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एक अनोखे गणित की गणना, रुक सकती है दुनिया

Wed, 03 Jul 2019 02:37 PM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Garima Garg Updated Wed, 03 Jul 2019 02:37 PM IST
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know about problems of dynamic resource allocation system

इंसान की ख्वाहिशों का अंत नहीं है। एक आरजू पूरी होती नहीं कि दूसरी सिर उठाने लगती है। ये सिलसिला चलता रहता है। इंसान स्वभाव से ही उतावला है। उसे हर समय सब-कुछ, एक साथ, एक ही समय पर चाहिए। इस ख्याल के बगैर कि किसी दूसरे को भी उन्हीं सब चीजों की जरूरत होगी।

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कुदरत ने इंसान को बेपनाह संसाधनों के साथ धरती पर उतारा था। और सभी को उन संसाधनों की जरूरत है। प्रकृति अपने हिसाब से उन्हें बांटती है। इंसान ने जरूरत के हिसाब से तरक्की की। जिंदगी आसान बनाने के बहुत से अन्य संसाधन जुटाए और उनके बंटवारे के लिए बहुत से गणितीय तरीके भी अपनाए, जिन्हें मांग पूरी करने के लिए लगभग सभी कंपनियां अपनाती हैं।
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इसे डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम कहते हैं। लेकिन अचानक डिमांड बढ़ने पर ये सिस्टम भी धराशायी हो जाता है। किस डिमांड में कब, कहां, क्या बदलाव हो जाए नहीं कहा जा सकता।

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डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम जानने से पहले चलिए जान लेते हैं आखिर ये समस्या है क्या?

इस बात को इस मिसाल से समझिए। एक टैक्सी कंपनी के पास एक निश्चित संख्या में टैक्सी होती हैं। कंपनी मोटे तौर पर जानती है कि किस रूट पर उसे कितनी टैक्सी तैयार रखनी है। लेकिन अचानक किसी रोज उसी रूट पर डिमांड बढ़ जाती है। जाहिर है कंपनी मांग पूरी करने के लिए दूसरे रूट की टैक्सी यहां लगाएगी। अब जहां से टैक्सी हटाई गई है वहां कि मांग भी प्रभावित होगी। ऐसे में डाएनेमिक रिसोर्स अलोकेशन सिस्टम की मदद से ही समस्या का हल तलाशा जाता है।

इस समस्या को समझने के लिए जरा इस मिसाल पर भी गौर कीजिए। कल्पना कीजिए आपने अपने घर में चार सदस्यों के लिए उनका पसंदीदा खाना तैयार किया। लेकिन जैसे ही आप खाना परोसने लगे, तो एक ने कहा उसे वो खाना पसंद नहीं है। दूसरा अचानक बताता है कि खाने पर दो अन्य लोग भी आने वाले हैं। ऐसे में अचनाक डिमांड में बदलाव की चुनौती को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। धीरे-धीरे हर रोज खाना खाने वालों की मांग में बदलाव होने लगते हैं।

आपको कोई अंदाजा नहीं होता कि किसे, कब और क्या खाना है। आप तजुर्बे की बुनियाद पर सिर्फ मोटा-मोटा अंदाजा लगाकर तैयारी कर सकते हैं। संसाधन वितरण की समस्या पर रिसर्च करने वालों को भी इसी समस्या से जूझना पड़ रहा है।

बदलाव की जरूरत

समस्या ये भी है कि अभी तक जो कंप्यूटिंग सिस्टम इस्तेमाल में है वो फ्यूचर प्लानिंग के लिए पुराने डेटा का इस्तेमाल करता है, जो कि छोटे से भी बदलाव के साथ तालमेल नहीं बैठा पाता। जिसकी वजह से समस्या गंभीर हो जाती है।

प्रोफेसर योनेकी इसी समस्या के समाधान के लिए काम कर रही हैं इनके मुताबिक कंप्यूटर की कॉन्फिगरेशन में ही बुनियादी बदलाव की जरूरत है। आज की जरूरत के हिसाब से पूरा कंप्यूटिंग सिस्टम जटिल होता जा रहा है। लिहाजा आज के कंप्यूटर सिस्टम को डाएनामिक कंट्रोल मेथेडोलॉजी की जरूरत है।

आज हम जिस तरह के स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं वो भी पूरी तरह कंप्यूटर जैसे हैं। जो काम कंप्यूटर पर होते हैं वही काम स्मार्टफोन से भी हो रहे हैं। देखा जाए तो आज हर कोई मोबाइल के जरिए ही अपना जीवन चला रहा है। लिहाजा रिसोर्स अलोकेशन का काम मोबाइल से भी हो रहा है।

जैसे, कैब की जरूरत होने पर आप कंपनी की ऐप पर जाकर बुक कर देते हैं फिर कंपनी आपकी जरूरत और अपनी सेवा की उपलब्धता के अनुसार सर्विस मुहैया कराती है।

सर्विस डिलिवरी कंपनियां भी अपना डिलिवरी सिस्टम फास्ट करने के लिए काम कर रही हैं। उदाहरण के लिए अमरीका की यूपीएस कंपनी ने डिलिवरी रूट्स के लिए एड्वांस एलगोरिद्म का इस्तेमाल शुरू कर दिया है जिसे ऑन-रोड इंटेग्रेटिड ऑप्टिमाइजेशन एंड नेविगेशन यानि (ORION) का नाम दिया गया है।

कंपनी का दावा है कि इस नए सिस्टम से उन्हें हर साल 10 करोड़ मील का रास्ते कम तय करना पड़ा है। हालांकि कुछ रिपोर्ट का दावा है कि बड़े शहरों में इस सिस्टम से कई तरह की समस्याओं का सामना भी करना पड़ा है।

सप्लाई चेन
सप्लाई चेन भी कभी न खत्म होने वाली समस्या है। आज किसी भी चीज के उत्पादन के लिए बहुत तरह की अन्य चीजों की जरूरत होती है, और सभी का एक ही समय में मौजूद होना भी जरूरी है।

प्रोफेसर पॉवेल का कहना है कि समाज की लगातार बढ़ती मांग पूरा करने के लिए सप्लाई चेन का दुरूस्त होना बहुत जरूरी है। प्रोफेसर पॉवेल कहते हैं कि संसाधनों का वितरण तो एक समस्या है ही। उससे बड़ा मसला है उन समस्याओं से निपटने के लिए लोगों का बर्ताव।

लोगों को हर समस्या का समाधान चुटकी बजाते ही चाहिए। इस मुश्किल से उबरने के लिए बहुत सी रिसर्च टीमें काम कर रही हैं। पॉवेल का कहना है कि हर उद्योग को अपनी जरूरत के मुताबिक अलग तरह का कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करना होगा।

और इसके लिए पुराने तरीकों से नहीं बल्कि नए डेटा के साथ काम करने की जरूरत है। पिछले कई दशक में अच्छा ऑपरेशनल मैनेजमेंट सिस्टम लागू करने के बाद बहुत सी एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स फर्म और रोड नेटवर्क को अपना काम सुधारने में काफी मदद मिली है।

हालांकि अचानक मांग में होने वाले परिवर्तन से अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। जिसके लिए खास तरह का एलगोरिद्म तैयार किया गया है। जिसे वो इंसान की सहायता के बगैर इस्तेमाल कर सकता है।

बहुत हद तक समस्याओं का निपटारा हो गया है। लेकिन, अभी भी बहुत काम बाकी है। मशीनों के काम का तरीका सीखने में भी समय लगेगा। लेकिन संसाधनों के वितरण की समस्या कभी ना खत्म होने वाली समस्या है। हां, इतना जरूर है कि इसे रोका जा सकता है। लेकिन वो भी एक सूरत में, जब आबादी पर नियंत्रण किया जाए। आबादी में अगर इसी तरह इजाफा होता रहा तो ये समस्या और गहराती जाएगी। हमें ये समझना होगा कि संसाधन सीमित मात्रा में हैं और उन्हीं संसाधनों से सारी दुनिया को अपना काम चलाना है।
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