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'बापू के योग्य उत्तराधिकारी थे शास्त्री': गांधी जयंती पर माखनलाल विश्वविद्यालय में व्याख्यान, क्या बोले वक्ता?
Thu, 01 Oct 2026 10:18 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Thu, 01 Oct 2026 10:18 PM IST
सार
भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री की जयंती पर विशेष व्याख्यान हुआ। गांधीवादी चिंतक डॉ. राकेश कुमार पालीवाल ने शास्त्री को गांधी की राजनीतिक विरासत का योग्य उत्तराधिकारी बताया। उन्होंने गांधी के ग्राम विकास, जनभागीदारी, स्वतंत्रता और धर्म के प्रति दृष्टिकोण को भी समझाया। आखिर गांधी के विचारों को आज के भारत से जोड़कर उन्होंने क्या कहा और शास्त्री को गांधी की विरासत से कैसे जोड़ा?
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गांधी शास्त्री पर जयंती विशेष व्याख्यान
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की जयंती के उपलक्ष्य में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन हुआ। गांधीवादी चिंतक एवं पूर्व आयकर आयुक्त डॉ. राकेश कुमार पालीवाल ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। डॉ. पालीवाल ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को महात्मा गांधी की राजनीतिक विरासत को संभालने वाले सच्चे राजनेता के तौर पर देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि सादगी, कर्तव्यनिष्ठा, नैतिकता और ईमानदारी जैसे गुण शास्त्री जी को गांधीजी के विचारों और सान्निध्य से ही मिले थे। वे उनके एकमात्र योग्य उत्तराधिकारी थे।
डॉ. पालीवाल ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि स्वतंत्रता के बाद बापू के विचारों को काफी हद तक भुला दिया गया। उन्होंने कहा कि ग्राम विकास को लेकर गांधीजी के विचारों से उस समय के कई नेता असहमत थे। नेहरू और आंबेडकर भी। आज जब हम गांवों की दुर्दशा देखते हैं, तो उसके लिए कई लोग जिम्मेदार हैं। यदि गांधीजी आजादी के बाद 10 वर्ष और जीवित रह जाते, तो आज भारतीय गांवों की तस्वीर बिल्कुल अलग होती। उन्होंने आगे बताया कि गांधीजी इकलौते ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत और उसकी जमीनी चुनौतियों को सबसे करीब से पहचाना था। जब गांधीजी ने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से पूछा कि वे भारत सेवा की शुरुआत कहां से करें, तब गोखले जी ने उन्हें पहले पूरे देश को समझने के लिए एक वर्ष तक भ्रमण करने की सलाह दी थी। इसी राष्ट्रव्यापी यात्रा के बाद गांधीजी ने यह ऐतिहासिक निष्कर्ष दिया था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है।
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आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया
डॉ. पालीवाल ने कहा कि अपनी यात्रा के दौरान गांधीजी ने पाया कि उस समय तक ग्रामीण क्षेत्रों में न तो कांग्रेस का प्रभाव था और न ही लोग बड़े नेताओं को जानते थे। गांधीजी ने महसूस किया कि बिना आम जनता और ग्रामीणों की भागीदारी के न तो स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है और न ही उसे संभाला जा सकता है। इसके बाद गांधीजी ने स्वाधीनता आंदोलन को गांव-गांव और हर आम नागरिक तक पहुंचाया, जिससे यह एक व्यापक जनआंदोलन बन सका। जिस कांग्रेस से 1915 तक केवल बड़े शहरों के लोग जुड़े थे, उसी कांग्रेस से 1917 में बड़ी संख्या में आम लोग जुड़ गए।
'पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य अभी बाकी'
स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधीजी के दृष्टिकोण को साझा करते हुए डॉ. पालीवाल ने कहा कि स्वतंत्रता के समय गांधीजी का मानना था कि हमें अभी सिर्फ 'एक चौथाई' स्वतंत्रता मिली है; शेष स्वतंत्रता हमें अपनी ही सरकारों से प्राप्त करनी है, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्वतंत्रता शामिल है।
गांधीजी का सेकुलरिज्म और उनकी विरासत
डॉ. पालीवाल ने कहा कि महात्मा गांधी का सेकुलरिज्म पश्चिमी परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक और गहरा था। वे एक गहरे आध्यात्मिक व्यक्ति थे, जो अपने धर्म का दृढ़ता से पालन करते हुए सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करते थे। इस अवसर पर कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या और आभार प्रदर्शन डॉ. लोकेन्द्र सिंह राजपूत ने किया।
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डॉ. पालीवाल ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि स्वतंत्रता के बाद बापू के विचारों को काफी हद तक भुला दिया गया। उन्होंने कहा कि ग्राम विकास को लेकर गांधीजी के विचारों से उस समय के कई नेता असहमत थे। नेहरू और आंबेडकर भी। आज जब हम गांवों की दुर्दशा देखते हैं, तो उसके लिए कई लोग जिम्मेदार हैं। यदि गांधीजी आजादी के बाद 10 वर्ष और जीवित रह जाते, तो आज भारतीय गांवों की तस्वीर बिल्कुल अलग होती। उन्होंने आगे बताया कि गांधीजी इकलौते ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत और उसकी जमीनी चुनौतियों को सबसे करीब से पहचाना था। जब गांधीजी ने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से पूछा कि वे भारत सेवा की शुरुआत कहां से करें, तब गोखले जी ने उन्हें पहले पूरे देश को समझने के लिए एक वर्ष तक भ्रमण करने की सलाह दी थी। इसी राष्ट्रव्यापी यात्रा के बाद गांधीजी ने यह ऐतिहासिक निष्कर्ष दिया था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है।
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आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया
डॉ. पालीवाल ने कहा कि अपनी यात्रा के दौरान गांधीजी ने पाया कि उस समय तक ग्रामीण क्षेत्रों में न तो कांग्रेस का प्रभाव था और न ही लोग बड़े नेताओं को जानते थे। गांधीजी ने महसूस किया कि बिना आम जनता और ग्रामीणों की भागीदारी के न तो स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है और न ही उसे संभाला जा सकता है। इसके बाद गांधीजी ने स्वाधीनता आंदोलन को गांव-गांव और हर आम नागरिक तक पहुंचाया, जिससे यह एक व्यापक जनआंदोलन बन सका। जिस कांग्रेस से 1915 तक केवल बड़े शहरों के लोग जुड़े थे, उसी कांग्रेस से 1917 में बड़ी संख्या में आम लोग जुड़ गए।
'पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य अभी बाकी'
स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधीजी के दृष्टिकोण को साझा करते हुए डॉ. पालीवाल ने कहा कि स्वतंत्रता के समय गांधीजी का मानना था कि हमें अभी सिर्फ 'एक चौथाई' स्वतंत्रता मिली है; शेष स्वतंत्रता हमें अपनी ही सरकारों से प्राप्त करनी है, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्वतंत्रता शामिल है।
गांधीजी का सेकुलरिज्म और उनकी विरासत
डॉ. पालीवाल ने कहा कि महात्मा गांधी का सेकुलरिज्म पश्चिमी परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक और गहरा था। वे एक गहरे आध्यात्मिक व्यक्ति थे, जो अपने धर्म का दृढ़ता से पालन करते हुए सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करते थे। इस अवसर पर कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. गजेन्द्र सिंह अवास्या और आभार प्रदर्शन डॉ. लोकेन्द्र सिंह राजपूत ने किया।
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