क्रमशः बढ़ रहा है पृथ्वी का तापमान
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मौसम में परिवर्तन हो रहा है यह बात वैज्ञानिक कसौटीयों पर सही साबित हुई हैं। हाल में आयी प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि दक्षिण-पूर्व एशिया में आए सुनामी या फिर अमेरिका के कुछ शहरों में आए कैट रीना एवं रीटा नामक समुद्री तुफान इस परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। मौसम विज्ञान पर कार्य कर रहे वैज्ञानिकों का यह कथन कि धरती का तापमान बढ़ रहा है सौ फसदी सही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी दिन प्रतिदिन गर्म हो रही है। और इसका मौसम पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार यदि प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण में पैदा हो गए असंतुलन की रफ्तार इसी गति से चलती रही तो आने वाले पांच वर्षो में ही विश्व में और अनेक ऐसी आपदायें आएगी जिसमें लगभग पांच करोड़ लोग अपने मूलस्थानों से विस्थापित होकर अन्यत्र शरण लेने पर मजबूर हो जाएंगे।
हमारा वायुमंडल हमें शुद्ध वायु श्वसन के लिए देता है। जिसमें नाइट्रोजन 78 प्रतिशत, ऑक्सीजन 20 प्रतिशत, कार्बन-डाइ-ऑक्साइड 0.03 प्रतिशत व शेष अन्य गैसे मौजूद है। लेकिन जब हम वातारण को धुएँ, धुल से दूषित करते है तो इस सन्तुलन में परिवर्तन आ जाता है।
एक अध्ययन के अनुसार विश्व में औद्योगीकरण से पहले वायु में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की मात्रा लगभग 280 कण प्रति दस लाख वायु कण थी। जो वर्तमान में लगभग 370 कण तक पहुँच चुकी है। और यदि यही क्रम चलता रहा तो आगामी दस से बीस वर्षों में यह मात्रा चार सौ कण प्रति दस लाख वायु कणों में हो जायेगी। जो कि मानव के अस्तित्व के लिए खतरनाक सिद्ध होगी। उनके अनुसार वैसे तो अन्य कई गैसें जैसे मीथेन, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि वायुमंडल के तापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी है पर इन सब में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड सबसे मुख्य है।
मौसम परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल बीसवीं शताब्दी में ही पृथ्वी के तापमान में लगभग 0.60 की वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि 1990 का दशक पिछले एक हजार वर्षो में सबसे गर्म रहा है तथा इक्कीसवीं सदी के अनत तक पृथ्वी के तापमान में 1.4 से 5.80 तक की वृद्धि हो सकती हैं।
साधारण प्रक्रिया में पृथ्वी का तापमान लगभग निश्चित सा बना रहता हैं। क्योंकि सूर्य से जो ऊर्जा पृथ्वी को मिलती है, पृथ्वी उस ऊर्जा को किसी भी अन्य गर्म वस्तु की तरह इन्फ्रा रेड़ किरणों के रूप में उत्सर्जित करती रहती है। जो धीरे-धीरे बाह्य अन्तरिक्ष में विलीन हो जाती है। इस प्रकार ऊर्जा का सन्तुलन एवं पृथ्वी का तापमान एक निश्चित सा बना रहता है।
जब वायु मंडल में ग्रीन हाउस गैसों जैसे कि कार्बन-डाइ एवं मोनो ऑक्साइड, मीथेन आदि गैसों की सघनता बढ़ जाती है तो ये गैसं पृथ्वी के ऊपर एक आवरण के रूप में एकत्रित हो पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित इन्फ्रा रेड किरणों को पूर्णतया बाहरी अन्तरिक्ष में जाने से रोकती हैं। यदि यह प्रक्रिया लम्बे समय तक चलती रहे तो पृथ्वी के तापमान में बहुत धीमी गति से वृद्धि होने लगती है।
पृथ्वी के तापमान में होने वाली वृद्धि से होने वाले प्रभावों के बारे मे वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान में होने वाली इस वृद्धि का प्रभाव कृषि की उपज में कमी, ग्लेशयरें के पिघलने, समुन्द्र के विस्तार एवं विभिन्न प्रकार केरोगों का फैलाने वाले वाहकों की वृद्धि के रूप में देखा जा सकता हैं।
यह दुष्परिणाम विकासशील देशों में अधिक देखने को मिलेगें। भविष्य की सम्भावनाओं के बारे में जापान के क्योटो नामक शहर में सन् 1987 में हुऐ एक समझौते को आशा की एक किरण के रूप में देखा जा सकता हैं। इस क्योटो सन्धि के अनुसार सभी 141 देश जिन्होंने इस सन्धि पर हस्ताक्षर किये है इस बात के लिए वचनबद्ध हैं कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सन् 2022 तक 5.2 प्रतिशत तक की कमी की जायेगी।
यह सन्धि 16 फरवरी 2005 से लागू हो गयी है।यदि हम प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करें और आम आदमी में पर्यावरण के प्रति एक सकारात्मक सोच पैदा कर सकें तो इस पृथ्वी को कुछ लम्बे समय तक प्राकृतिक आपदाओं व पर्यावरण में होने वाले असंतुलन से बचा सकते हैं।
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