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Hindi News ›   Education ›   Parliamentary Panel Recommends Law for SC-ST-OBC Quotas in Private Educational Institutions

Education: निजी संस्थानों में SC-ST-OBC कोटे के लिए कानून की सिफारिश, हर साल प्रवेश आंकड़े जुटाने की मांग

Thu, 21 Aug 2025 08:25 AM IST
शाहीन परवीन ब्यूरो अमर उजाला
ब्यूरो अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Thu, 21 Aug 2025 08:25 AM IST
सार

Private Educational Institutions: संसदीय स्थायी समिति ने निजी शिक्षण संस्थानों में SC-ST-OBC कोटे को लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग की है। समिति ने हर साल प्रवेश के आंकड़े जुटाने की भी सिफारिश की है।

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Parliamentary Panel Recommends Law for SC-ST-OBC Quotas in Private Educational Institutions
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, UGC - फोटो : X(@ugc_india)

विस्तार

Parliamentary Committee: समिति ने सिफारिश की है कि शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और पिछड़ा वर्ग आयोग को उक्त निजी संस्थानों से हर साल प्रवेश के आंकड़े लेने चाहिए। निजी शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी, ओबीसी कोटे का कानून बनाने की जरूरत है। यहां 15% एससी, 7.5% एसटी और 27% ओबीसी सीटें आरक्षित करनी होंगी।

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इन वर्गों के लिए आरक्षण को अनिवार्य बनाने को संसद में विधेयक लाना होगा, लेकिन इससे सामान्य सीटों में कटौती नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने बुधवार को पेश अपनी रिपोर्ट में ये सिफारिशें की हैं। इसमें बिट्स पिलानी में खराब प्रतिनिधित्व का हवाला तो ओपी जिंदल और शिव नादर को वार्षिक प्रवेश डाटा जमा करने की सिफारिश है।

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समिति ने रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए लिखा है कि निजी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को आरक्षण देना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है। आरक्षण को लागू करने में निजी संस्थानों को सहयोग देने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (Ews) के लिए 25% आरक्षण प्रावधान का पालन किया जा सकता है। अभी निजी संस्थान आरक्षण को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं, क्योंकि कानून नहीं है। रिपोर्ट में बिट्स, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और शिव नादर यूनिवर्सिटी के आंकड़ों का हवाला देते हुए समिति ने निजी संस्थानों में आरक्षित वर्ग के छात्रों के निराशाजनक प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई। 

फीस बहुत अधिक, कानून बनाने की जरूरत

यह भी कहा कि निजी विवि में फीस बहुत अधिक है, इसलिए राज्य सरकार कानून बनाए। आरक्षित श्रेणी के छात्र बीच में पढ़ाई न छोड़े, उसके लिए छात्रवृति के जरिये हॉस्टल आवंटित हो। जाति घोषणा को वैकल्पिक बनाने की मौजूदा व्यवस्था से प्रवेश प्रक्रिया में छात्रों के साथ जातीय भेदभाव हो सकता है। वो मानसिक प्रताड़ना झेल सकते हैं। छात्रों को यह घोषित करने का विकल्प दिया जा सकता है कि उनकी जातिगत कोई पहचान नहीं है।

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सामाजिक न्याय में भी बाधा

रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च शिक्षा दो तरह से बंट गई है। निजी और चुनिंदा सरकारी संस्थानों के पास बेहतर संकाय और संसाधन हैं। दूसरी ओर बहुसंख्यक संस्थान पहले वाले के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे। सार्वजनिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान और निजी में प्रावधान का अभाव, देश में सामाजिक न्याय प्राप्ति में बाधा है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 15(5) को कानून बनाकर पूरे देश में लागू किया जाए।

 

 

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