराबाद, मोहम्मदाबाद और जमानिया शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर विधानसभा सीट की बात करेंगे। गाजीपुर सदर विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1957 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह विधानसभा अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित थी। यहां के पहले विधायक पब्बर राम बने थे, जिन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
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गाजीपुर विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
गाजीपुर विधानसभा सीट के पहले यानी की साल 1957 के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पब्बर राम विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की सुशीला देवी को 1,045 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में पब्बर राम को 17,134 वोट मिले, जबकि सुशीला देवी को 16,089 वोट मिले।
1962: पहली बार जीती कांग्रेस
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कृष्ण नंद राय विजयी हुए। इस चुनाव में उन्हें 16,599 वोट मिले, जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय प्रत्याशी सुशीला देवी को 10,601 वोट मिले। इस चुनाव में कृष्ण नंद राय ने 5,998 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
1967: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की हुई वापसी
वहीं 1967 के चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के पब्बर राम विजयी हुए। उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में कांग्रेस के आर. एस. सिंह को केवल 571 वोटों के अंतर से हराया। ये पब्बर राम की इस सीट पर दूसरी जीत थी। 1967 के चुनाव के बाद गाजीपुर सदर सीट से कोई भी चेहरा दो बार चुनाव नहीं जीत सका है। इसके बाद 1969 में हुए चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम सूरत सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के कमला सिंह को 8,157 वोटों के अंतर से हराया।
गाजीपुर विधानसभा सीट के पहले यानी की साल 1957 के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पब्बर राम विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की सुशीला देवी को 1,045 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में पब्बर राम को 17,134 वोट मिले, जबकि सुशीला देवी को 16,089 वोट मिले।
1962: पहली बार जीती कांग्रेस
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कृष्ण नंद राय विजयी हुए। इस चुनाव में उन्हें 16,599 वोट मिले, जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय प्रत्याशी सुशीला देवी को 10,601 वोट मिले। इस चुनाव में कृष्ण नंद राय ने 5,998 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
1967: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की हुई वापसी
वहीं 1967 के चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के पब्बर राम विजयी हुए। उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में कांग्रेस के आर. एस. सिंह को केवल 571 वोटों के अंतर से हराया। ये पब्बर राम की इस सीट पर दूसरी जीत थी। 1967 के चुनाव के बाद गाजीपुर सदर सीट से कोई भी चेहरा दो बार चुनाव नहीं जीत सका है। इसके बाद 1969 में हुए चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम सूरत सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के कमला सिंह को 8,157 वोटों के अंतर से हराया।
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1974: पहली बार जीती भारतीय क्रांति दल
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के शाह अब्दुल फैज विजयी हुए। चुनाव में उन्हें 26,177 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के राम सूरत सिंह 17,353 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे। वहीं, भारतीय जनसंघ के बच्चन सिंह 11,678 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के शाह अब्दुल फैज विजयी हुए। चुनाव में उन्हें 26,177 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के राम सूरत सिंह 17,353 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे। वहीं, भारतीय जनसंघ के बच्चन सिंह 11,678 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1977: पहली बार जीती जनता पार्टी
1977 के यूपी विधानसभा चुनाव में गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से जनता पार्टी के मोहम्मद खलीलुल्ला कुरैशी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के श्री नारायण सिंह को 3,161 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोहम्मद खलीलुल्ला कुरैशी को 25,710 वोट, जबकि श्री नारायण सिंह को 22,549 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1977 के यूपी विधानसभा चुनाव में गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से जनता पार्टी के मोहम्मद खलीलुल्ला कुरैशी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के श्री नारायण सिंह को 3,161 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोहम्मद खलीलुल्ला कुरैशी को 25,710 वोट, जबकि श्री नारायण सिंह को 22,549 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980 का चुनाव
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से जनता पार्टी (एससी) के राम नारायण विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (आई) के मोहम्मद तौफीक खान को 4,836 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम नारायण को 22,163 वोट मिले, जबकि मोहम्मद तौफीक खान को 17,327 वोट मिले। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मोईउद्दीन अंसारी 8,969 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
1985: गाजीपुर सीट पर कांग्रेस ने की वापसी
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अमिताभ अनिल दुबे विजयी हुए। उन्होंने लोक दल के राम नारायण सिंह को 14,167 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अमिताभ अनिल दुबे को 27,055 वोट मिले, जबकि राम नारायण सिंह को 12,888 वोट मिले।
1989: निर्दलीय ने जीती चुनाव
वहीं, 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी खुर्शीद विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय दयानंद को 1,029 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में खुर्शीद को 23,556 वोट, जबकि दयानंद को 22,527 वोट मिले।
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से जनता पार्टी (एससी) के राम नारायण विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (आई) के मोहम्मद तौफीक खान को 4,836 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम नारायण को 22,163 वोट मिले, जबकि मोहम्मद तौफीक खान को 17,327 वोट मिले। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मोईउद्दीन अंसारी 8,969 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
1985: गाजीपुर सीट पर कांग्रेस ने की वापसी
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अमिताभ अनिल दुबे विजयी हुए। उन्होंने लोक दल के राम नारायण सिंह को 14,167 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अमिताभ अनिल दुबे को 27,055 वोट मिले, जबकि राम नारायण सिंह को 12,888 वोट मिले।
1989: निर्दलीय ने जीती चुनाव
वहीं, 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी खुर्शीद विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय दयानंद को 1,029 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में खुर्शीद को 23,556 वोट, जबकि दयानंद को 22,527 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में गाजीपुर विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991: पहली बार जीती भाजपा
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उदय प्रताप विजयी हुए। उन्होंने जनता दल के हसन मोहम्मद खान वारसी को 2,472 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप को 26,280 वोट मिले, जबकि हसन मोहम्मद खान वारसी को 23,808 वोट मिले। ये गाजीपुर सदर सीट पर भाजपा की पहली जीत थी।
1993: पहली बार जीती बसपा
1991 के चुनाव के बाद गाजीपुर विधानसभा सीट पर हिंसा और अशांति के कारण 1993 का चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद यहां 1994 में उपचुनाव कराए गए, जिसमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राज बहादुर विजयी हुए।
1996: भाकपा ने की वापसी
वहीं 1996 के चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजेंद्र विजयी हुए। उन्होंने भाजपा की ओम काला को 5,167 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजेंद्र को 52,891 वोट, जबकि ओम काला को 47,724 वोट मिले। वहीं, बसपा के इश्तियाक 35,126 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
1991: पहली बार जीती भाजपा
इस चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उदय प्रताप विजयी हुए। उन्होंने जनता दल के हसन मोहम्मद खान वारसी को 2,472 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उदय प्रताप को 26,280 वोट मिले, जबकि हसन मोहम्मद खान वारसी को 23,808 वोट मिले। ये गाजीपुर सदर सीट पर भाजपा की पहली जीत थी।
1993: पहली बार जीती बसपा
1991 के चुनाव के बाद गाजीपुर विधानसभा सीट पर हिंसा और अशांति के कारण 1993 का चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद यहां 1994 में उपचुनाव कराए गए, जिसमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राज बहादुर विजयी हुए।
1996: भाकपा ने की वापसी
वहीं 1996 के चुनाव में गाजीपुर विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजेंद्र विजयी हुए। उन्होंने भाजपा की ओम काला को 5,167 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राजेंद्र को 52,891 वोट, जबकि ओम काला को 47,724 वोट मिले। वहीं, बसपा के इश्तियाक 35,126 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2002: गाजीपुर सीट पर बसपा ने की वापसी
इस चुनाव के बाद राज्य में 2002 के चुनाव कराए गए। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के उमाशंकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजेंद्र को 716 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमाशंकर को 43,920 वोट, जबकि राजेंद्र को 43,204 वोट मिले। वहीं, भाजपा की ओमकला 32,818 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
2007: पहली सपा ने जीता चुनाव
इस विधानसभा चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) की सैयदा शादाब फातिमा विजयी हुईं। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उमाशंकर कुशवाहा को 1,131 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सैयदा शादाब फातिमा को 41,829 वोट, जबकि उमाशंकर कुशवाहा को 40,698 वोट मिले।
इस चुनाव के बाद राज्य में 2002 के चुनाव कराए गए। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के उमाशंकर विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजेंद्र को 716 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में उमाशंकर को 43,920 वोट, जबकि राजेंद्र को 43,204 वोट मिले। वहीं, भाजपा की ओमकला 32,818 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
2007: पहली सपा ने जीता चुनाव
इस विधानसभा चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) की सैयदा शादाब फातिमा विजयी हुईं। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उमाशंकर कुशवाहा को 1,131 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सैयदा शादाब फातिमा को 41,829 वोट, जबकि उमाशंकर कुशवाहा को 40,698 वोट मिले।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2012: सपा ने दोहराई जीत
2012 के चुनाव में गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विजय कुमार मिश्रा विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राज कुमार को महज 241 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विजय कुमार मिश्रा को 49,561 वोट, जबकि राज कुमार को 49,320 वोट मिले। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के अरुण कुमार सिंह 41,567 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: भाजपा ने दोहराई जीत
जबकि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इस लहर का असर गाजीपुर सदर विधानसभा सीट पर भी दिखा, जहां भाजपा की डॉ. संगीता बलवंत विजयी हुईं। उन्होंने सपा के राजेश कुशवाहा को 32,607 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में डॉ. संगीता बलवंत को 92,090 वोट, जबकि राजेश कुशवाहा को 59,483 वोट मिले। वहीं, बसपा के संतोष कुमार 54,987 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022: सपा ने की वापसी
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जयकिशन साहू विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की डॉ. संगीता बलवंत बिंद को 1,692 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जयकिशन साहू को 92,472 वोट, जबकि डॉ. संगीता बलवंत बिंद को 90,780 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के डॉ. राज कुमार सिंह गौतम 33,931 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2012 के चुनाव में गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विजय कुमार मिश्रा विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के राज कुमार को महज 241 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में विजय कुमार मिश्रा को 49,561 वोट, जबकि राज कुमार को 49,320 वोट मिले। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के अरुण कुमार सिंह 41,567 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2017: भाजपा ने दोहराई जीत
जबकि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इस लहर का असर गाजीपुर सदर विधानसभा सीट पर भी दिखा, जहां भाजपा की डॉ. संगीता बलवंत विजयी हुईं। उन्होंने सपा के राजेश कुशवाहा को 32,607 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में डॉ. संगीता बलवंत को 92,090 वोट, जबकि राजेश कुशवाहा को 59,483 वोट मिले। वहीं, बसपा के संतोष कुमार 54,987 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022: सपा ने की वापसी
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में गाजीपुर जिले की गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जयकिशन साहू विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की डॉ. संगीता बलवंत बिंद को 1,692 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जयकिशन साहू को 92,472 वोट, जबकि डॉ. संगीता बलवंत बिंद को 90,780 वोट मिले। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के डॉ. राज कुमार सिंह गौतम 33,931 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।