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Karnataka: CBSE और CISCE स्कूलों में कन्नड़ को अनिवार्य बनाने पर विवाद, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
Sat, 12 Jul 2025 11:35 AM IST
शिवम गर्ग
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम गर्ग
Updated Sat, 12 Jul 2025 11:35 AM IST
सार
Kannada Language: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सीबीएसई और सीआईएससीई स्कूलों में कन्नड़ भाषा को अनिवार्य बनाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर राज्य सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। जानें पूरी खबर...
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Karnataka HC
- फोटो : ANI
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विस्तार
Kannada Language Policy Karnataka: कर्नाटक में सीबीएसई और सीआईएससीई स्कूलों में कन्नड़ भाषा को अनिवार्य बनाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) पर राज्य सरकार को कर्नाटक हाईकोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने सरकार को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति सी. एम. जोशी की खंडपीठ ने दिया।
इस याचिका को सोमशेखर सी और अन्य अभिभावकों के समूह ने वर्ष 2023 में दाखिल किया था, जिनके बच्चे राज्य के गैर-राज्य बोर्ड (CBSE और CISCE) से संबद्ध स्कूलों में पढ़ते हैं।
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इस याचिका को सोमशेखर सी और अन्य अभिभावकों के समूह ने वर्ष 2023 में दाखिल किया था, जिनके बच्चे राज्य के गैर-राज्य बोर्ड (CBSE और CISCE) से संबद्ध स्कूलों में पढ़ते हैं।
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क्या है याचिका का मामला?
याचिका में कन्नड़ भाषा अधिनियम 2015, कन्नड़ भाषा नियम 2017 और कर्नाटक शैक्षणिक संस्थान (NOC और नियंत्रण) नियम, 2022 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये नियम सभी स्कूलों में कन्नड़ को अनिवार्य रूप से पढ़ाने के लिए बाध्य करते हैं, भले ही स्कूल किसी भी बोर्ड से संबद्ध हों।
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कोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि यह मामला दो वर्षों से लंबित है, लेकिन अब तक राज्य सरकार ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए मौखिक टिप्पणी कि दो साल में आपने कुछ नहीं किया। अपनी प्रक्रिया को सक्रिय करें, वरना हम अंतरिम राहत पर विचार करेंगे।क्या कहती है याचिका?
- याचिका में कहा गया है कि किसी भाषा को जबरन थोपना छात्रों की भाषा चयन की स्वतंत्रता पर चोट है।
- यह नियम उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और करियर पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
- याचिका में यह भी कहा गया है कि गैर-कन्नड़ भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों के रोजगार पर भी संकट खड़ा हो सकता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का हवाला देते हुए कहा गया कि इसमें किसी भाषा को जबरन थोपने की मनाही है।
- केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि NEP 2020 किसी एक भाषा को अनिवार्य करने का समर्थन नहीं करता।
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