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एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान किताब: मंदिर विध्वंस, सिख गुरुओं का संघर्ष और राम राज्य; क्या पढ़ेंगे छात्र?
Thu, 01 Oct 2026 06:05 AM IST
निर्मल कांत
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 01 Oct 2026 06:05 AM IST
सार
एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान किताब में मध्यकालीन भारत को 'प्रतिरोध और दृढ़ता' के नजरिये से समझाया गया है। इसमें मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण से लेकर सिख गुरुओं के संघर्ष तक का जिक्र है। काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास से लेकर 'राम राज्य' तक किताब में और क्या-क्या पढ़ेंगे छात्र? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ पार्ट-2 में मध्यकालीन भारत के इतिहास को ‘प्रतिरोध और दृढ़ता’ के नजरिये से रखा गया है।
किताब में मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण, विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिरोध, सिख गुरुओं के साथ मुगल सत्ता के टकराव और शासन की भारतीय परंपराओं का उल्लेख है। वहीं, ‘राम राज्य’, ‘सत्यमेव जयते’ और सुप्रीम कोर्ट के आदर्श वाक्य जैसे विषयों को आधुनिक शासन से जोड़ा गया है। पवित्र स्थलों’ से जुड़े हिस्से में काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास का उल्लेख करते हुए किताब बताती है कि मंदिर को अलग-अलग दौर में क्षति पहुंची और उसका पुनर्निर्माण भी हुआ।
किताब के अनुसार, अकबर के शासनकाल में टोडर मल और राजा मान सिंह से जुड़े संरक्षण के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, जबकि बाद में औरंगजेब के शासनकाल में इसे फिर नष्ट किया गया। वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 1780 में अहिल्याबाई होल्कर ने कराया। इसी हिस्से में मंदिरों पर हमलों को ऐतिहासिक संदर्भ में रखा गया है।
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मंदिर पूजा के साथ अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र भी
पुस्तक मंदिरों को सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में भी देखती है। मंदिरों से वास्तुकार, कारीगर, मूर्तिकार, पुजारी, संगीतकार व प्रशासनिक कर्मचारियों को रोजगार मिलता था। कुछ मंदिर वित्तीय संस्थानों की तरह काम करते थे और किसानों, ग्राम सभाओं तथा व्यापारी समूहों को ऋण देते थे। स्थानीय कर संग्रह और कुछ प्रशासनिक या न्यायिक भूमिकाओं का भी उल्लेख किया गया है। शासकों के लिए मंदिरों का संरक्षण राजनीतिक वैधता हासिल करने का एक माध्यम भी था।
मथुरा-वृंदावन में मंदिरों के पुनर्निर्माण का जिक्र
किताब में मंदिरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण के उदाहरण भी दिए गए हैं। इसके तहत अहिल्याबाई होल्कर के काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ वृंदावन के गोविंद देवजी मंदिर के संरक्षण का उल्लेख है। बुंदेला शासक वीर सिंह द्वारा मथुरा में केशव देव मंदिर के निर्माण को संरक्षण देने की बात भी कही गई है।
आक्रमणों के दौर में बदली मंदिर वास्तुकला
किताब के अनुसार 16वीं शताब्दी के बाद मंदिरों की वास्तुकला और उनके स्थान में भी बदलाव दिखाई देता है। कई मंदिर अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाली जगहों और संकरी गलियों में बनाए गए। कुछ में ऊंचे शिखरों और बाहरी सजावट के बजाय हवेली जैसी संरचना अपनाई।
ये भी पढ़ें: अंतरिक्ष पर नजरें: आज भारत के पहले ऑर्बिटल कंप्यूटिंग सैटेलाइट की लॉन्चिंग, सूचनाएं लेकर वहीं योजना भी बनेंगी
गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान का भी किया गया जिक्र
इतिहास अध्याय में सिख गुरुओं और मुगल सत्ता के बीच बढ़ते टकराव का भी विस्तार से वर्णन है। किताब के अनुसार 17वीं शताब्दी की शुरुआत से मुगल राज्य का सिख गुरुओं के मामलों में हस्तक्षेप बढ़ा। इसमें गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान तथा गुरु गोबिंद सिंह के दौर के घटनाक्रम का उल्लेख है।
किताब इन घटनाओं को सिख समुदाय में संगठित प्रतिरोध की भावना मजबूत होने से जोड़ती है।
क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिरोध पर जोर
‘रेसिस्टेंस एंड रेसिलेंस’ अध्याय में मेवाड़, अहोम, मराठा, राजपूत, विजयनगर, सिख और जाट शक्तियों सहित विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के प्रतिरोध और राजनीतिक संघर्षों को जगह दी गई है। अध्याय का व्यापक फोकस 1000 से 1700 के बीच बाहरी आक्रमणों के मुकाबले क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया, परंपराओं के संरक्षण पर है।
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किताब में मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण, विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिरोध, सिख गुरुओं के साथ मुगल सत्ता के टकराव और शासन की भारतीय परंपराओं का उल्लेख है। वहीं, ‘राम राज्य’, ‘सत्यमेव जयते’ और सुप्रीम कोर्ट के आदर्श वाक्य जैसे विषयों को आधुनिक शासन से जोड़ा गया है। पवित्र स्थलों’ से जुड़े हिस्से में काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास का उल्लेख करते हुए किताब बताती है कि मंदिर को अलग-अलग दौर में क्षति पहुंची और उसका पुनर्निर्माण भी हुआ।
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किताब के अनुसार, अकबर के शासनकाल में टोडर मल और राजा मान सिंह से जुड़े संरक्षण के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, जबकि बाद में औरंगजेब के शासनकाल में इसे फिर नष्ट किया गया। वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 1780 में अहिल्याबाई होल्कर ने कराया। इसी हिस्से में मंदिरों पर हमलों को ऐतिहासिक संदर्भ में रखा गया है।
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मंदिर पूजा के साथ अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र भी
पुस्तक मंदिरों को सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में भी देखती है। मंदिरों से वास्तुकार, कारीगर, मूर्तिकार, पुजारी, संगीतकार व प्रशासनिक कर्मचारियों को रोजगार मिलता था। कुछ मंदिर वित्तीय संस्थानों की तरह काम करते थे और किसानों, ग्राम सभाओं तथा व्यापारी समूहों को ऋण देते थे। स्थानीय कर संग्रह और कुछ प्रशासनिक या न्यायिक भूमिकाओं का भी उल्लेख किया गया है। शासकों के लिए मंदिरों का संरक्षण राजनीतिक वैधता हासिल करने का एक माध्यम भी था।
मथुरा-वृंदावन में मंदिरों के पुनर्निर्माण का जिक्र
किताब में मंदिरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण के उदाहरण भी दिए गए हैं। इसके तहत अहिल्याबाई होल्कर के काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ वृंदावन के गोविंद देवजी मंदिर के संरक्षण का उल्लेख है। बुंदेला शासक वीर सिंह द्वारा मथुरा में केशव देव मंदिर के निर्माण को संरक्षण देने की बात भी कही गई है।
आक्रमणों के दौर में बदली मंदिर वास्तुकला
किताब के अनुसार 16वीं शताब्दी के बाद मंदिरों की वास्तुकला और उनके स्थान में भी बदलाव दिखाई देता है। कई मंदिर अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाली जगहों और संकरी गलियों में बनाए गए। कुछ में ऊंचे शिखरों और बाहरी सजावट के बजाय हवेली जैसी संरचना अपनाई।
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गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान का भी किया गया जिक्र
इतिहास अध्याय में सिख गुरुओं और मुगल सत्ता के बीच बढ़ते टकराव का भी विस्तार से वर्णन है। किताब के अनुसार 17वीं शताब्दी की शुरुआत से मुगल राज्य का सिख गुरुओं के मामलों में हस्तक्षेप बढ़ा। इसमें गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान तथा गुरु गोबिंद सिंह के दौर के घटनाक्रम का उल्लेख है।
किताब इन घटनाओं को सिख समुदाय में संगठित प्रतिरोध की भावना मजबूत होने से जोड़ती है।
क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिरोध पर जोर
‘रेसिस्टेंस एंड रेसिलेंस’ अध्याय में मेवाड़, अहोम, मराठा, राजपूत, विजयनगर, सिख और जाट शक्तियों सहित विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के प्रतिरोध और राजनीतिक संघर्षों को जगह दी गई है। अध्याय का व्यापक फोकस 1000 से 1700 के बीच बाहरी आक्रमणों के मुकाबले क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया, परंपराओं के संरक्षण पर है।
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