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स्वच्छता के बारे में जापान दुनिया को क्या सिखा सकता है?

Sun, 20 Oct 2019 01:00 PM IST
बीबीसी Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया Updated Sun, 20 Oct 2019 01:00 PM IST
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How world can learn from Cleanliness system in Japan, Cleanest city country in world
जापान में सफाई की एक तस्वीर - फोटो : social media

50-50 मिनट की सात लंबी कक्षाओं के बाद छात्र घर जाने के लिए अपने बस्ते के साथ डेस्क पर बैठे हैं। आखिर में रोज की तरह शिक्षक सफाई की जिम्मेदारी बांटते हैं- "पहली और दूसरी पंक्ति कक्षा साफ करेगी। तीसरी और चौथी पंक्ति गलियारे और सीढ़ियां साफ करेगी। पांचवीं पंक्ति टॉयलेट साफ करेगी।"

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पीछे की पंक्ति से कुछ आह निकली, लेकिन सभी बच्चे खड़े हो गए। उन्होंने कक्षा के पीछे रखी आलमारी से पोछा, कपड़े और बाल्टियां उठा लीं और टॉयलेट की ओर चल पड़े। जापान के सभी स्कूलों में इसी तरह के दृश्य दिखते हैं।
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पहली बार जापान आने वाले मेहमान यहां की सफाई देखकर चकित रह जाते हैं। फिर वे नोटिस करते हैं कि कहीं भी कूड़ेदान नहीं है, न ही उनको सड़कों की सफाई करने वाले दिखते हैं। वे उलझन में रहते हैं कि आखिर जापान इतना साफ कैसे रहता है। इसका आसान जवाब यह है कि लोग खुद इसे साफ रखते हैं। आगे पढ़ें कैसे...

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सफाई की दिनचर्या

हिरोशिमा प्रांतीय सरकार के टोक्यो ऑफिस की सहायक निदेशक माइको अवाने कहती हैं, "प्राथमिक से लेकर हाई स्कूल तक 12 साल के स्कूली जीवन में छात्रों के दैनिक रूटीन में सफाई का समय शामिल होता है। घरेलू जीवन में भी माता-पिता हमें सिखाते हैं कि अपनी चीजों को और अपनी जगह को गंदा रखना अच्छी बात नहीं होती।"

स्कूली पाठ्यक्रम में सामाजिक चेतना के इस तत्व को शामिल करने से बच्चों में जागरूकता और अपने परिवेश के प्रति गर्व की भावना विकसित करने में मदद मिलती है। जिस स्कूल को उन्हें खुद साफ करना पड़ता है उसे भला कौन गंदा करना चाहेगा?

फ्रीलांस अनुवादक चिका हयाशी अपने स्कूली दिनों को याद करती हैं, "मैं कई बार स्कूल साफ नहीं करना चाहती थी। लेकिन यह हमारे रूटीन का हिस्सा था इसलिए मैंने स्वीकार कर लिया। मुझे लगता है कि स्कूल साफ करना एक अच्छी चीज है। क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि जिन चीजों और जिस जगह का हम इस्तेमाल करते हैं उसे साफ रखने की जिम्मेदारी लेना हमारे लिए महत्वपूर्ण है।"

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स्कूल पहुंचने पर छात्र अपने जूते उतारकर लॉकर में रख देते हैं और ट्रेनर पहन लेते हैं। घर में भी लोग बाहर के जूते दरवाजे पर उतार देते हैं। घर में काम करने के लिए आने वाले लोग भी जूते उतारकर अंदर आते हैं। छात्र जब बड़े होते हैं तो अपनी जगह और सफाई को लेकर उनकी अवधारणा स्कूल से निकलकर पड़ोस, शहर और देश तक फैल जाती है।

मिसाल बनाता जापान

जापानी स्वच्छता के कुछ चरम उदाहरण वायरल हो गए हैं। जैसे सात मिनट में होने वाली शिनकासेन बुलेट ट्रेन की सफाई। यह सैलानियों के आकर्षण का केंद्र भी बन गया है।

जापान के फुटबॉल प्रेमी भी स्वच्छता के प्रति जागरुक हैं। ब्राजील (2014) और रूस (2018) में हुए वर्ल्ड कप फुटबॉल प्रतियोगिताओं के दौरान दुनिया यह देखकर दंग रह गई थी कि जापानी फुटबॉल प्रेमी मैच के बाद स्टेडियम में फैला कचरा उठाने के लिए रुक जाते थे। जापानी खिलाड़ी भी अपने ड्रेसिंग रूम में कोई गंदगी नहीं छोड़ते थे।

जापानी संगीत समारोहों में भी यही दृश्य दिखते हैं। जापान के सबसे बड़े और पुराने फूजी रॉक फेस्टिवल में संगीत के दीवाने अपने कचरे को तब तक अपने साथ रखते हैं जब तक उन्हें कूड़ेदान न मिल जाए।

धूम्रपान करने वालों को अपना ऐश-ट्रे साथ लाने के निर्देश होते हैं और उस जगह सिगरेट पीने की मनाही होती है जहां धुआं अन्य लोगों को प्रभावित कर सकता है।

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अवाने कहती हैं, "हम जापानी दूसरों की नजर में अपने सम्मान के प्रति बहुत संवेदनशील हैं। हम नहीं चाहते कि कोई हमें बुरा समझे और सोचे कि हमें अपनी चीजों को साफ-सुथरा रखने की सीख नहीं मिली है।"

इस तरह होती है सफाई

रोजमर्रा के जीवन में सामाजिक जागरुकता के भी उदाहरण हैं। सुबह 8 बजे के करीब दफ्तरों में काम करने वाले लोग और दुकानों के कर्मचारी अपने आसपास की सड़कों को साफ करते हैं।

हर महीने बच्चे भी सामुदायिक सफाई करते हैं और अपने स्कूल के पास की सड़कों से कूड़ा उठाते हैं।

एटीएम से निकलने वाले नोट साफ और करकरे होते हैं। फिर भी पैसे गंदे हो जाते हैं, इसलिए इसे सीधे किसी के हाथ में नहीं दिया जाता। दुकानों, होटलों और यहां तक टैक्सी में भी, एक छोटी ट्रे पर पैसे रखे जाते हैं जहां से दूसरा आदमी उनको उठाता है।

आंखों से न दिखने वाली गंदगी- रोगाणु और जीवाणु- अलग चिंता का विषय है। जब लोगों को सर्दी हो जाती है तो वे सर्जिकल मास्क पहनते हैं ताकि दूसरे लोग संक्रमित न हो जाएं। यह छोटी सी सावधानी रोगाणुओं के प्रसार को सीमित कर देती है। इससे कार्यदिवसों के संभावित नुकसान और इलाज के खर्च में कमी आती है।

सफाई पर इतनी सजगता कैसे?

जापान में यह कोई नई बात नहीं है। यहां पहुंचने वाले पहले अंग्रेज यात्री विल एडम्स ने 1600 ई. में यहां अपने जहाज का लंगर डाला था। तब भी उन्होंने यही देखा था। एडम्स की जीवनी "समुराई विलियम" में गाइल्स मिल्टन ने लिखा है कि जिन दिनों इंग्लैंड की गलियों में मल-मूत्र बहता था, उन दिनों जापान बेहद साफ-सुथरा था। नालियां और शौचालय स्वच्छ थे और कुलीन वर्ग के लोग सुगंधित लकड़ी के भाप से स्नान का आनंद लेते थे।

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आंशिक रूप से जापान के लोगों की ये सजगता व्यावहारिक वजहों से आई है। जापान के गर्म और आर्द्र मौसम में खाने-पीने की चीजें जल्दी खराब हो जाती हैं। जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए सफाई का मतलब है अच्छी सेहत।

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