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Hindi News ›   Election ›   LS Polls: Fate played this game with the MP who had hung his kurta-pajama on peg Latest News Update

LS Polls: कुर्ता-पायजामा खूंटी पर टांग चुके सांसद के साथ भाग्य ने खेला ये खेल, सुबह होते ही दौड़े नामांकन करने

Tue, 07 May 2024 09:48 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Tue, 07 May 2024 09:48 PM IST
सार

आनन-फानन इसलिए छह मई ही नामांकन का आखिरी दिन था। कागज-पत्र सब तैयार करने थे। बसपा से सिंबल और कगज मिलना था। बसपा कोऑर्डिनेटर इसे लेकर जौनपुर के लिए निकल चुके थे।

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LS Polls: Fate played this game with the MP who had hung his kurta-pajama on peg Latest News Update
LS Polls - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानाति, कुतो मनुष्यः। संस्कृत का उपरोक्त उद्बोधन जौनपुर के बसपा प्रत्याशी श्याम सिंह यादव पर सटीक बैठता है। श्याम सिंह यादव 2019 में बसपा के टिकट पर सांसद बने थे। 2024 में उन्होंने टिकट मिलने की आस छोड़ दी थी। कुर्ता पायजामा बाकायदा खूंटी पर टांग दिया था। पिछले महीने फोन पर कहा, शांत, संयत, चिंतामुक्त जीना है। लेकिन समय और भाग्य की चाबी एक साथ लगी। रात 1.30 बजे को बसपा सुप्रीमो मायावती ने फोन करके बसपा का प्रत्याशी बना दिया। छह मई की सुबह जौनपुर के लोग उठे, तो उन्हें पता चला बाहुबली नेता, पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला का टिकट कट गया, श्याम सिंह आज नामांकन करेंगे। श्याम सिंह यादव की खुशी का ठिकाना नहीं था और आनन-फानन में नामांकन करने में जुट गए।  

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आनन-फानन इसलिए छह मई ही नामांकन का आखिरी दिन था। कागज-पत्र सब तैयार करने थे। बसपा से सिंबल और कगज मिलना था। बसपा कोऑर्डिनेटर इसे लेकर जौनपुर के लिए निकल चुके थे। इधर धनंजय सिंह के जौनपुर से लेकर गांव बनसफा के मकान तक उनके समर्थकों के फोन-भागदौड़ सब बढ़ गई थी। बढ़े भी क्यों न। एक दिन पहले ही पांच मई को धनंजय सिंह ने पत्नी के साथ जौनपुर में पार्टी के चुनाव कार्यालय का शुभारंभ किया था। इसमें बसपा के तमाम नेता मौजूद थे। जौनपुर के सूत्र बताते हैं कि इस दौरान प्रेसवार्ता में बसपा के नेताओं ने श्रीकला रेड्डी सिंह को ही पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बताया था और उन्हें बदले जाने की संभावना से इनकार किया था।
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धनंजय सिंह को थी टिकट कटने की आशंका
बरेली कारागार से जमानत पर छूटने के बाद धनंजय सिंह जौनपुर पुहंचे। धनंजय के जौनपुर पहुंचने के बाद लोकसभा सीट पर चुनाव और चुनाव का रोमांच अपने अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका था। लेकिन इसके साथ-साथ बसपा सुप्रीमो मायावती ने आजमगढ़ में पहले भीम राजभर को उतारा। फिर भीम को सलेमपुर से प्रत्याशी बनाकर सबीहा अंसारी को टिकट दिया। इसके बाद सबीहा का टिकट काटकर मशहूद अहमद को टिकट दे दिया। बसपा इसी तरह से कई लोकसभा सीटों का प्रत्याशी बदल रही थी। धनंजय सिंह के सूत्र लखनऊ तक गहराई से नजर रख रहे थे। उन्हें भी जौनपुर में प्रत्याशी के बदले जाने की आशंका सता रही थी। बसपा के नेता कहते हैं कि धनंजय सिंह ने खुद इस पर स्पष्टीकरण चाहा था। इस भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए बसपा के नेताओं ने जौनपुर में श्रीकला रेड्डी सिंह को अधिकृत उम्मीदवार बताया। उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता ने भी पांच मई को जौनपुर में खेला होने की जानकारी दी थी और बताते हैं कि देर रात पूरी पिक्चर बदल गई।
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क्यों बदल गई जौनपुर में चुनावी कहानी?
भाजपा के रणनीतिकारों को पता था कि धनंजय की पत्नी के चुनाव मैदान में बने रहने के बाद कृपाशंकर सिंह का चुनाव जीतना नामुमकिन है। कृपाशंकर सिंह भाजपा के प्रत्याशी हैं। कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। जौनपुर के मूल निवासी, महाराष्ट्र के नेता और कांग्रेस सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे हैं। जौनपुर के ठाकुर बिरादरी समेत गणमान्य लोगों से मिलना-जुलना था, लेकिन कभी जौनपुर के जमीनी नेता नहीं रहे। जबकि धनंजय सिंह का जौनपुर में अपना वोट बैंक है। भले बाहुबली हैं, लेकिन उनके समर्थक हैं। कुछ वर्गों में रॉबिन हुड की छवि है। 2017 में मल्हनी विधानसभा, 2019 में लोकसभा, 2022 में फिर मल्हनी विधानसभा चुनाव में अपनी हार का कारण भी भाजपा धनंजय सिंह के प्रत्याशी के रूप में खड़े हो जाने को ही मानती है। यह पूरा जौनपुर जानता भी है, मानता भी है। इस बार भी कृपाशंकर सिंह के नाम की घोषणा होते ही धनंजय सिंह ने एक ट्वीट किया, तो लखनऊ और दिल्ली तक राजनीति के प्याले में एक तूफान महसूस किया गया। कुछ दिन बाद ही धनंजय सिंह नमामि गंगे से जुड़ी परियोजना के मामले में अपने सहयोगी के साथ इंजीनियर को धमकाने के मामले में दोषी करार दिए गए। सात साल की सजा सुनाई गई। जेल भेज दिए गए। उनका खुद चुनाव लड़ने का सपना धरा रह गया, लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही बसपा ने उनकी पत्नी को बसपा का प्रत्याशी घोषित कर दिया। प्रत्याशी घोषित ही चुनाव फिर रोचक हो गया।

दरअसल श्रीकला सिंह रेड्डी के मैदान में बने रहने से भाजपा के प्रत्याशी कृपाशंकर सिंह की स्थिति बहुत कमजोर महसूस की जा रही थी। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बाबू सिंह कुशवाहा मजबूती से लड़ने वाले बताए जा रहे थे। बाबू सिंह कुशवाहा को टिकट मिलने के बाद ही बसपा ने श्रीकला को प्रत्याशी बनाया था। अंदरखाने में भाजपा के तमाम रणनीतिकार महसूस कर रहे थे कि जौनपुर में श्रीकला सिंह या कृपाशंकर सिंह में से एक को ही चुनाव लड़ना चाहिए। कृपाशंकर भाजपा के प्रत्याशी हैं, इसलिए उनका बैठना मुश्किल है और दोनों के प्रत्याशी बने रहने पर समाजवादी पार्टी बाजी मार ले जाएगी। हालांकि धनंजय सिंह 2009 में बसपा के टिकट पर सांसद बने थे। उनकी पत्नी उनके बूते ही जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। जौनपुर के कई ब्लाक प्रमुख, विधायक पर भी धनंजय का स्नेह, समर्थन है।

निरस्त हुआ श्रीकला रेड्डी सिंह का पर्चा
श्रीकला रेड्डी सिंह अब चुनाव नहीं लड़ेंगी। उनका पर्चा निरस्त हो गया है। धनंजय सिंह के करीबी नवीन सिंह के मुताबिक बसपा ने किसी दबाव में श्रीकला सिंह का टिकट काटा है। बसपा ऊपर से किसी दबाव में तमाम लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी बदल रही थी। ऐसा ही यहां हुआ? नवीन सिंह कहते हैं कि धनंजय सिंह के स्वभाव में नहीं है, यू टर्न लेना। लेकिन बसपा ने टिकट काटा तो क्या कर सकते हैं। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ने की संभावना पर कहा कि 10 प्रस्तावक होने चाहिए। नवीन सिंह के मुताबिक हम लोगों में 10 प्रस्तावक के साथ नामांकन नहीं किया था। इसलिए नामांकन रद्द हो गया। दरअसल बदल रही तमाम परिस्थितियों और भविष्य की उम्मीद को देखकर धनंजय सिंह ने इस परिवार में अपनी पत्नी को चुनाव न लड़वाने का निर्णय ले लिया। यही कारण रहा कि छह मई को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन की प्रक्रिया पूरी करने से बचे।

क्या दिल्ली और लखनऊ ने की कोई डील?
यह चर्चा जौनपुर में तेज है। कहा जा रहा है कि लखनऊ और दिल्ली इस समय लोकसभा की बची 54 सीटों (26 पर मतदान हो गए) पर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एनडीए के 80 लोकसभा जीतने का दावा कर रहे हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को अब किसी सीट पर कोई रिस्क मंजूर नहीं है। कहा यह भी जाता है कि लखनऊ को धनंजय सिंह या उनके परिवार को टिकट देने में कोई खास आपत्ति नहीं थी। उत्तर प्रदेश के एक उपमुख्यमंत्री भी पक्ष में थे, लेकिन दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में वीटो रखने में सक्षम एक नेता को थी। इस नेता के मन में बनी सोच के आगे कोई अपना तर्क रखने का साहस नहीं बना पा रहा था। लिहाजा जौनपुर में उपर्युक्त उम्मीदवार खोजा जा रहा था। जो नाम थे, उनमें आपस में काफी प्रतिस्पर्धा थी, लिहाजा केंद्रीय नेतृत्व ने कृपाशंकर सिंह को टिकट दिया था। माना जा रहा है कि अंतिम समय में दिल्ली ने लखनऊ को ईशारा किया है। किसी बड़े नेता ने यह भरोसा धनंजय सिंह तक भी पहुंचाया है। ताकि बसपा का टिकट कटने के बाद अब उनकी पत्नी जौनपुर लोकसभा सीट से नाम वापस ले लें। चुनाव न लड़ें। बताते हैं, ऐसा ही होगा। अभी इस बारे में धनंजय सिंह से कोई बात नहीं हो सकी है।


अब आइए श्याम सिंह यादव की तरफ चलते हैं
श्याम सिंह यादव पीसीएस अधिकारी रहे हैं। पहले वकील थे। विज्ञान के विद्यार्थी रहे। शूटिंग के मास्टर। पूर्व केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को कोचिंग दे चुके हैं। निशानेबाजी में राष्ट्रीय कोच रह चुके हैं। 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में बसपा के टिकट से उतरे और जीते। इस बार उन्होंने लोकसभा चुनाव से काफी पहले बसपा सुप्रीमो मायावती को फोन किया था। फोन का जवाब समय पर नहीं आया। थोड़ा निराश हुए। इस दौरान उम्दा सौम्य स्वभाव के श्याम सिंह यादव ने कुछ भाजपा नेताओं से संपर्क किया। इसके पीछे उनके मित्र भी थे। लेकिन कोई खास भरोसा नहीं मिला। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी शामिल हुए। अखिलेश यादव के पास भी अपने विकल्प को पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक कोई रोशनी नहीं दिखाई दी। निर्दलीय चुनाव लड़ने का कोई मतलब नहीं था। भाजपा द्वारा कृपाशंकर सिंह और समाजवादी पार्टी के बाबू सिंह कुशवाहा को मैदान में उतारने के बाद उन्होंने प्रत्याशी वाला कुर्ता पायजामा खूंटी पर टांगने का निर्णय ले लिया। हालांकि एक ज्योतिषी ने दावा किया था कि अभी आपका राजनीतिक भविष्य है। श्याम सिंह यादव तब हतप्रभ रह गए, जब उनके मोबाइल पर बसपा के एक नेता के फोन की घंटी बजी। सूचना मिली कि तैयारी कीजिए। अभी थोड़ी देर में बसपा प्रमुख फोन करने वाली हैं। कुछ देर बाद बसपा प्रमुख का फोन आ गया। अगले दिन श्याम सिंह यादव ने नामांकन कर दिया। हालांकि श्याम सिंह यादव की नजर बसपा की अधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति पर टिकी थी। यह विज्ञप्ति उनके नामांकन दाखिल करने के बाद छह मई को पांच बजे के बाद आई।

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