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बर्बाद हो रहे अर्जेंटीना से क्यों हो रही है भारत की तुलना, कैसे मिल रहे हैं हालात?

Mon, 02 Sep 2019 03:18 PM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया Updated Mon, 02 Sep 2019 03:18 PM IST
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Why Indian Economy is being compared with Argentina, What RBI and congress told BJP
सांकेतिक तस्वीर

भारतीय रिजर्व बैंक ने जब 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये भारत सरकार को देने का फैसला किया तो विपक्षी कांग्रेस ने चेताते हुए कहा कि भारत को अर्जेंटीना से सबक लेना चाहिए।

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दरअसल, अर्जेंटीना की सरकार ने अपने सेंट्रल बैंक को फंड देने के लिए मजबूर किया था। ये साल 2010 की बात है। अर्जेंटीना की सरकार ने सेंट्रल बैंक के तत्कालीन चीफ को बाहर कर बैंक के रिजर्व फंड का इस्तेमाल अपना कर्ज चुकाने के लिए किया था। अब भारत सरकार के रिजर्व बैंक से फंड लेने की तुलना अर्जेंटीना के अपने सेंट्रल बैंक से फंड लेने से की जा रही है।
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अर्जेंटीना लैटिन अमेरिका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रही है। लेकिन आज अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर में है। विश्लेषक मानते हैं कि अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने की शुरुआत तब ही हो गई थी जब सेंट्रल बैंक से जबर्दस्ती पैसा लिया गया था।
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भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 2018 में दिए अपने भाषण में अर्जेंटीना के उस प्रकरण का जिक्र किया था। विरल आचार्य ने जब अर्जेंटीना का जिक्र किया तब भी ये कयास लगाए गए थे कि केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक पर दबाव बना रही है।

जानें...अर्जेंटीना में क्या हुआ था?

जनवरी 2010 में अर्जेंटीना की सेंट्रल बैंक के प्रमुख मार्टिन रेड्राडो ने नाटकीय अंदाज में इस्तीफा दे दिया था। इससे कुछ दिन पहले ही सरकार ने उन्हें पद से हटाने की कोशिश भी की थी।

इस्तीफा देते हुए उन्होंने कहा था, 'सेंट्रल बैंक में मेरा समय समाप्त हो गया है, इसलिए मैंने इस पद को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया है। मुझे अपना काम पूरा करने पर संतोष है।'

उन्होंने कहा, 'हम इस स्थिति में सरकार की संस्थानों में लगातार दखल की वजह से पहुंचे हैं। मूल रूप से मैं दो सिद्धांतों का बचाव कर रहा हूं- सेंट्रल बैंक की निर्णय लेने में स्वतंत्रता और रिजर्व फंड का इस्तेमाल सिर्फ वित्तीय और मौद्रिक स्थिरता के लिए ही किया जाना चाहिए।'

राष्ट्रपति क्रिस्टीना फर्नांडेज की तत्कालीन सरकार ने दिसंबर 2009 में एक आदेश पारित किया था, जिसके तहत सेंट्रल बैंक के 6.6 अरब डॉलर सरकार को मिल जाते। सरकार का दावा था कि सेंट्रल बैंक के पास 18 अरब डॉलर का अतिरिक्त फंड है। रोड्राडो ने ये फंड सरकार को ट्रांसफर करने से इनकार किया था। इसका खामियाजा उन्हें अपना पद गंवाकर चुकाना पड़ा।

रेड्राडो के पद से हटने के बाद सरकार ने उनके डिप्टी मिगेल एंजेल पेसके को प्रमुख बना दिया था। उन्होंने वही किया जो सरकार चाहती थी। रेड्राडो के पद छोड़ने के बाद अर्जेंटीना की सेंट्रल बैंक की स्वतंत्रता भी सवालों के घेरे में आ गई थी।

न्यूयॉर्क के एक जज थॉमस ग्रीसा ने न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक में रखे अर्जेंटीना के सेंट्रल बैंक के 1.7 अरब डॉलर को फ्रीज करने का आदेश पारित कर दिया। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि अर्जेंटीना का सेंट्रल बैंक स्वायत्त एजेंसी नहीं रह गया है और देश की सरकार के इशारे पर काम कर रहा है।

गोल्डमैन सैक्स बैंक में अर्जेंटीना के विश्लेषक अल्बर्टो रामोस ने फरवरी 2010 में कहा था, 'सेंट्रल बैंक के रिजर्व फंड से सरकारी खर्चों की पूर्ति करना सकारात्मक कदम नहीं है।'

विरल आचार्य ने अर्जेंटीना से क्यों की थी भारत की तुलना

अर्जेंटीना के इन्हीं वाकयों का उल्लेख करते हुए विरल आचार्य ने कहा था कि एक अच्छी तरह से काम कर रही अर्थव्यवस्था के लिए एक स्वतंत्र सेंट्रल बैंक जरूरी है। यानी ऐसा सेंट्रल बैंक जो सरकार के दबाव से मुक्त हो।

विरल आचार्य ने कहा था कि सेंट्रल बैंक की स्वतंत्रता को कम करने के खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने कहा था कि ये सेल्फ गोल साबित हो सकता है, क्योंकि ये उन पूंजी बाजारों में विश्वास का संकट पैदा कर सकता है, जिनका इस्तेमाल सरकारें अपने खर्चे पूरा करने के लिए कर रही हों।

उन्होंने कहा था, 'जो सरकारें सेंट्रल बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करेंगी, उन्हें आज नहीं तो कल वित्तीय बाजारों का क्रोध झेलना होगा। उस दिन को कोसना होगा जिस दिन उन्होंने इस अहम नियामक संस्था की स्वतंत्रता से खिलवाड़ किया।'

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने दिसंबर 2018 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कहा था कि वो निजी कारणों से इस्तीफा दे रहे हैं। लेकिन माना गया था कि उन पर सरकार के इशारों पर चलने का दबाव था।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक टिप्पणी में कहा था, 'सरकार को समझना चाहिए की उर्जित पटेल ने इस्तीफा क्यों दिया।'

उर्जित पटेल के बाद शक्तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर बनाया गया। आरबीआई गवर्नर का पद संभालने से पहले वो 2015 से 2017 तक आर्थिक मामलों के सचिव भी रह चुके हैं। आईएएस शक्तिकांत दास नरेंद्र मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले से सहमत थे।

एक वरिष्ठ पत्रकार के ने कहा था, 'जिस दिन शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर बने, उसी दिन साH हो गया था कि सरकार जो चाहेगी उसे आरबीआई को करना होगा।'

अब शक्तिकांत दास ने विमल जालान समिति की सिफारिश पर सरकार को रिजर्व बैंक का वो पैसा दे दिया है जिसे सरकार हासिल करना चाहती थी।

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भारत और अर्जेंटीना के घटनाक्रम में फर्क ये है कि अर्जेंटीना की सरकार ने आदेश पारित कर सेंट्रल बैंक से पैसा लिया। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने विमल जालान समिति की सिफारिश पर सरकार को पैसा दिया।

रेड्राडो ने अपना इस्तीफा देते वक्त सरकार को आड़े हाथों लिया था। लेकिन उर्जित पटेल निजी कारण बताकर किनारे हो गए। लेकिन दोनों के ही बाद पद संभालने वाले प्रमुखों ने वही किया जो सरकार चाहती थी।

अब कैसी है अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था की हालत?

2003 से 2007 तक राष्ट्रपति रहे नेस्टर कीर्चनर के शासनकाल में अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था कुछ स्थिर हुई। 2007 में अर्जेंटीना ने आईएमएफ (IMF - International Monetary Fund) से लिया पूरा कर्ज चुका दिया था।

लेकिन कीर्चनर के बाद राष्ट्रपति बनीं उनकी पत्नी क्रिस्टीना फर्नांडेज के काल में अर्थव्यवस्था फिर अस्थिर हो गई। क्रिस्टीना ने ही आदेश पारित कर देश की सेंट्रल बैंक का पैसा ले लिया था।

क्रिस्टीना फर्नांडेज के बाद अक्टूबर 2015 में अर्जेंटीना के लोगों ने मॉरीसियो मैकरी को नया राष्ट्रपति चुना था। उम्मीद थी कि वो इस दक्षिण अमेरिकी देश की अर्थव्यवस्था को एक स्थिर रास्ते पर ले आएंगे।

उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करके गरीबी को पूरी तरह खत्म करने का वादा किया था। लेकिन 2018 आते-आते हालात ये हो गए कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज मांगना पड़ा।

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देश की मुद्रा दिन प्रतिदिन गिरती रही और महंगाई बढ़ती गई। रोजमर्रा का जीवनयापन महंगा होता गया। 2015 में एक डॉलर के बदले 10 पेसो मिलते थे। अब एक डॉलर के बदले 60 पेसो मिलते हैं।

तमाम कोशिशों के बावजूद मैकरी सरकार महंगाई कम नहीं कर सकी है। खर्च कम करने और कर्ज कम लेने के जिन आर्थिक सुधारों का वादा किया गया था, वे लागू नहीं हो सके।

बढ़ती महंगाई और सर्वजनिक खर्च में कटौती की वजह से आमदनी कीमतों की तुलना में नहीं बढ़ी। जिसकी वजह से अधिकतर लोग गरीब हो गए। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश की एक तिहाई आबादी अब गरीबी में रह रही है।

अब अर्जेंटीना लगातार जटिल हो रहे आर्थिक संकट में फंस गया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता नजर नहीं आ रहा है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने देश के दीवालिया होने का अंदेशा जाहिर कर दिया है।

...और भारत में कैसे हैं हालात?

भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार टूट रहा है। बेरोजगारी दर बीते 45 सालों में सर्वोच्च स्तर पर है। जीडीपी की दर सात सालों में सबसे कम होकर सिर्फ पांच प्रतिशत रह गई है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत स्पष्ट नजर आ रहे हैं।

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