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यूपीएससी: लंदन से शुरू हुआ सफर कैसे बना देश की सबसे बड़ी परीक्षा, वो कहानी जो हर अभ्यर्थी को पता होनी चाहिए
Thu, 01 Oct 2026 12:20 PM IST
शिवम तिवारी
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Thu, 01 Oct 2026 12:20 PM IST
सार
यूपीएससी ने 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए। जानें 1855 की आईसीएस परीक्षा से लेकर 1926 में सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना और संवैधानिक संस्था बनने तक का पूरा इतिहास।
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1 अक्टूबर 1926 को पहली सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना क्यों की गई?
- फोटो : AI Generated
विस्तार
आज जब लाखों युवा सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते हैं, तो उनके सामने यूपीएससी यानी संघ लोक सेवा आयोग का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लेकिन क्या आपको पता है कि जिस संस्था को आज भारत में सरकारी सेवाओं में भर्ती की सबसे अहम संवैधानिक संस्थाओं में गिना जाता है, उसकी शुरुआत आज से ठीक 100 साल पहले एक अलग रूप में हुई थी। 1 अक्टूबर 1926 को भारत में पहली सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना हुई थी। उस समय यह कोई स्वतंत्र संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि एक सलाहकार निकाय था।
यूपीएससी का यह सफर केवल परीक्षा और सरकारी नौकरी की कहानी नहीं है। इसके पीछे ब्रिटिश शासन के दौर की आईसीएस परीक्षा, भारतीयों के लिए सीमित अवसर, सत्येंद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक सफलता, इलाहाबाद में पहली बार परीक्षा आयोजित होने, ली आयोग की सिफारिशों और आजादी के बाद संविधान में मिली जगह की पूरी कहानी जुड़ी है। 1 अक्टूबर 2026 को यूपीएससी ने इस संस्थागत यात्रा के 100 साल पूरे कर लिए हैं।
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1926 में बना सार्वजनिक सेवा आयोग आज के यूपीएससी जैसा शक्तिशाली और स्वतंत्र निकाय नहीं था। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति लंदन में मौजूद ब्रिटिश सरकार के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट द्वारा की जाती थी। यानी आयोग की संरचना और अधिकार उस समय ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हुए थे।
यह आयोग सरकारी सेवाओं में भर्ती की दिशा में एक स्थायी संस्थागत कदम था, लेकिन इसके अधिकार सीमित थे। यही वजह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई नेताओं ने इसकी सीमाओं और स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए। फिर भी भारत में एक स्थायी भर्ती निकाय का अस्तित्व में आना महत्वपूर्ण बदलाव था। यूपीएससी अपनी संस्थागत इतिहास की शुरुआत इसी 1926 के आयोग से मानता है।
बाद में आयोग का भारतीय केंद्र 1928 में दिल्ली में ही दूसरी जगह स्थानांतरित हुआ। हालांकि मेटकाफ हाउस का नाम आज भी यूपीएससी के शुरुआती इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसलिए जब यूपीएससी के 100 साल के सफर की बात होती है, तो 1926 का आयोग और मेटकाफ हाउस दोनों महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाते हैं।
इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में अधिकारियों के चयन में नामांकन की व्यवस्था प्रमुख थी। 1855 में खुली प्रतियोगिता की शुरुआत को योग्यता आधारित भर्ती की दिशा में बड़ा बदलाव माना गया। हालांकि उस समय इस परीक्षा तक भारतीयों की पहुंच बेहद सीमित थी।
परीक्षा केवल लंदन में आयोजित होती थी। परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी था और इसमें ग्रीक तथा लैटिन जैसे विषयों की भी परीक्षा होती थी। भारत से लंदन जाकर ऐसी परीक्षा देना अधिकांश भारतीय उम्मीदवारों के लिए आसान नहीं था। इसलिए कागज पर परीक्षा खुली प्रतियोगिता थी, लेकिन व्यवहार में भारतीयों के लिए इसमें प्रवेश करना बेहद कठिन था।
सत्येंद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश शासन की उस उच्च प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया, जिसे उस समय बेहद प्रतिष्ठित माना जाता था। उन्होंने बॉम्बे प्रेसिडेंसी में 30 साल से अधिक समय तक सेवा की। उनकी सफलता के छह साल बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रोमेश चंद्र दत्त जैसे भारतीय भी आईसीएस में पहुंचे।
लेकिन भारतीयों के लिए रास्ता आसान नहीं था। परीक्षा में शामिल होने की अधिकतम आयु धीरे-धीरे 23 साल से घटाकर 19 साल कर दी गई। इससे भारतीय उम्मीदवारों के पास तैयारी के लिए उपलब्ध समय और कम हो गया। 1919 तक 1,255 आईसीएस अधिकारियों में केवल 78 भारतीय थे।
इसके बाद 1922 में पहली बार आईसीएस परीक्षा भारत में आयोजित हुई। परीक्षा इलाहाबाद में हुई और उसी समय लंदन में भी परीक्षा आयोजित की गई। भारत में परीक्षा का आयोजन भारतीय उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि अब उन्हें परीक्षा देने के लिए अनिवार्य रूप से इंग्लैंड जाने की जरूरत नहीं थी।
यही बदलाव आगे चलकर भारत में सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। परीक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे भारत के प्रशासनिक ढांचे के भीतर आने लगी।
ली आयोग ने अधिकारियों की भर्ती को लेकर एक अनुपात भी प्रस्तावित किया। इसके अनुसार हर 10 नए प्रवेशों में चार ब्रिटिश, चार भारतीय और दो ऐसे भारतीय होने चाहिए थे जिन्हें प्रांतीय सेवाओं से पदोन्नत किया जाए।
कागज पर यह व्यवस्था भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में दिखाई देती थी। लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार व्यवहार में ब्रिटिश उम्मीदवारों के लिए 40 प्रतिशत हिस्सेदारी जन्म के आधार पर सुनिश्चित थी, न कि खुली प्रतियोगिता के आधार पर। इस कारण भर्ती व्यवस्था में समान अवसर को लेकर सवाल बने रहे।
आयोग के पास सीमित अधिकार थे। वह आज के यूपीएससी की तरह पूरी तरह स्वतंत्र संवैधानिक संस्था नहीं था। उसकी भूमिका और शक्तियां ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के दायरे में थीं। इसी कारण स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं ने आयोग की सीमित शक्तियों की आलोचना की।
फिर भी 1926 का गठन ऐतिहासिक था। पहली बार भारत में एक स्थायी भर्ती संस्था मौजूद थी, जिसका काम सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों से जुड़ी प्रक्रिया में भूमिका निभाना था। यही वजह है कि आज यूपीएससी अपनी 100 साल की संस्थागत यात्रा की शुरुआत 1926 से मानता है।
सार्वजनिक सेवा आयोग को भी इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अब सरकारी सेवाओं में नियुक्ति का उद्देश्य किसी औपनिवेशिक प्रशासन को चलाने के बजाय स्वतंत्र भारत के प्रशासन के लिए योग्य अधिकारियों का चयन करना था।
इसी बदलाव ने आयोग को एक ऐसी संस्था का स्वरूप देने की जमीन तैयार की, जिसकी स्वतंत्रता राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से अलग रहकर निष्पक्ष भर्ती सुनिश्चित करने के लिए जरूरी मानी गई।
बाद में यही प्रावधान संविधान के भाग 14 में शामिल हुए। इसमें अनुच्छेद 315 से 323 तक संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधान रखे गए। इस व्यवस्था ने लोक सेवा आयोगों को संवैधानिक आधार दिया।
इसका मूल उद्देश्य सरकारी सेवाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया को एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था देना था, जिसमें योग्यता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को महत्व मिले।
अनुच्छेद 315 से 323 के बीच आयोगों की संरचना, सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल, हटाने की प्रक्रिया, कार्यों और रिपोर्ट से जुड़े विभिन्न संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं।
इस संवैधानिक व्यवस्था का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि सरकारी सेवाओं में भर्ती करने वाली संस्था को ऐसी स्थिति मिले जहां वह अपने निर्धारित कार्यों को संस्थागत स्वतंत्रता के साथ कर सके।
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने विदाई भाषण के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता को सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी बताया था। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया जो नौकरी में पक्षपात, भाई-भतीजावाद और अनुचित प्रभाव से बचा सके।
यानी आयोग की स्वतंत्रता केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी, बल्कि सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखने से भी जुड़ी थी।
इन परीक्षाओं के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अधिकारियों और पेशेवरों का चयन किया जाता है। यानी यूपीएससी का काम केवल एक परीक्षा आयोजित करना नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार से जुड़ी विभिन्न सेवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया संचालित करना भी है।
सिविल सेवा परीक्षा जैसे मामलों में प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा और फिर साक्षात्कार या व्यक्तित्व परीक्षण का चरण आता है। इन चरणों में उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर अंतिम चयन प्रक्रिया पूरी होती है।
अलग-अलग सेवाओं के लिए पात्रता, परीक्षा पैटर्न, विषय, आयु सीमा और चयन प्रक्रिया अलग हो सकती है। इसलिए उम्मीदवारों के लिए संबंधित परीक्षा की आधिकारिक अधिसूचना और नियमों को देखना जरूरी होता है।
यूपीएससी केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है। सिविल सेवा परीक्षा के जरिए आईएएस के अलावा भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए भी उम्मीदवारों का चयन होता है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि यूपीएससी और आईएएस एक ही चीज हैं। यूपीएससी भर्ती प्रक्रिया संचालित करने वाली संवैधानिक संस्था है, जबकि आईएएस उन सेवाओं में से एक है जिनमें उम्मीदवारों का चयन सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।
आयोग की संवैधानिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सरकारी सेवाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया को संस्थागत और निष्पक्ष बनाया जाए। यही कारण है कि यूपीएससी को केवल परीक्षा कराने वाली संस्था के रूप में देखना इसकी पूरी भूमिका को नहीं बताता।
परीक्षा प्रणाली भी समय के साथ बदली है। ब्रिटिश दौर की आईसीएस परीक्षा में लंदन, अंग्रेजी, ग्रीक और लैटिन जैसे विषयों की बाधाएं भारतीय उम्मीदवारों के लिए बड़ी चुनौती थीं। बाद में परीक्षा भारत में भी होने लगी और स्वतंत्र भारत में भर्ती व्यवस्था को देश की प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित किया गया।
आज यूपीएससी विभिन्न सेवाओं के लिए अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करता है। आवेदन से लेकर परीक्षा, परिणाम, आगे के चरण और अंतिम चयन तक पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत संचालित होती है।
1855 में लंदन से शुरू हुई आईसीएस परीक्षा, 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक सफलता, 1919 के भारत सरकार अधिनियम, 1922 में इलाहाबाद में पहली आईसीएस परीक्षा, 1924 के ली आयोग और 1 अक्टूबर 1926 को सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना जैसे पड़ाव इस यात्रा की नींव बने।
इसके बाद 1949 में संविधान सभा में लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया और संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 के जरिए उन्हें संवैधानिक आधार मिला। 2026 में यूपीएससी इसी संस्थागत यात्रा के 100 साल पूरे कर चुका है।
यानी आज जिस यूपीएससी को प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी सेवाओं और लाखों अभ्यर्थियों के सपनों से जोड़कर देखा जाता है, उसके पीछे एक सदी से ज्यादा लंबा इतिहास है। यह इतिहास केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि भारत में सरकारी सेवाओं में भर्ती की व्यवस्था के धीरे-धीरे बदलने और संवैधानिक रूप लेने की कहानी भी है।
इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस के अधिकारी भी इस पुनर्व्यवस्था का हिस्सा बने। उपलब्ध विवरण के अनुसार 1947 में आईसीएस में कुल 980 अधिकारी थे, जिनमें 468 यूरोपीय, 352 हिंदू और 101 मुस्लिम अधिकारी शामिल थे, जबकि अन्य समुदायों के अधिकारी भी थे। विभाजन के बाद आईसीएस कैडर दोनों देशों में अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं में चला गया। भारत में आगे चलकर आईसीएस की जगह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस विकसित हुई, जबकि पाकिस्तान ने अपनी सिविल सेवा व्यवस्था तैयार की। प्रांतीय सेवाओं में भी क्षेत्र के आधार पर बदलाव हुए और विभाजन के कारण बड़ी संख्या में अधिकारियों व कर्मचारियों को अपने पद, स्थान या देश बदलने की स्थिति का सामना करना पड़ा।
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यूपीएससी का यह सफर केवल परीक्षा और सरकारी नौकरी की कहानी नहीं है। इसके पीछे ब्रिटिश शासन के दौर की आईसीएस परीक्षा, भारतीयों के लिए सीमित अवसर, सत्येंद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक सफलता, इलाहाबाद में पहली बार परीक्षा आयोजित होने, ली आयोग की सिफारिशों और आजादी के बाद संविधान में मिली जगह की पूरी कहानी जुड़ी है। 1 अक्टूबर 2026 को यूपीएससी ने इस संस्थागत यात्रा के 100 साल पूरे कर लिए हैं।
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यूपीएससी की शुरुआत कब और क्यों हुई?
भारत में सार्वजनिक सेवा आयोग की शुरुआत 1 अक्टूबर 1926 को हुई। इसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं में भर्ती से जुड़ी व्यवस्था को एक संस्थागत रूप देना था। इससे पहले ब्रिटिश शासन के दौरान उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों के चयन की व्यवस्था अलग तरीके से चलती थी। खास तौर पर आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विस में प्रवेश के लिए लंदन में प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जाती थी।
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1926 में बना सार्वजनिक सेवा आयोग आज के यूपीएससी जैसा शक्तिशाली और स्वतंत्र निकाय नहीं था। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति लंदन में मौजूद ब्रिटिश सरकार के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट द्वारा की जाती थी। यानी आयोग की संरचना और अधिकार उस समय ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हुए थे।
1926 में आयोग कैसा था?
1926 में गठित आयोग की अध्यक्षता सर रॉस बार्कर ने की थी। वह यूनाइटेड किंगडम की होम सिविल सर्विस से जुड़े थे। उनके साथ आयोग में चार सदस्य थे। उस समय आयोग का कार्यालय दिल्ली के मेटकाफ हाउस में बनाया गया था।यह आयोग सरकारी सेवाओं में भर्ती की दिशा में एक स्थायी संस्थागत कदम था, लेकिन इसके अधिकार सीमित थे। यही वजह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई नेताओं ने इसकी सीमाओं और स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए। फिर भी भारत में एक स्थायी भर्ती निकाय का अस्तित्व में आना महत्वपूर्ण बदलाव था। यूपीएससी अपनी संस्थागत इतिहास की शुरुआत इसी 1926 के आयोग से मानता है।
मेटकाफ हाउस का क्या कनेक्शन है?
दिल्ली का मेटकाफ हाउस यूपीएससी के शुरुआती इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। 1926 में स्थापित सार्वजनिक सेवा आयोग का कार्यालय यहीं बनाया गया था। उस दौर में यह आयोग की प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र था।बाद में आयोग का भारतीय केंद्र 1928 में दिल्ली में ही दूसरी जगह स्थानांतरित हुआ। हालांकि मेटकाफ हाउस का नाम आज भी यूपीएससी के शुरुआती इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसलिए जब यूपीएससी के 100 साल के सफर की बात होती है, तो 1926 का आयोग और मेटकाफ हाउस दोनों महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाते हैं।
आईसीएस परीक्षा की शुरुआत कैसे हुई?
यूपीएससी की कहानी समझने के लिए आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विस की कहानी को समझना जरूरी है। 1855 में आईसीएस परीक्षा की शुरुआत लंदन में हुई थी। इसका उद्देश्य सरकारी सेवा में अधिकारियों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था लाना था।इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में अधिकारियों के चयन में नामांकन की व्यवस्था प्रमुख थी। 1855 में खुली प्रतियोगिता की शुरुआत को योग्यता आधारित भर्ती की दिशा में बड़ा बदलाव माना गया। हालांकि उस समय इस परीक्षा तक भारतीयों की पहुंच बेहद सीमित थी।
परीक्षा केवल लंदन में आयोजित होती थी। परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी था और इसमें ग्रीक तथा लैटिन जैसे विषयों की भी परीक्षा होती थी। भारत से लंदन जाकर ऐसी परीक्षा देना अधिकांश भारतीय उम्मीदवारों के लिए आसान नहीं था। इसलिए कागज पर परीक्षा खुली प्रतियोगिता थी, लेकिन व्यवहार में भारतीयों के लिए इसमें प्रवेश करना बेहद कठिन था।
सत्येंद्रनाथ टैगोर की कहानी क्या है?
इस कठिन व्यवस्था के बीच सत्येंद्रनाथ टैगोर की सफलता ऐतिहासिक मानी जाती है। वह 21 साल की उम्र में 1862 में कलकत्ता से इंग्लैंड गए थे। उन्होंने 1863 में आईसीएस परीक्षा पास की और 1864 में सेवा में शामिल हुए। वह इस सेवा में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।सत्येंद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश शासन की उस उच्च प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया, जिसे उस समय बेहद प्रतिष्ठित माना जाता था। उन्होंने बॉम्बे प्रेसिडेंसी में 30 साल से अधिक समय तक सेवा की। उनकी सफलता के छह साल बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रोमेश चंद्र दत्त जैसे भारतीय भी आईसीएस में पहुंचे।
लेकिन भारतीयों के लिए रास्ता आसान नहीं था। परीक्षा में शामिल होने की अधिकतम आयु धीरे-धीरे 23 साल से घटाकर 19 साल कर दी गई। इससे भारतीय उम्मीदवारों के पास तैयारी के लिए उपलब्ध समय और कम हो गया। 1919 तक 1,255 आईसीएस अधिकारियों में केवल 78 भारतीय थे।
पहली बार भारत में परीक्षा कब हुई?
समय के साथ भारत में भी यह मांग तेज हुई कि सरकारी सेवाओं में भर्ती की परीक्षा भारत में आयोजित होनी चाहिए। इसी दबाव के बीच 1919 के भारत सरकार अधिनियम में सार्वजनिक सेवा आयोग की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।इसके बाद 1922 में पहली बार आईसीएस परीक्षा भारत में आयोजित हुई। परीक्षा इलाहाबाद में हुई और उसी समय लंदन में भी परीक्षा आयोजित की गई। भारत में परीक्षा का आयोजन भारतीय उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि अब उन्हें परीक्षा देने के लिए अनिवार्य रूप से इंग्लैंड जाने की जरूरत नहीं थी।
यही बदलाव आगे चलकर भारत में सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। परीक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे भारत के प्रशासनिक ढांचे के भीतर आने लगी।
ली आयोग ने क्या सुझाव दिया था?
1924 में आर्थर हैमिल्टन ली की अध्यक्षता में ली आयोग ने सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना की तत्काल सिफारिश की। आयोग का उद्देश्य सरकारी सेवाओं में भर्ती की व्यवस्था को अधिक संस्थागत बनाने की दिशा में सुझाव देना था।ली आयोग ने अधिकारियों की भर्ती को लेकर एक अनुपात भी प्रस्तावित किया। इसके अनुसार हर 10 नए प्रवेशों में चार ब्रिटिश, चार भारतीय और दो ऐसे भारतीय होने चाहिए थे जिन्हें प्रांतीय सेवाओं से पदोन्नत किया जाए।
कागज पर यह व्यवस्था भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में दिखाई देती थी। लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार व्यवहार में ब्रिटिश उम्मीदवारों के लिए 40 प्रतिशत हिस्सेदारी जन्म के आधार पर सुनिश्चित थी, न कि खुली प्रतियोगिता के आधार पर। इस कारण भर्ती व्यवस्था में समान अवसर को लेकर सवाल बने रहे।
1926 के आयोग की सीमाएं क्या थीं?
सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना 1926 में पब्लिक सर्विस कमीशन यानी सार्वजनिक सेवा आयोग के कार्य नियमों के तहत हुई। ये नियम 1919 के भारत सरकार अधिनियम की धारा 96बी और 96सी के तहत बनाए गए थे।आयोग के पास सीमित अधिकार थे। वह आज के यूपीएससी की तरह पूरी तरह स्वतंत्र संवैधानिक संस्था नहीं था। उसकी भूमिका और शक्तियां ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के दायरे में थीं। इसी कारण स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं ने आयोग की सीमित शक्तियों की आलोचना की।
फिर भी 1926 का गठन ऐतिहासिक था। पहली बार भारत में एक स्थायी भर्ती संस्था मौजूद थी, जिसका काम सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों से जुड़ी प्रक्रिया में भूमिका निभाना था। यही वजह है कि आज यूपीएससी अपनी 100 साल की संस्थागत यात्रा की शुरुआत 1926 से मानता है।
आजादी के बाद क्या बदला?
भारत की आजादी के बाद सरकारी सेवाओं में भर्ती की व्यवस्था को लोकतांत्रिक और संवैधानिक आधार देने की जरूरत थी। ब्रिटिश शासन के दौर में बनी संस्थाओं को स्वतंत्र भारत की जरूरतों के मुताबिक नया स्वरूप दिया गया।सार्वजनिक सेवा आयोग को भी इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अब सरकारी सेवाओं में नियुक्ति का उद्देश्य किसी औपनिवेशिक प्रशासन को चलाने के बजाय स्वतंत्र भारत के प्रशासन के लिए योग्य अधिकारियों का चयन करना था।
इसी बदलाव ने आयोग को एक ऐसी संस्था का स्वरूप देने की जमीन तैयार की, जिसकी स्वतंत्रता राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से अलग रहकर निष्पक्ष भर्ती सुनिश्चित करने के लिए जरूरी मानी गई।
संविधान में यूपीएससी को जगह क्यों मिली?
स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता और भूमिका को महत्वपूर्ण माना। 22 अगस्त 1949 को संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर आंबेडकर ने संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रारूप अनुच्छेद पेश किए।बाद में यही प्रावधान संविधान के भाग 14 में शामिल हुए। इसमें अनुच्छेद 315 से 323 तक संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधान रखे गए। इस व्यवस्था ने लोक सेवा आयोगों को संवैधानिक आधार दिया।
इसका मूल उद्देश्य सरकारी सेवाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया को एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था देना था, जिसमें योग्यता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को महत्व मिले।
अनुच्छेद 315 से 323 में क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों का प्रावधान करता है। इसके तहत संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी और राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था है। दो या उससे अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की व्यवस्था का भी प्रावधान है।अनुच्छेद 315 से 323 के बीच आयोगों की संरचना, सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल, हटाने की प्रक्रिया, कार्यों और रिपोर्ट से जुड़े विभिन्न संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं।
इस संवैधानिक व्यवस्था का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि सरकारी सेवाओं में भर्ती करने वाली संस्था को ऐसी स्थिति मिले जहां वह अपने निर्धारित कार्यों को संस्थागत स्वतंत्रता के साथ कर सके।
यूपीएससी की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?
सरकारी नौकरियों में चयन सीधे तौर पर लोगों के करियर और प्रशासन की गुणवत्ता से जुड़ा होता है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता और योग्यता को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदर्भ में लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता को संविधान में विशेष महत्व दिया गया।26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने विदाई भाषण के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता को सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी बताया था। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया जो नौकरी में पक्षपात, भाई-भतीजावाद और अनुचित प्रभाव से बचा सके।
यानी आयोग की स्वतंत्रता केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी, बल्कि सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखने से भी जुड़ी थी।
यूपीएससी किन परीक्षाओं का आयोजन करता है?
आज यूपीएससी कई महत्वपूर्ण सरकारी सेवाओं और पदों के लिए भर्ती परीक्षाएं आयोजित करता है। इनमें सिविल सेवा परीक्षा सबसे चर्चित परीक्षाओं में शामिल है। इसके अलावा भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, संयुक्त चिकित्सा सेवा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में सहायक कमांडेंट जैसी परीक्षाएं भी आयोग आयोजित करता है।इन परीक्षाओं के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अधिकारियों और पेशेवरों का चयन किया जाता है। यानी यूपीएससी का काम केवल एक परीक्षा आयोजित करना नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार से जुड़ी विभिन्न सेवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया संचालित करना भी है।
यूपीएससी की भर्ती प्रक्रिया कैसे काम करती है?
यूपीएससी की अलग-अलग परीक्षाओं की प्रक्रिया उनके नियमों और पद के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर उम्मीदवारों को सबसे पहले संबंधित परीक्षा के लिए आवेदन करना होता है। इसके बाद निर्धारित चरणों में परीक्षा आयोजित की जाती है।सिविल सेवा परीक्षा जैसे मामलों में प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा और फिर साक्षात्कार या व्यक्तित्व परीक्षण का चरण आता है। इन चरणों में उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर अंतिम चयन प्रक्रिया पूरी होती है।
अलग-अलग सेवाओं के लिए पात्रता, परीक्षा पैटर्न, विषय, आयु सीमा और चयन प्रक्रिया अलग हो सकती है। इसलिए उम्मीदवारों के लिए संबंधित परीक्षा की आधिकारिक अधिसूचना और नियमों को देखना जरूरी होता है।
यूपीएससी और आईएएस में क्या अंतर है?
यूपीएससी और आईएएस को लेकर अक्सर भ्रम होता है। आसान भाषा में समझें तो यूपीएससी एक संस्था है, जबकि आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस एक सेवा है।यूपीएससी केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है। सिविल सेवा परीक्षा के जरिए आईएएस के अलावा भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए भी उम्मीदवारों का चयन होता है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि यूपीएससी और आईएएस एक ही चीज हैं। यूपीएससी भर्ती प्रक्रिया संचालित करने वाली संवैधानिक संस्था है, जबकि आईएएस उन सेवाओं में से एक है जिनमें उम्मीदवारों का चयन सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।
यूपीएससी का काम सिर्फ परीक्षा लेना है?
यूपीएससी की भूमिका केवल परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं है। संविधान ने आयोग को लोक सेवाओं और पदों पर नियुक्ति से जुड़े कई कार्य सौंपे हैं। आयोग सरकारी सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है और निर्धारित संवैधानिक दायरे में सरकार को भर्ती से जुड़े मामलों पर सलाह भी देता है।आयोग की संवैधानिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सरकारी सेवाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया को संस्थागत और निष्पक्ष बनाया जाए। यही कारण है कि यूपीएससी को केवल परीक्षा कराने वाली संस्था के रूप में देखना इसकी पूरी भूमिका को नहीं बताता।
100 साल में परीक्षा कितनी बदली?
1926 से 2026 तक यूपीएससी की यात्रा में सबसे बड़ा बदलाव उसकी स्थिति और भूमिका में आया है। शुरुआत में यह एक सलाहकार निकाय था, जिसके अध्यक्ष और सदस्य ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के तहत नियुक्त किए जाते थे। आज यह संविधान के तहत स्थापित स्वतंत्र लोक सेवा आयोग है।परीक्षा प्रणाली भी समय के साथ बदली है। ब्रिटिश दौर की आईसीएस परीक्षा में लंदन, अंग्रेजी, ग्रीक और लैटिन जैसे विषयों की बाधाएं भारतीय उम्मीदवारों के लिए बड़ी चुनौती थीं। बाद में परीक्षा भारत में भी होने लगी और स्वतंत्र भारत में भर्ती व्यवस्था को देश की प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित किया गया।
आज यूपीएससी विभिन्न सेवाओं के लिए अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करता है। आवेदन से लेकर परीक्षा, परिणाम, आगे के चरण और अंतिम चयन तक पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत संचालित होती है।
100 साल की इस कहानी का सबसे बड़ा बदलाव क्या रहा?
यूपीएससी की 100 साल की कहानी को अगर एक लाइन में समझना हो, तो इसे ब्रिटिश शासन की सीमित भर्ती व्यवस्था से स्वतंत्र भारत की संवैधानिक और संस्थागत भर्ती व्यवस्था तक का सफर कहा जा सकता है।1855 में लंदन से शुरू हुई आईसीएस परीक्षा, 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक सफलता, 1919 के भारत सरकार अधिनियम, 1922 में इलाहाबाद में पहली आईसीएस परीक्षा, 1924 के ली आयोग और 1 अक्टूबर 1926 को सार्वजनिक सेवा आयोग की स्थापना जैसे पड़ाव इस यात्रा की नींव बने।
इसके बाद 1949 में संविधान सभा में लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया और संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 के जरिए उन्हें संवैधानिक आधार मिला। 2026 में यूपीएससी इसी संस्थागत यात्रा के 100 साल पूरे कर चुका है।
यानी आज जिस यूपीएससी को प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी सेवाओं और लाखों अभ्यर्थियों के सपनों से जोड़कर देखा जाता है, उसके पीछे एक सदी से ज्यादा लंबा इतिहास है। यह इतिहास केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि भारत में सरकारी सेवाओं में भर्ती की व्यवस्था के धीरे-धीरे बदलने और संवैधानिक रूप लेने की कहानी भी है।
भारत-पाकिस्तान बनने पर अधिकारियों का बंटवारा कैसे हुआ?
1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान केवल जमीन, सरकारी संपत्तियों और संस्थानों का ही बंटवारा नहीं हुआ, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को भी दोनों नए देशों के बीच बांटना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया के लिए वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन की अध्यक्षता में पार्टिशन काउंसिल बनाई गई, जबकि स्टीयरिंग कमेटी और विशेषज्ञ समितियों ने अलग-अलग सरकारी विभागों, वित्त और प्रशासनिक ढांचे के बंटवारे का काम संभाला। विभाजित प्रांतों और केंद्रीय सेवाओं के कई कर्मचारियों को यह विकल्प दिया गया कि वे भारत या पाकिस्तान में से किस सरकार के अधीन सेवा करना चाहते हैं। व्यवहार में अधिकारियों का आवंटन उनकी सेवा, क्षेत्र और सामुदायिक स्थिति जैसे कारकों से भी प्रभावित हुआ।इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस के अधिकारी भी इस पुनर्व्यवस्था का हिस्सा बने। उपलब्ध विवरण के अनुसार 1947 में आईसीएस में कुल 980 अधिकारी थे, जिनमें 468 यूरोपीय, 352 हिंदू और 101 मुस्लिम अधिकारी शामिल थे, जबकि अन्य समुदायों के अधिकारी भी थे। विभाजन के बाद आईसीएस कैडर दोनों देशों में अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं में चला गया। भारत में आगे चलकर आईसीएस की जगह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस विकसित हुई, जबकि पाकिस्तान ने अपनी सिविल सेवा व्यवस्था तैयार की। प्रांतीय सेवाओं में भी क्षेत्र के आधार पर बदलाव हुए और विभाजन के कारण बड़ी संख्या में अधिकारियों व कर्मचारियों को अपने पद, स्थान या देश बदलने की स्थिति का सामना करना पड़ा।
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