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जब नहीं हुआ था जीरो का अविष्कार, जोड़-घटाव के लिए होता था इसका इस्तेमाल
Wed, 11 Sep 2019 10:53 AM IST
Garima Garg
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: Garima Garg
Updated Wed, 11 Sep 2019 10:53 AM IST
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क्या आप सोच सकते हैं गणित को बिना शून्य के? कल्पना करना भी मुश्किल है। हम उस समय की बात कर रहे हैं जब मैथ्स बिना शून्य के चलती थी। आपको क्या लगता है चांद पर पहुंचना आसान था? इसके पीछे भी शून्य का ही खेल था। शून्य से न केवल वैज्ञानिकों को दूरी का अंदाजा हुआ बल्कि इसी की वजह से नंबर भी जोड़े और घटाए गए।
अगर शून्य के जन्म की बात करें तो सन् 498 में इसका अविष्कार माना जाता है। किसी भी तरह का निर्माण शून्य अर्थात कार्य गणित के बिना होना मुश्किल है। जबकि इससे पहले 2560 ईसा पूर्व में मिस्र के लोगों ने मशहूर पिरामिड बना डाला। वहीं, चीन की दीवार भी 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में ही बननी शुरू हो गई थी।
अब आप सोच रहे होंगे कि जब शून्य के बिना जोड़-घटाव मुश्किल है तो इतने बड़े-बड़े निर्माण कैसे होते थे, इसी की जानकारी हम आपको यहां दे रहे हैं। वजह बेहद दिलचस्प है...
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अगर शून्य के जन्म की बात करें तो सन् 498 में इसका अविष्कार माना जाता है। किसी भी तरह का निर्माण शून्य अर्थात कार्य गणित के बिना होना मुश्किल है। जबकि इससे पहले 2560 ईसा पूर्व में मिस्र के लोगों ने मशहूर पिरामिड बना डाला। वहीं, चीन की दीवार भी 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में ही बननी शुरू हो गई थी।
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न जाने कितने सालों से लोग गिनती के लिए उंगलियों का इस्तेमाल कर रहे थे। चूंकि हाथ की अंगुलियां 10 होती हैं इसलिए जीरो से पहले लोग दस अंको का ज्ञान समझते थे। पर हां, लोगों को उन्हें लिखना नहीं आता था। अंको की समझ होने के बाद वे उन्हें एक रूप नहीं दे पा रहे थे। उन्हें ये रूप भारत ने दिया, जीरो के अविष्कार से।
होता था एबैकस का प्रयोग-
बता दें कि जीरो की खोज से पहले ही ग्रीक के लोग जीरो के बारे में जानते थे पर वे लोग इसे एक अंक नहीं मानते थे। द गार्जियन में छपी रिपोर्ट में George Auckland और Martin Gorst ने बताया कि इस वक्त बिना अंकों के रोमन में जोड़-घटाव होता था। बता दें कि वे एबैकस या फ्रेम का प्रयोग करते थे। उस वक्त जीरो की जगह पर डॉट का यूज करते थे। बाद में डॉट की जगह शून्य नेे ले ली थी।
चीन में होता था डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग-
चीन में जीरो की जगह कॉलम का इस्तेमाल किया गया। बता दें जोड़-घटा के लिए डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग करते थे। चूंकि उस वक्त बड़े अंक लिखना मुश्किल था इसलिए वे अंकों के स्थान पर चित्रों का इस्तेमाल करते थे।
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बता दें कि जीरो की खोज से पहले ही ग्रीक के लोग जीरो के बारे में जानते थे पर वे लोग इसे एक अंक नहीं मानते थे। द गार्जियन में छपी रिपोर्ट में George Auckland और Martin Gorst ने बताया कि इस वक्त बिना अंकों के रोमन में जोड़-घटाव होता था। बता दें कि वे एबैकस या फ्रेम का प्रयोग करते थे। उस वक्त जीरो की जगह पर डॉट का यूज करते थे। बाद में डॉट की जगह शून्य नेे ले ली थी।
चीन में होता था डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग-
चीन में जीरो की जगह कॉलम का इस्तेमाल किया गया। बता दें जोड़-घटा के लिए डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग करते थे। चूंकि उस वक्त बड़े अंक लिखना मुश्किल था इसलिए वे अंकों के स्थान पर चित्रों का इस्तेमाल करते थे।
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