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SC: न्यायिक परीक्षा के नियमों पर मंथन, तीन साल की वकालत अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगी राय

Thu, 15 Jan 2026 07:34 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Thu, 15 Jan 2026 07:34 PM IST
सार

Supreme Court: न्यायिक सेवा परीक्षा में तीन साल की वकालत की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट और लॉ यूनिवर्सिटी से राय मांगी है। विकलांग उम्मीदवारों को छूट देने की मांग पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कोई भी बदलाव सभी के लिए समान होना चाहिए।
 

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Supreme Court Seeks Views of High Courts, NLUs on 3-Year Law Practice Rule for Judicial Exams
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को न्यायिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा (एंट्री लेवल ज्यूडिशियल सर्विसेज) के लिए न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत की अनिवार्यता को लेकर बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर देश की सभी उच्च न्यायालयों (High Courts), नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) और अन्य विधि शिक्षण संस्थानों से उनकी राय और सुझाव मांगे हैं।

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यह आदेश मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिया, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और विजय बिश्नोई भी शामिल थे। पीठ भूमिका ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिव्यांग (PwD) कानून स्नातकों को तीन साल की वकालत की शर्त से छूट देने की मांग की गई थी।

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विकलांगों के लिए छूट की मांग पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दिव्यांग कानून स्नातकों को प्रैक्टिस के लिए वकीलों द्वारा नियुक्त नहीं किया जाता, जिससे उनके लिए तीन साल की वकालत की शर्त पूरी करना बेहद कठिन हो जाता है। इसलिए उन्हें इस नियम से छूट दी जानी चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि यदि कोई सुविधा दी जाती है, तो वह सभी कानून स्नातकों के लिए समान होनी चाहिए, न कि किसी एक वर्ग के लिए। अदालत ने यह भी कहा कि किसी विशेष वर्ग को छूट देने से सेवा में आने के बाद उनमें हीन भावना पैदा हो सकती है।

याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश में PwD उम्मीदवारों को दी गई छूट का भी हवाला दिया, लेकिन अदालत ने देशभर में एक समान नियम लागू करने की जरूरत पर जोर दिया।

छात्रों की निराशा को भी कोर्ट ने माना

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस फैसले से युवा कानून छात्रों में निराशा और हतोत्साह की भावना है। अदालत ने कहा कि वह इस विषय पर छात्रों की राय भी जानना चाहती है।

कोर्ट ने कहा, "हम चाहते हैं कि सभी उच्च न्यायालय और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज इस मुद्दे पर अपने सुझाव दें। यदि किसी तरह का बदलाव जरूरी हुआ, तो वह सभी के लिए समान रूप से किया जाएगा।"

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चार हफ्ते में मांगे गए सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि इस आदेश को अपने-अपने मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें। साथ ही सभी हाई कोर्ट, NLUs और लॉ कॉलेजों से कहा गया है कि वे चार सप्ताह के भीतर अपनी राय और सुझाव अदालत को भेजें।

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