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आयुर्वेद का महत्व और वर्तमान स्थिति, जानें डॉक्टर अवनीष पाठक से

Wed, 24 Jun 2020 04:45 PM IST
Garima Garg Advertorial
Advertorial Published by: Garima Garg Updated Wed, 24 Jun 2020 04:45 PM IST
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SGT university Dr. Avnish Pathak Importance of Ayurveda and Ayurveda in the current context
SGT University - फोटो : SGT University

आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है जो की अनादि एवं शाश्वत है। जो शास्त्र या विज्ञान आयु का ज्ञान कराये उसे आयुर्वेद की संज्ञा दी गयी है। ऋग्वेद जो की मनुष्य जाति के लिए उपलब्ध प्राचीनतम शास्त्र है, आयुर्वेद की उत्पत्ति भी ऋग्वेद के काल से ही है। ऋग्वेद के अलावा अथर्ववेद में भी आयुर्वेदिक विषयक उल्लेख हैं तथा आयुर्वेद को अथर्वेद का उपवेद माना जाता है।

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ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के समय ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का स्मरण किया तथा इस ज्ञान को उपदिष्ट किया। चरक संहिता के अनुसार आयुर्वेद का प्रयोजन है स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण करना एवं यदि व्यक्ति रुग्ण हो जाता है तो उसकी चिकित्सा करना।
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आयुर्वेदानुसार स्वस्थ व्यक्ति के मानदंड निम्नांकित है- “वह व्यक्ति जिसके शारीरिक एवं मानसिक दोष साम्य हों तथा परिणामतः शरीरस्थ अग्नि साम्य हो एवं उनसे उत्पन्न धातु निर्माण प्रक्रिया भी साम्य हो तथा फलस्वरूप परिपाचित मल निष्कासन प्रक्रिया भी साम्य होगी| उस व्यक्ति की आत्मा, इन्द्रिय तथा मन भी प्रसन्न होगा।”
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स्वस्थ प्रयोजनार्थ सभी ग्रंथो में दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या, रसायन चिकित्सा, सद्वृत्त पालन, योगाभ्यास एवं त्रयोपस्तम्भ (आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य) का सम्यक पालन करने का निर्देश दिया है| इन सभी उपायों के सम्यक पालन से व्यक्ति न सिर्फ शारीरिक, मानसिक,

आध्यात्मिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहता है अपितु पूर्ण उर्जावान एवं रोगो से मुक्त होकर पूर्णायु शतायु का भोग करता है|

इसके विपरीत मिथ्याहार विहार के सेवन से पन्च भुतात्मक शरीर की साम्यावस्था का ह्रास हो जाता है| फलतः शरीरस्थ दोष, धातु एवं मल दूषित हो जाते है एवं व्याधि का प्रादुर्भाव होता है| इससे जीवन शैली आधारित, ऋतु जन्य रोग तथा जीवाणु एवं विषाणु जनित रोग भी प्रभावी होने लगते है| अतः आयुर्वेदिय स्वस्थवृत्त के सिद्धान्त देहस्थ दोष, धातु आदि के साम्यावस्था को बनाये रखने के निमित्त से ही वर्णित है|

SGT university Dr. Avnish Pathak Importance of Ayurveda and Ayurveda in the current context
SGT University - फोटो : SGT University
सभी ग्रंथो में आयुर्वेद के आठ अंगों का वर्णन किया गया है| कायचिकित्सा, बाल रोग, उर्ध्वांग चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, विष चिकित्सा, जरा चिकित्सा एवं वाजीकरण चिकित्सा का अष्टांग आयुर्वेद के रूप में वर्णन किया है| स्वस्थवृत्त एवं योग भी आयुर्वेद के अभिन्न अंग है जो की वर्तमान के परिपेक्ष में काफी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है| पूर्वोक्त स्वस्थ प्रयोजनार्थ उपायों का विस्तृत वर्णन स्वस्थवृत्त के सिद्धांतो के रूप में उपलब्ध है| ये सिद्धान्त न केवल आधुनिक जीवन शैली से होने वाले रोग अपितु जीवाणु एवं विषाणु जनित रोगों के निवारण एवं उन्मूलन में सहायक है|

आयुर्वेद की चिकित्सा रोग सामान्य चिकित्सा के बारे में न बता कर “पुरुष पुरुष वीक्ष्यं” के सिद्धान्त की अनुपालन का निर्देश देती है| और ये चीज आयुर्वेद को सभी चिकित्सा शास्त्रों से अलग रूप में प्रदर्शित करती है |

आज समूचे विश्व में असम्यक जीवन पद्धति के कारण नित नई बीमारियों का प्रादुर्भाव हो चुका है| समस्त विश्व नित नई महामारियां झेल रहा है| जो की मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा है इस परिपेक्ष में आयुर्वेदोक्त आहार एवं विहार का सम्यक सेवन ही समस्त मानव जाति के स्वास्थ्य तथा भविष्य के लिए कारगर है| अतः आयुर्वेद के उपदेशो का पालन कर स्वस्थ ओजपूर्ण, ऊर्जा सम्यक कार्य कुशल रहकर पूर्ण आयु का भोग तथा फलस्वरूप धर्मं,

अर्थ, काम मोक्ष का भागी बन सकता है| तथा स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समुदाय एवं स्वस्थ विश्व का निर्माण करने में सक्षम होता है|

एसजीटी यूनिवर्सिटी नई खोज, नए शोध के लिए एक पावरहाउस की तरह है। यहाँ हमेशा नए क्षेत्रों में शोध कार्य होते रहते हैं जो स्थानीय लोगों के लिए भी उपयोगी होते हैं। हमारे छात्र, अध्यापक और शोधार्थी शोध को लेकर अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

सामुदायिक सेवा में भी एसजीटी यूनिवर्सिटी महत्त्वपूर्ण भूमिका में है। शोध भागीदारी के रूप में यूनिवर्सिटी शोधार्थियों और स्थानीय व्यवसाय के बीच सेतु की तरह है।

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