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विश्व कपास दिवस: भारत में कपास का इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता से क्या है इसका कनेक्शन, क्यों कहते हैं सफेद सोना?
Wed, 07 Oct 2026 06:27 AM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Wed, 07 Oct 2026 06:27 AM IST
सार
World Cotton Day: कपास की कहानी हजारों साल पुरानी है। मेहरगढ़ और मोहनजोदड़ो से मिले प्रमाण बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से कपास के रेशे और कपड़े का इस्तेमाल होता था। हड़प्पा सभ्यता से लेकर ब्रिटिश दौर और गांधी के चरखे तक कपास भारत के इतिहास, व्यापार, अर्थव्यवस्था और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रही है। आज भी यह भारत की महत्वपूर्ण कृषि फसलों में शामिल है।
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World Cotton Day
- फोटो : AI Generated
विस्तार
आज कपास हमारे कपड़ों, तौलियों, चादरों और घर में इस्तेमाल होने वाली कई चीजों का हिस्सा है। लेकिन इसकी कहानी केवल आधुनिक कपड़ा उद्योग तक सीमित नहीं है। कपास का रिश्ता मानव सभ्यता के बेहद पुराने दौर से जुड़ा है। पुरातात्विक शोध बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में कपास के रेशों और कपड़े के इस्तेमाल के प्रमाण हजारों साल पुराने हैं। मेहरगढ़ में करीब छठी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के कपास के रेशे मिले हैं, जबकि मोहनजोदड़ो में लगभग 3000 से 2750 ईसा पूर्व का कपड़े का टुकड़ा मिला था। यानी कपास की कहानी सिंधु घाटी सभ्यता के दौर तक पहुंचती है।
भारत में कपास के इस्तेमाल की शुरुआत की कोई एक निश्चित तारीख बताना मुश्किल है, क्योंकि पौधे की खेती, रेशे के इस्तेमाल और कपड़ा बनाने के अलग-अलग प्रमाण अलग-अलग समय के हैं। शोध में भारतीय उपमहाद्वीप में कपास की प्राचीनता चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक बताई गई है। खास बात यह है कि मेहरगढ़ से मिले कपास के रेशों के प्रमाण इससे भी पुराने हैं। इससे पता चलता है कि सिंधु नदी क्षेत्र में रहने वाले समुदाय कपास के रेशों से परिचित थे और उनका इस्तेमाल करते थे। बाद में हड़प्पा सभ्यता में कपास की खेती और वस्त्र निर्माण अधिक विकसित रूप में दिखाई देता है।
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भारत में कपास के इस्तेमाल की शुरुआत की कोई एक निश्चित तारीख बताना मुश्किल है, क्योंकि पौधे की खेती, रेशे के इस्तेमाल और कपड़ा बनाने के अलग-अलग प्रमाण अलग-अलग समय के हैं। शोध में भारतीय उपमहाद्वीप में कपास की प्राचीनता चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक बताई गई है। खास बात यह है कि मेहरगढ़ से मिले कपास के रेशों के प्रमाण इससे भी पुराने हैं। इससे पता चलता है कि सिंधु नदी क्षेत्र में रहने वाले समुदाय कपास के रेशों से परिचित थे और उनका इस्तेमाल करते थे। बाद में हड़प्पा सभ्यता में कपास की खेती और वस्त्र निर्माण अधिक विकसित रूप में दिखाई देता है।
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मेहरगढ़ में क्या मिला था?
मेहरगढ़ आज के पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित पुरातात्विक स्थल है और यह सिंधु घाटी सभ्यता से पहले के प्राचीन कृषि समुदायों को समझने में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां से मिले कपास के रेशों के धागे तांबे के मोतियों को पिरोने के लिए इस्तेमाल किए गए थे। शोध के अनुसार ये रेशे छठी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के पहले भाग यानी लगभग 6000 से 5500 ईसा पूर्व के माने जाते हैं। इसका मतलब यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में कपास के रेशे का इस्तेमाल हड़प्पा सभ्यता के शहरी दौर से भी पहले शुरू हो चुका था।
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