एग्रीकल्चर के क्षेत्र में युवाओं के सपनों को पंख लगा रही संस्कृति यूनिवर्सिटी
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एक समय था जब खेती-बाड़ी की तरफ युवाओं का रुझान बिल्कुल नहीं था। वे गांव छोड़कर शहरों में छोटी-छोटी नौकरी करने के लिए निकल रहे थे, लेकिन अब इस स्थिति में बदलाव आ रहा है। खुशी की बात यह है कि अब शहरों में पढ़ने-लिखने के बाद युवा खेती-बाड़ी का रुख कर रहे हैं। समय तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक जिस खेती-किसानी की तरफ युवाओं का बिल्कुल रुझान नहीं होता था वहां आज करियर की असीम सम्भावनाओं को देखते हुए छात्र-छात्राएं संस्कृति यूनिवर्सिटी (See: B.Sc. Agriculture) में न केवल प्रवेश ले रहे हैं बल्कि शिक्षा के साथ शोध में महारत हासिल कर अपने सपनों को भी साकार कर रहे हैं।
भारत कृषि प्रधान देश है, भारत सरकार 2022 तक कृषि का सकल उत्पाद दोगुना बढ़ाना चाहती है, इसके लिए कृषि क्षेत्र में तरह-तरह के तकनीकी बदलाव किए जा रहे हैं, यही वजह है कि आज के युवाओं की रुचि कृषि क्षेत्र में करियर बनाने में ज्यादा दिखाई दे रही है। प्रोफेसर नंदराम का कहना है कि संस्कृति यूनिवर्सिटी में छात्र-छात्राओं को आधुनिक कृषि शिक्षा में पारंगत करने के साथ उन्हें अधिकाधिक प्रायोगिक अवसर भी मुहैया कराए जाते हैं। कृषि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ उत्पादकता बढ़ाना ही नहीं है बल्कि युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरतों के मुताबिक भी तैयार किया जाना है।
संस्कृति यूनिवर्सिटी ने कृषि क्षेत्र में युवाओं के बढ़ते रुझान को देखते हुए कृषि संकाय में सुयोग्य प्राध्यापकों प्रो. नंदराम, डॉक्टर एनएन सक्सेना, डॉक्टर राजेन्द्र, असिस्टेंट प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर बिलाल अहमद, असिस्टेंट प्रोफेसर गौरव कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर एके त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफेसर संजय सिंह आदि के साथ आधुनिकतम तकनीक को प्रमुखता दी है। संस्कृति यूनिवर्सिटी में युवाओं को बीएससी एग्रीकल्चर ऑनर्स, बीएससी फॉरेस्टरी, बीएससी हॉर्टीकल्चर, बैचलर ऑफ फिशरीज साइंसेज आदि की शिक्षा दी जाती है। इसके साथ ही छात्र-छात्राओं के लिए एमएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई की भी व्यवस्था है।
असिस्टेंट प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य का कहना है कि कृषि क्षेत्र जितना बड़ा है, उतना ही इस क्षेत्र में जॉब के अवसर भी हैं, जो छात्र-छात्राएं कृषि क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं उनके लिए संस्कृति यूनिवर्सिटी में जरूरी डिग्री के साथ ही प्रशिक्षण के लिए कृषि फार्म भी उपलब्ध है।
संस्कृति यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति सचिन गुप्ता का कहना है कि वर्तमान समय में मौसम का मिजाज बदल रहा है, फलस्वरूप फसल चक्र में भी बदलाव हुआ है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खेती पर दबाव है और किसानों के सामने अधिक उत्पादन की चुनौतियां भी हैं, इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए संस्कृति यूनिवर्सिटी ने कृषि संकाय को प्रमुखता दी है। हमारा प्रयास है कि यहां न सिर्फ छात्र-छात्राएं कृषि की नई तकनीक और अनुसंधानों से परिचित हों बल्कि जनपद मथुरा और उसके आसपास के किसानों को भी इसका लाभ मिले।
संस्कृति यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉक्टर राणा सिंह का कहना है संस्कृति यूनिवर्सिटी में कृषि विज्ञान के स्नातक स्तर के कोर्स में बदलाव कर इसे अब व्यावहारिक अनुभव के साथ व्यावसायिक और रोजगारोन्मुख भी बनाया जा रहा है। नये पाठ्यक्रम में पारम्परिक कृषि कोर्स, प्रौद्योगिकी कोर्स, प्रतिभा उन्नति कोर्स एवं कृषि व्यापारिक कोर्स का भी समावेश किया गया है।
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