Self-Happiness: अपनों को खुश करने की दौड़ में खुद को न भूलें, जानें क्यों जरूरी है आत्म-संतोष
Emotional balance: हम अक्सर दूसरों की खुशी के लिए इतना कुछ करने लगते हैं कि अपनी भावनाओं और जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन खुद की खुशी भी उतनी ही जरूरी है, वरना अंदर ही अंदर नाराजगी और असंतोष पनपने लगता है, जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
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Self-Satisfaction: अक्सर देखा जाता है कि कई लोग दूसरों को खुश करने के लिए अपनी खुद की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं। यह आदत या तो बचपन से आती है या डर अथवा तनाव के कारण। दूसरों की खुशियों का ख्याल रखना बेशक एक अच्छी सोच है, लेकिन अगर हमेशा दूसरों को ही अहमियत दी जाए, तो धीरे-धीरे इससे खुद में नाराजगी और असंतोष की भावना पैदा हो सकती है। अगर आपको भी खुद से ज्यादा दूसरों को प्राथमिकता देने की आदत है, तो जरूरत है कि आप अपने लिए कुछ सीमाएं तय करें। कुछ आसान टिप्स हैं, जिनकी मदद से आप अपनी इस आदत को बदल सकते हैं और दूसरों के साथ-साथ खुद को भी खुश रख सकते हैं।
विरोध से मत डरिए
लोगों से ना कहना सीखिए। हो सकता है जब आप पहली बार किसी बात के लिए ‘ना’ कहें, तो लोग आपसे नाराज हो सकते हैं या आपका विरोध कर सकते हैं, खासकर अगर वे हमेशा आपसे ‘हां’ सुनते आए होंं। ऐसे में, विरोध से घबराने की बजाय, अपनी बात शांति और सम्मान के साथ रखें। आप उनसे कह सकते हैं कि जो मैं कहने जा रहा हूं, वह शायद आपको अच्छा न लगे, लेकिन यह मेरे लिए जरूरी है।इससे सामने वाले को आपको समझने में आसानी होगी। हो सकता है शुरुआत में लोगों को यह बुरा भी लगे, लेकिन धीरे-धीरे वे आपकी इस सोच का सम्मान करने लगेंगे। इस तरह आप बिना डरे, प्यार से और पूरी दृढ़ता के साथ अपने लिए बोल सकते हैं।
अपनी बात कहने का हौसला
अगर आप किसी की नाराजगी के डर से अपनी जरूरतें छिपा रहे हैं, तो आपको इस मानसिकता से बाहर निकलने की जरूरत है। जैसे, अगर आप ऑफिस में वेतन बढ़ाने की बात करना चाहते हैं, लेकिन बॉस के नाराज होने के डर से चुप रहते हैं, तो आप खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। बॉस क्या सोचेंगे, इस पर ध्यान देने की बजाय सोचिए कि आप वेतन क्यों बढ़वाना चाहते हैं? इसके उचित कारणों के साथ उनसे बात करें। जब आप अपनी जरूरतों को ध्यान में रखकर ऐसा करेंगे, तो आपके अंदर बात कहने का हौसला भी बढ़ेगा।
लोगों को खोने का डर
कई बार यह आदत इस वजह से भी होती है कि आपको डर होता है कि कहीं उस इन्सान से आपके रिश्ते बिगड़ न जाएं। अक्सर इसी डर से आप अपनी जरूरतें भुलाकर दूसरों की हर बात मानते जाते हैं। कई बार यह आदत बचपन के बुरे अनुभव, परिवारिक समस्याएं या मानसिक आघात की वजह से भी बन जाती है। अगर आपको लगता है कि लोगों को खुश करने की आदत आपकी खुशियों, रिश्तों या मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है और चाहकर भी आपको इससे छुटकारा नहीं मिल पा रहा है, तो किसी अच्छे सलाहकार या थेरेपिस्ट से मदद लेने में झिझक न दिखाएं।
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